मज़हब और क्रूसेड युद्ध अर्थात् धार्मिक युद्ध (भाग – 2)

dharmik yuddh religious war

मज़हब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना (पुस्तक से ..) अध्याय – 9 (भाग – 2)

 

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

इतिहास को हमें इतिहास बोध के साथ पढ़ना चाहिए। केवल घटनाओं को याद करने के दृष्टिकोण से इतिहास पढ़ना नितांत गलत है। इतिहास इसलिए बनाया जाता है कि अतीत की घटनाओं से हम शिक्षा लेते चलें और यह देखते चलें कि मज्जहब ने हमें कब-कब कितनी चोट पहुँचाई है?

हम घटनाओं पर लीपापोती न करें अपितु उन्हें सही दृष्टिकोण के साथ समझने का प्रयास करें और यह समझें कि यदि मज़हब उस समय नहीं होता और धर्म उसके स्थान पर होता तो क्या ऐसा होता? निश्चित रूप से नहीं।

जो लोग उस समय एक-दूसरे को मारने काटने के लिए घरों से निकले थे वे सभी के सभी विधर्मियों के प्रति द्वेषरत थे। यह सभी एक ऐसा डरावना दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे जिसमें मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु हो गया था और एक-दूसरे को अपना आहार बनाने के लिए खोज रहा था। जब मनुष्य मनुष्य को अपना आहार बनाने के लिए खोजने लगे तो समझो कि उसकी मानवता उससे दूर हो गई है और उस पर पाशविकता हावी और प्रभावी हो गई है। उनके पास भोजन सामग्री और परिवहन के साधनों का अभाव होने के कारण वे मार्ग में लूट-खसोट और यहूदियों की हत्या करते गए जिसके फलस्वरूप बहुतेरे मारे भी गए। इनकी यह प्रवृत्ति देखकर पूर्वी सम्राट् ने इनके कोंस्तांतीन नगर पहुँचने पर दूसरे दल की प्रतीक्षा किए बिना इनको बास्फोरस के पार उतार दिया। वहाँ से बढ़कर जब वे तुर्कों द्वारा शासित क्षेत्र में घुसे तो, मारे गए।

दूसरा दल पश्चिमी यूरोप के कई सुयोग्य सामंतों की सेनाओं का था। पूर्वी सम्राट् ने इन सेनाओं को मार्गपरिवहन इत्यादि की सुविधाएँ और स्वयं सैनिक सहायता देने के बदले इनसे यह प्रतिज्ञा कराई कि साम्राज्य के भूतपूर्व प्रदेश, जो तुर्कों ने हथिया लिए थे, फिर जीते जाने पर सम्राट् को दे दिए जाएँगे। यद्यपि इस प्रतिज्ञा का पूरा पालन नहीं हुआ और सम्राट् की सहायता यथेष्ट नहीं प्राप्त हुई, फिर भी क्रूसधर सेनाओं को इस युद्ध में पर्याप्त सफलता मिली।

अंतिओक से नवबंर, 1098 में चलकर सेनाएँ मार्ग में स्थित त्रिपोलिस, तीर, तथा सिज़रिया के शासकों से दण्ड लेते हुए जून, 1099 में जेरूसलम पहुँचीं और पाँच सप्ताह के घेरे के बाद जुलाई, 1099 में उस पर अधिकार कर लिया। उन्होंने नगर के मुसलमान और यहूदी निवासियों की निर्मम हत्या कर दी। यहाँ पर साम्प्रदायिकता ने अपना नंगा नाच किया और मुसलमानों व यहूदियों के बाल बच्चों और महिलाओं की निर्ममता के साथ हत्या की गई।

यहाँ पर यह नहीं देखना है कि जीत किसकी हुई बल्कि इतिहास की समीक्षा के दृष्टिकोण से यह देखना है कि हार किसकी हुई? और यदि इस पर विचार करेंगे तो निश्चित रूप से मानवता की पराजय हुई थी। जब बड़ी संख्या में लोगों को अपने प्राण गँवाने पड़े थे। गिद्धों की भाँति लोगों ने एक-दूसरे की संपत्ति को लूटा और लाशों को भी यह देख – देखकर दफनाया गया कि कहीं उनके शरीर पर कोई किसी प्रकार का स्वर्ण या चाँदी का आभूषण तो नहीं है? यदि है तो उसे उतार लिया जाए अर्थात् लूट लिया जाए। वैसे अधिकांश लाशें खुले आकाश के नीचे जंगली पशु और पक्षियों के लिए ही छोड़ दी गई थीं।

इस प्रकार इस युद्ध में मानव ने मानव होकर भी दानव का रूप धारण कर लिया था। चारों ओर उसकी दानवता नंगा नाच कर रही थी और अपने ही भाइयों का वध करने में उसे आनंद आ रहा था। इस प्रकार की दानवता को मानवता के रूप में स्थापित करने का ईसाई और इस्लामिक इतिहासकारों ने अपने-अपने मज़हब के पक्ष में प्रयास किया है। यद्यपि यह पूर्णतया गलत है। हमें निष्पक्ष होकर इस युद्ध का अवलोकन करना चाहिए और इस तथ्य को स्थापित करना चाहिए कि मानव जिस प्रकार उस समय नंगा होकर नाच कर रहा था उसमें मानवता की जीत नहीं हुई थी अपितु पराजय हुई थी।

द्वितीय क्रूस युद्ध (1147-1149)

जब सन् 1144 में मोसल के तुर्क शासक इमादुद्दीन जंगी ने एदेसा को ईसाई शासक से छीन लिया तो पोप से सहायता की प्रार्थना की गई और उसके आदेश से प्रसिद्ध संन्यासी संत बर्नार्ड ने धर्मयुद्ध का प्रचार किया। किसी संत का इस प्रकार युद्ध का प्रचार करना फिर मानवता के लिए एक खतरे की घंटी बन गया था। लगने लगा था कि फिर विनाश के बादल गहरा रहे हैं। वास्तव में जो लोग अपने आपको संत कहते हैं उनका संतत्व युद्ध का प्रचार करना नहीं है बल्कि शांति का प्रचार करना है। पर जब तथाकथित संत ही अपने धर्म को भूल जाएँ तो मजहब का राक्षस तो अपना नाच दिखाएगा ही।

पोप से सहायता की प्रार्थना का अर्थ था कि पोप के पास अपने अनुयायियों के रूप में एक विशाल सेना थी। पोप ने इस प्रार्थना पर कार्यवाही करते हुए जब अपने एक संत बर्नार्ड को धर्म युद्ध का प्रचार करने की आज्ञा दी तो उस सन्त ने विपरीत मतावलंबियों के विरुद्ध वैसा ही विषवमन करना आरम्भ किया जैसा पहले क्रूस युद्ध के समय पीटर ने किया था।

इस प्रकार पोप की संलिप्तता ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्मगुरु भी उस समय स्वार्थ प्रेरित हो गए थे। उन्हें मानवता की भलाई इसी में दिखाई दे रही थी कि उनका अपना धर्म, गुरुपद किस प्रकार सुरक्षित रह सकता है और किस प्रकार वह महिमामंडित होकर संसार पर अप्रत्यक्ष रूप से अपना शासन स्थापित कर सकते हैं? यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने की है कि हमारे ऋषि महात्माओं के द्वारा राजाओं को दिए गए परामर्श को भी ईसाई और मुस्लिम इतिहासकारों ने यह कहकर कोसा है कि ये लोग राजनीति में हस्तक्षेप करके अपना वर्चस्व स्थापित करते थे। इसे इन लोगों ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था का नाम देकर भारत के इतिहास को विकृत करने का प्रयास किया है। जबकि इन्हें अपने तथाकथित धर्म गुरुओं के इस प्रकार के आचरण में आज तक भी कोई त्रुटि दिखाई नहीं दी। यद्यपि इनके धर्म गुरुओं के इस आचरण ने मानवता का भारी अहित किया। अस्तु।

मज्जहबी विष फिर से लोगों की नसों में चढ़ गया और पुराने घावों को कुरेदते हुए सब एक-दूसरे के प्राण लेने के दृष्टिकोण से घरों से निकल पड़े। ‘विकिपीडिया’ के अनुसार इस युद्ध के लिए पश्चिमी यूरोप के दो प्रमुख राजा (फ्रांस के सातवें लुई और जर्मनी के तीसरे कोनराड) तीन लाख की सेना के साथ थलमार्ग से कोंस्तांतीन होते हुए एशिया माइनर पहुँचे। इनके परस्पर वैमनस्य और पूर्वी सम्राट् की उदासीनता के कारण इन्हें सफलता न मिली। जर्मन सेना इकोनियम के युद्ध में 1147 में परास्त हई और फ्रांस की अगले वर्ष लाउदीसिया के युद्ध में। पराजित सेनाएँ समुद्र के मार्ग से अंतिओक होती हुई जेरूसलम पहुंचीं और वहाँ के राजा के सहयोग से दमिश्क पर घेरा डाला, पर बिना उसे लिए हुए ही हट गई। इस प्रकार यह युद्ध नितांत असफल रहा।

यद्यपि हमारा मानना है कि यह युद्ध साम्प्रदायिकता के जिस विष को लेकर आरम्भ हुआ था उसको और भी अधिक गहनता के साथ फैलाने में सफल रहा। तब से लेकर आज तक भी लोगों ने कभी यह नहीं सोचा कि साम्प्रदायिक या मज्जहबी सोच किस प्रकार उत्पाती व उन्मादी हो सकती है? यदि उस समय के लोगों की मानसिकता पर विचार करें तो पता चलता है कि युद्ध चाहे असफल हो गया हो पर युद्ध की मानसिकता अभी थकने का नाम नहीं ले रही थी। यही कारण रहा कि लोग शीघ्र ही तीसरे क्रूस युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गए।

तृतीय क्रूस युद्ध (1188-1192)

लूटपाट, डकैती और बलात्कार जब शासन के प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित हो जाते हैं तो सर्वत्र अराजकता फैल जाती है। अराजकता का प्रतिशोध भी अराजकता से ही दिया जाता है। जिससे सर्वत्र महाविनाश होने लगता है। जब संसार में मजहबी शासकों के विजय अभियानों की आँधी उठी तो इन आँधियों ने भी सर्वत्र महाविनाश की लीला मचा दी।

लूटपाट, हत्या, डकैती और बलात्कार को अपने शासन का आधार बनाकर काम करने वाले मज़हबी शासकों ने जबरन विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिए, परन्तु कभी भी वे इन साम्राज्यों की देर तक सुरक्षा करने में सफल नहीं हुए। इसका कारण केवल एक था कि राजा के दुर्गुणों को अंगीकार कर उस समय उनकी प्रजा भी ऐसे ही गुणों से भर गई थी। जब प्रजा भी दुर्गुणों से भर जाती है तो वह राजा के नियंत्रण से बाहर हो जाती है। वैसे भी राजा प्रजा के भीतर दुर्गुण पैदा करने के लिए नहीं बनाया जाता बल्कि सदुणों की वृद्धि करने के लिए बनाया जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि राजा स्वयं भी सगुणी हो।

मजहबी दृष्टिकोण से दूसरों के राज्यों को हड़प हड़पकर अपने साम्राज्य में मिलाने की सोच रखने वाले इन मज़हबी शासकों के साम्राज्य लड़ाई -झगड़े, कलह और बड़ी संख्या में लोगों के नरसंहार का कारण बनते रहे।

कभी भी स्थायी शांति इनमें स्थापित नहीं रही। टर्की के शासकों ने भी इसी रास्ते पर चलते हुए अपना एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इस तीसरे युद्ध का कारण तुर्की की शक्ति का उत्थान ही माना जाता है। विशाल तुर्की साम्राज्य के सुलतान सलाउद्दीन (1137-1193) ने 1187 में जेरूसलम के ईसाई राजा को हत्तिन के युद्ध में परास्त कर बंदी बना लिया और जेरूसलम पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

इस बंदरगाह का बचाव 1188 में करने के बाद ईसाई सेना ने दूसरे बंदरगाह एकर को सलाउद्दीन से लेने के लिए उस पर अगस्त, 1189 में घेरा डाला। सलाउद्दीन ने घेरा डालने वालों को घेरे में डाल दिया। जब 1191 के अप्रैल में फ्रांस की सेना और जून में इंग्लैंड की सेना वहाँ पहुँची तब सलाउद्दीन ने अपनी सेना हटा ली और इस प्रकार जेरूसलम के राज्य में से केवल समुद्रतट का वह भाग, जिसमें ये बंदरगाह (एकर तथा तीर) स्थित थे, शेष रह गया।

इस युद्ध के लिए यूरोप के तीन प्रमुख राजाओं ने बड़ी तैयारी की थी, पर वह सहयोग न कर सके और पारस्परिक विरोध के कारण असफल रहे। प्रथम जर्मन सम्राट् फ्रेडरिक लालमुँहा (बार्बरोसा), जिसकी अवस्था 80 वर्ष से अधिक थी, दूसरा फ्रांस का राजा फिलिप ओगुस्तू अपनी सेना जेनोआ के बंदरगाह से जहाजों पर लेकर चला, पर सिसिली में इंग्लैंड के राजा से विवादवश एक वर्ष नष्ट करके अप्रैल, 1181 में एकर पहुँच पाया, तीसरे इस क्रूस युद्ध का प्रमुख इंग्लैंड का राजा रिचर्ड प्रथम था, जो फ्रांस के एक प्रदेश का ड्यूक भी था और अपने पिता के राज्यकाल में फ्रांस के राजा का परम मित्र रहा था। इसने अपनी सेना फ्रांस में ही एकत्र की और वह फ्रांस की सेना के साथ ही समुद्रतट तक गई। इंग्लैंड का समुद्री बेड़ा 1189 में ही वहाँ से चलकर मारसई के बंदरगाह पर उपस्थित था। साम्प्रदायिक आधार पर लड़ा गया यह युद्ध भी मानवता के लिए भारी विनाशकारी रहा।

क्रमशः

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