आत्मगौरव और स्वतंत्रता के भाव से पूरित विभिन्न हिन्दू राजवंश- अध्याय-1

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भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भाग – 426

वे थमें नहीं, हम थके नहीं

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

स्वामी विवेकानंद और योगी अरविंद का मत रहा है कि भारत की शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य अपने देश की विरासत की आध्यात्मिक महानता पर बल देना और उसे बनाए रखने के लिए हमारे दायित्व के निर्वाह पर बल देना होना चाहिए, जिससे हम विश्व को प्रकाश का मार्ग दिखा सकें। यदि आध्यात्मिकता भारत से लुप्त हो गई तो वह विश्व से भी लुप्त हो जाएगी। अतः यह एक राष्ट्रीय दायित्व ही नहीं है, मानव सभ्यता की सुरक्षा का कर्त्तव्य भी है।

सचमुच व्यक्ति के भीतर आत्मगौरव तभी जागता है, जब उसके पूर्वजों के गौरवमयी कृत्यों का उल्लेख उसके समक्ष किया जाता है या उसे उनके ऐसे कार्यों के किन्हीं स्रोतों से ज्ञान उपलब्ध होता है। ऐसे उल्लेख या ज्ञान होने से ही व्यक्ति आत्मोत्थान के मार्ग पर चल निकलता है। भारत के युवा को यदि उसके अतीत का सही-सही आंकलन और निरूपण करके दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि सबसे अधिक युवाशक्ति को लेकर आगे बढ़ रहे भारत को हम शीघ्रातिशीघ्र विश्व गुरु के गौरवमयी पद पर आरूढ़ होते न देखें। इसीलिए अरविंद जी का मत था कि हमें अपने बच्चों के (युवा वर्ग के) मन में बचपन से ही देशभक्ति के भाव भर देने हैं और हर बार उनके सामने विचार को प्रस्तुत कर देना है, उनके संपूर्ण युवक जीवन को गुणों के अभ्यास का एक पाठ बना देना है, जिससे वे भविष्य में देशभक्त और अच्छे नागरिक बन जाएं। यदि हम ऐसा प्रयास नहीं करते हैं तो हमें भारतीय राष्ट्र के निर्माण के विचार को ही पूर्णतः त्याग देना चाहिए, क्योंकि ऐसे अनुशासन के अभाव में राष्ट्रवाद, देशभक्ति. पुनर्निर्माण केवल शब्द मात्र ही रह जाएंगे।

भारत में स्वतंत्रता मिलने के पश्चात धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाने पर बल दिया गया। वस्तुतः यह एक ऐसा सिद्धांत है जो राष्ट्रभक्ति, मानवतावाद और आत्मगौरव से भरने वाले इतिहास के पुनर्लेखन का विरोधी है। बस यही कारण है कि भारत में यह सिद्धांत हमें सर्वाधिक दिशाओं में मार रहा है और हम हैं कि मरते ही जा रहे हैं। हमें मारने के दृष्टिकोण से मैक्समूलर ने हमारे विषय में बहुत कुछ लिखा। बहुत लज्जा की बात है कि मैक्समूलर के उस लिखे को स्वादिष्ट भोजन मानकर हम आज तक दुम हिला हिलाकर खा रहे हैं और दूसरों को भी बता रहे हैं कि बड़ा स्वादिष्ट भोजन है, आनंद आ गया। शोक ! महाशोक !! जबकि मैक्समूलर का उद्देश्य हमारे विषय में क्या था ? यह उसके 1886 में अपनी पत्नी के लिए लिखे गए एक पत्र की इन पंक्तियों से स्पष्ट हो जाता है:- ‘यदि ऋग्वेद ही उनके (हिंदुओं के) धर्म (हिंदुत्व) का मूल है और उन्हें मूल की वास्तविकता का प्रदर्शन करने के लिए मेरा विश्वास है कि पिछले तीन हजार वर्षों में जो कुछ उससे (ऋग्वेद) निस्सृत हुआ है, उसका समूलोच्छेदन ही एक मात्र उपाय है।’
जब मैक्समूलर को अपने उद्देश्य में कुछ सफलता मिलती दिखी तो दो वर्ष पश्चात उसने भारत के लिए ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट’ के लिए लिखा था – ‘भारत का प्राचीन धर्म तो अब विनाश की ओर अग्रसर है। यदि ईसाइयत उसका स्थान नहीं लेती है तो दोष किसका होगा?’

इस प्रकार की शत्रुतापूर्ण भावनाओं के वशीभूत होकर हमारा अतीत हमारे सामने विदेशी इतिहास लेखकों (जिन्हें भारत के संदर्भ में ‘संस्कृति-नाशक’ कहा जाना ही उचित होगा) ने प्रस्तुत किया। उसी विष को हम अमृत समझकर पीएं तो इसमें भी पूछा जा सकता है कि दोष किसका है?

दक्षिणी भारत के विविध राज्यवंश

भारत के इतिहास को समझने के लिए उसे समग्र रूप से समझना आवश्यक है। भारत को अपने ही विषय में भ्रमित करने के लिए इसका इतिहास एकांगी करके प्रस्तुत किया गया है और अधिकतर इतिहास इंद्रप्रस्थ अथवा दिल्ली के सम्राटों, राजाओं, बादशाहों तक सीमित करके देखा गया है। यह सोच सिरे से ही अनुचित है।

जब मोहम्मद बिन कासिम भारत आया था तो उसका महत्वपूर्ण कारण था-सम्राट हर्षवर्धन जैसे शक्तिशाली राजा का अंत हो जाना, परंतु इसके उपरांत भी भारत में विभिन्न शक्तियां देर तक शासन करती रहीं, जिन्होंने भूल यह की कि अपने-अपने साम्राज्य विस्तार को दृष्टिकोण से या किन्हीं अन्य राजनीतिक कारणों से पारस्परिक ईर्ष्या भाव को बढ़ाया, परंतु सुखद आश्चर्य है कि इस ईर्ष्याभाव के परिणामस्वरूप भी सदियों तक देश में मुस्लिम शासन स्थापित नहीं हो सका।

दक्षिण के दुर्ग को इस काल में चालुक्य साम्राज्य ने सुरक्षित रखा। इसके पूर्व कई अन्य राजवंश भी ऐसे थे, जिन्होंने अपने-अपने साम्राज्य दक्षिण में स्थापित कर रखे थे। इनमें सर्वप्रथम नाम कल्चुरि वंश का आता है। इसका शासन गुजरात और पश्चिमी मालवा में था। छठी शती के अंत में यहां शंकरगण नामक राजा राज्य कर रहा था। 595 ई. में इसका बेटा बुद्धराज राजसिंहासन पर बैठा। दूसरा राजवंश भोज था। छठी सदी के अंत में तथा सातवीं शदी के प्रारंभ में भोजों के दो राज्यों की सत्ता का पता चलता है। इनमें से एक बरार (विदर्भ) क्षेत्र में तथा दूसरा गोआ के क्षेत्र में था। गोआ राज्य की राजधानी चंद्रपुर थी, जिसे आजकल चंदौर कहा जाता है। यह राजवंश भी पर्याप्त शक्तिशाली था।

तीसरा राजवंश त्रिकूटक था। कोंकण के उत्तरी क्षेत्र में इस राज्य की सीमाएं थीं। चौथा राजवंश राष्ट्रकूट था। यह राजवंश मानांक द्वारा स्थापित किया गया, जिसने मानपुर को अपनी राजधानी बनाया। वर्तमान सतारा (महाराष्ट्र) प्रदेश में इनकी सत्ता थी। संभवतः महाराष्ट्र (सतारा का विशाल स्वरूप) इन्हीं राष्ट्रकूट शासकों की देन है। इस प्रतापी राजवंश ने आठवीं सदी के अंत तक शासन किया। इसके पश्चात पांचवा राजवंश पौराणिक राजा नल का था। छठी सदी से इस वंश का उल्लेख मिलता है। यह राज्य भी विदर्भ क्षेत्र में स्थित रहा है। कालांतर में इसने अपना राज्य विस्तार किया, परंतु चालुक्य राज्यवंश ने इसकी समाप्ति कर दी थी। छठा राजवंश विष्णुकुण्डी का था। इसके राजा माधव वर्मा जनाश्रय (535-585) का विशेष उल्लेख मिलता है। इसका राज्य आंध्र प्रदेश की ओर था। इसने उसी क्षेत्र में अपनी सीमाओं का विस्तार किया। इसके शासक विक्रमेन्द्र वर्मा तृतीय (620-631) को पराजित करके पुलकेशी ने उसकी सत्ता समाप्त कर दी थी।

सातवाँ राजवंश कलिंग का था। यह वंश वर्तमान गंजाम जिले के मुखलिंगम् (कलिंग नगर) से शासित होता था। इसके राजा इंद्र वर्मा तृतीय को सातवीं सदी के प्रारंभ में चालुक्य राज पुलकेशी ने हरा दिया था। आठवां राजवंश दक्षिण कौशल का था। मध्यप्रदेश के रायपुर-बिलासपुर क्षेत्रों में इसका शासन रहा था। 634 ई. में इस राजवंश के राजा हर्षदेव को पुलकेशी ने ही पराजित कर दिया था। गुप्त काल से आरंभ होकर यह राजवंश 634 ई. में समाप्त हो गया।

सुदूर दक्षिण के स्वतंत्र राज्य

कांची में पल्लव राज्य, माइसूर के उत्तरी प्रदेशों तथा उनके साथ लगे महाराष्ट्र के दक्षिणी प्रदेशों में कदम्बवंश, कर्नाटक के दक्षिणी प्रदेशों में एक अन्य स्वतंत्र राज्य, जिसकी राजधानी उदयवर थी, जहां आलूपवंश का शासन था। इस प्रकार सुदूर दक्षिण भी सारा का सारा सुरक्षित और स्वतंत्र था।

चालुक्य सम्राट पुलकेशी द्वितीय

सातवीं सदी के पूर्वार्ध में वातापी का चालुक्य राजा पुलकेशी द्वितीय था। यह राजा हर्षवर्धन की भांति ही प्रतापी और महत्वाकांक्षी था। इसीलिए वह एक विशाल साम्राज्य को स्थापित करने में सफल हुआ। इस राजवंश का संस्थापक कीर्ति वर्मा था, परंतु इसे प्रसिद्धी पुलकेशी द्वितीय के काल में ही मिली। इस प्रतापी शासक ने कहीं गुर्जरों को तो कहीं आलूपवंश, पल्लववंश, गुजरात के शासकों को परास्त किया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यह हर्षवर्धन का समकालीन था। अतः हर्षवर्धन से भी इसका संघर्ष हुआ और हर्ष को भी पुलकेशी द्वितीय के सामने झुकना पड़ा था। पुलकेशी द्वितीय का साम्राज्य कलिंग प्रदेश, दक्षिण कौशल बिष्पाकुण्डी (आन्ध्र) तक फैला था। चालुक्यों का यह राज्य दक्षिण में देर तक शासन करता रहा। इसके कई प्रतापी शासक हुए। लगभग 757 ई. में राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग द्वारा वातापी के चालुक्य राज्य का अंत कर दिया गया था।

तीन प्रतापी राजवंश

वास्तव में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात उत्तर और दक्षिण भारत में तीन प्रतापी राजवंश शासन कर रहे थे- पहला था पाल वंश, दूसरा था गुर्जर प्रतिहार तथा तीसरा था राष्ट्रकूट राजवंश। इनमें पाल वंश की स्थापना गोपाल नामक शासक ने 750 ई. में की थी और यह वंश 1025 ई. तक चला। तब तक इस राजवंश में धर्मपाल, देवपाल, विग्रहपाल, नारायणपाल, राजपाल, गोपाल द्वितीय. विग्रहपाल द्वितीय नामक राजा हुए। यह राजवंश बंगाल और मगध तक के प्रांतों पर शासन करता रहा। यद्यपि उत्तर भारत पर शासन करने के लिए गुर्जर प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों से भी इनके युद्ध हुए।

दूसरा महत्वपूर्ण राजवंश गुर्जर प्रतिहार था। इस राजवंश का पहला महत्वपूर्ण शासक नागभट्ट प्रथम था, जिसने 730 ई. में इस वंश की स्थापना की थी। यह वंश 942 ई. तक शासन करता रहा। इस वंश का साम्राज्य सामान्यतः कन्नौज से शासित रहा। इस वंश में प्रमुख शासक कक्कुक देवराज, वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय, रामभद्र, भोज (इस वंश का वास्तविक प्रतापी शासक भोज ही कहा जाता है, इसका शासनकाल 836ई. से 885 ई. तक माना गया है) महेन्द्र पाल, भोज द्वितीय और महीपाल थे।

तीसरे राजवंश का नाम राष्ट्रकूट था। इस वंश की स्थापना दन्तिदुर्ग नामक राजा ने 733 ई. में की थी। इसके शासकों में प्रमुख रहे कृष्ण प्रथम, गोविंद ध्रुव, गोविंद तृतीय, अमोघवर्ष, कृष्ण द्वितीय, इंद्र तृतीय, गोविंद चतुर्ग, अमोघ वर्ष द्वितीय एवं कृष्ण तृतीय। इस वंश ने 733 ई. से 968 ई तक शासन किया। इस वंश की राजधानी वर्तमान शोलापुर के पास मान्यखेत या मलखेड़ थी। एलोरा का शिवमंदिर इसी वंश के शासक कृष्ण प्रथम द्वारा नवीं शताब्दी में बनाया गया था।

यहां हमें चित्तौड़ के राणावंश को भी नहीं भूलना चाहिए। राजा गुहिल के द्वारा इस वंश की स्थापना सातवीं शताब्दी के प्रारंभ में की गई थी। इस राजवंश का सिक्का अफगानिस्तान तक चला था। इसके प्रतापी शासक बप्पा रावल ने ही रावल पिण्डी को बसाया था।

बप्पा रावल ने गुर्जर सम्राट नागभट्ट के साथ मिलकर मुसलमानों को देश की सीमाओं से बाहर खदेड़ा था। यह वंश मेदपाट (मेवाड़) पर शासन कर रहा था और प्रारंभ में गुर्जरों का सामंत रहा था। फिर भी यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत में हर्ष के पश्चात शक्ति के बिखराव का समय आया। विभिन्न राजवंशों में देश की राजनीतिक व्यवस्था विकृत-सी हो गई। यह सारी शक्तियां कई बार परस्पर संघर्षरत रहीं और इस प्रकार अपनी शक्ति का अपव्यय करती रहीं। संतोष का विषय यह है कि इन राजवंशों के कई प्रतापी शासकों ने अलग-अलग समय पर तिब्बत, नेपाल, भूटान, आसाम और पश्चिम में अफगानिस्तान और दक्षिण में श्रीलंका तक अपनी विजय पताका फहराई। उनके प्रताप और शौर्य के कारण पश्चिमी सीमा से मुसलमानों के प्रवेश की संभावनाएं क्षीण से क्षीणतर होती चली गई।

यही कारण था कि 712 ई. से लेकर, जब तक यह शक्तियां भारत में विद्यमान रहीं, तब तक पश्चिम की ओर से मुसलमानों का कोई ऐसा घातक आक्रमण नहीं हुआ जो अपना विशेष प्रभाव रखता हो। गुर्जर प्रतिहार शासकों ने मुसलमानों से कई संघर्ष किए और उन्हें भारत में घुसने से रोका। नागभट्ट ने सिन्ध के अरब शासकों को राजस्थान, गुजरात और पंजाब जैसे सीमावर्ती प्रांतों पर अधिकार करने से रोका। अरब गुजरात की ओर आगे बढ़ना चाहते थे परंतु गुजरात के चालुक्य राजा के हाथों 738 ई. में उनको करारी पराजय का सामना करना पड़ा था।

गुर्जर सम्राट महाराज मिहिर भोज

गुर्जर प्रतिहार वंश का प्रमुख शासक मिहिर भोज था। बगदाद का निवासी अल मसूदी 915 ई.-16 ई. में गुजरात आया था। वह कहता है कि जुज (गुर्जर) साम्राज्य में 1,80,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो हजार किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश-भर में प्रसिद्ध थी।

जिस समय अलमसूदी भारत आया था, उस समय मिहिर भोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु गुर्जर शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिर भोज के प्रताप से खड़े गुर्जर साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंततः स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता-सा प्रतीत होता है।

दक्षिण भारत और उत्तर भारत सहित पूरब व पश्चिम के सभी शासकों को संस्कृति नाशक इतिहासकारों ने नितांत उपेक्षित करने का राष्ट्रघाती प्रयास किया। पाठक तनिक ध्यान दें कि एक विदेशी आक्रांता मोहम्मद बिन कासिम हमारे समकालीन इतिहास के लिए इतना कौतूहल और जिज्ञासा का विषय क्यों बन गया, जिसने भारत पर केवल आक्रमण किया, यहां पर कोई लंबा शासन नहीं किया, न ही यहां की जनता के लिए कोई विशेष सुधारात्मक कार्य किए। जबकि पूरे देश के तत्कालीन राजाओं ने और सम्राट मिहिर भोज ने देश के लिए और देश की जनता के लिए जो कुछ किया, वह अंततः किस षड़यंत्र के छल-प्रपंचों की भेंट चढ़ गया? चिंतन करना पड़ेगा, छल-प्रपंचों को समझना पड़ेगा और उनकी एक एक परत को उधेड़-उधेड़कर देखना पड़ेगा कि अंततः हमें हमारे ही अतीत से और गौरवमयी इतिहास से क्यों और किसलिए इतनी निर्ममता से काट दिया गया?

क्या सब में एक षड़यंत्र दृष्टिगोचर नहीं होता? जब तथ्य हमारे पास हैं और हम जानते हैं कि पूरा देश कभी भी बिना शासकों के नहीं रह सकता तो ऐसा काल हम अपने विषय में ही क्यों काल्पनिक आधार पर तैयार कर लेते हैं कि अमुक काल में देश में कोई राजनीतिक तंत्र कार्य ही नहीं कर रहा था? हमारे पास राजनीतिक तंत्र था पर उस राजनीतिक तंत्र को हमने स्वतंत्रता का स्मारक न बनाकर उपेक्षा और छल-प्रपंचों की भेंट चढ़ा दिया। सारा भारत एक राजनीतिक चिंतन से अभिभूत था और मां भारती की वंदना में लगा हुआ था। दोष केवल इतना था कि हमारे पास सम्राट हर्षवर्धन और सम्राट मिहिर भोज के पश्चात शनैः-शनैः सम्म्राटों की परंपरा अपने अधोपतन की ओर अग्रसर हो रही थी।
क्रमशः

लेखक की ” वे थमे नहीं, हम थके नहीं ” ( भारत के 1235 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास , खंड – 01) नामक पुस्तक से । लेखक की यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।

– डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है )

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