Taimur-Lang

इस्लाम के नाम पर विजय अभियानों का आयोजन करने वाले प्रत्येक आक्रमणकारी ने मज़हबी जुनून और उग्रवाद का परचम लहराकर सारे संसार को आतंकित करने का कार्य किया। इस दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो इस्लामिक आतंकवाद कल परसों की बात नहीं है, यह इस्लाम के जन्म के साथ ही पैदा हुआ है। यह अलग बात है कि देश, काल व परिस्थिति के अनुसार भूमण्डल पर इसका विस्तार कम या अधिक क्षेत्र में रहा। इस्लाम के नाम पर जिन आक्रमणकारियों ने अपने विजय अभियान चलाए उन्हीं इस्लामिक आक्रमणकारियों में से एक नाम तैमूर लंग का भी है। तैमूरलंग के अपने इतिहासकारों का कहना है कि लगभग 70 वर्ष के जीवन में इस्लामिक आतंकवाद और साम्प्रदायिक सोच से प्रेरित होकर 35 विजय अभियान भारत के विरुद्ध चलाये थे। भारत में उसने हरिद्वार से लेकर पश्चिम में कैरो तक के प्रदेश में भारी विनाश किया था।

इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि तैमूर लंग ने भारत के विरुद्ध इतने व्यापक स्तर पर विनाश मचाने का संकल्प केवल गाजी बनने के लालच में लिया था। तैमूर ने स्वयं कहा था- काफिरों (हिन्दुओं) के विरुद्ध एक अभियान चलाकर गाजी बनने की इच्छा मेरे मन में पैदा हुई, क्योंकि मैंने सुना है कि काफिरों की हत्या करने वाला गाजी होता है। मैं अपने दिमाग में यह तय नहीं कर पा रहा था कि चीन के काफिरों के विरुद्ध पहले जाऊँ या हिन्दुस्तान के। इस बारे में मैंने कुरान से हुकुम लिया। मैंने जो पद निकाला वह यों है-हे पैगंबर! काफिरों, नास्तिकों से लड़ाई छेड़ दो, और उनसे बड़ी कठोरता से पेश आओ।

उपरोक्त उद्धरण हमने इलियट एण्ड डाउसन के ग्रंथ से लिया है। इसी ग्रंथ के पृष्ठ 397 पर लिखा है-कि तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व अपने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था-

हिन्दुस्तान पर हम लोग उस देश के लोगों को मुसलमान बनाकर काफिरपन की गंदगी से उस देश की जमीन को पाक और साफ कर सकें और उन लोगों के मन्दिरों तथा मूर्तियों को नष्ट कर हम लोग गाजी और मुजाहिद कहला सकें।

मजहब की यह गंदगी करती सोच खराब।
मानव को दानव करे, है ऐसी बुरी शराब ।।

तैमूर के लिए इस्लाम की व्यवस्था के अनुरूप इससे उत्तम कोई आदर्श या जीवनोद्देश्य नहीं हो सकता था कि वह भारत से काफिरपन (हिन्दुत्व) को समाप्त करने के लिए आये और उसके विनाश के लिए अपनी सारी शक्ति का पूर्ण मनोयोग से उपयोग करे। वास्तव में वामपंथियों ने जिस प्रकार मजहब को एक अफीम कहा है, उनका यह कथन इस्लाम के आक्रमणकारियों पर पूर्णतया सटीक बैठता है, जो मजहब की शराब पी-पीकर भारत की ओर या विश्व के अन्य देशों की ओर अपने दुष्ट दानव दल को लेकर चले और लूटपाट, डकैती, हत्या, बलात्कार और नरसंहार के कीर्तिमान स्थापित करने को ही उन्होंने उस समय का सबसे बड़ा पुण्य कार्य मान लिया था। भारत की ज्ञान परम्परा में जब व्यक्ति पाप को पुण्य मानने लगता है तो उसे मानव का अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञानता मानवता का बहुत भारी अनर्थ करती है। इससे भी बड़ा अनर्थ तब होता है जब व्यक्ति अज्ञान को भी ज्ञान मान लेता है और अपने उस तथाकथित ज्ञान से पगलाकर संसार को भारी कष्ट में डाल देता है। बस, मुस्लिम लोग यही कर रहे थे। इनका ज्ञान पगला चुका था और वह यह नहीं देख रहा था कि उसके सामने जिनके धड़ कट कटकर धरती पर गिर रहे हैं वह भी तो मानव ही हैं। इसकी दृष्टि में वे मानव नहीं थे अपितु काफिर थे और काफिरों के खून में स्नान करना इसके लिए सबसे बड़ा सबाब बन चुका था।

सबकी अपनी अपनी चाहना, अपने अपने चाव।
इस्लाम बढ़े इस हिंद में, थी एक सभी की चाह ।।

इतिहास के इस सच को जिन लोगों ने तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए दबाने का काम किया है उन्होंने भी मानवता का अहित किया है। थोड़ी देर के लिए हम यह मान लेते हैं कि उन्होंने यह कार्य इसलिए किया हो कि पिछली कड़वाहट को भूलो और आगे बढ़ो। लेकिन जिनके लिए यह किया गया था उन्होंने न तो कड़वाहट को भुलाया और ना ही वे आगे बढ़े।

वे क्रूर सांप्रदायिकता के खूंटे से बंधे रहे। चौदह सौ वर्ष पहले के वहशीपन के कार्यों में वे आज भी लगे हुए हैं। उन्होंने न तो अपने इतिहास को भुलाया और न ही अपने इतिहास पुरुषों को भुलाया। वे अपने इतिहास और इतिहास पुरुषों से शिक्षा लेकर उनके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं और सारे संसार को दारुल इस्लाम के झंडे तले ले आने के अपने कार्य में लगे हुए हैं।

जब तैमूर चला आतंक का पर्याय बनकर

संसार के लिए आतंक और विनाश का पर्याय बनकर मार्च 1398 में तैमूर ने कटक के पास से सिंधु नदी को पार किया और तुलुम्ब नामक कस्बे के सारे हिन्दुओं को अपनी मजहब की पाशविकता की प्यासी तलवार का शिकार बना दिया और उनका सारा धनादि उनसे छीन लिया। इस प्रकार पहले झटके में ही हजारों हिन्दू तैमूर की तलवार से बलि का बकरा बन गये। इसके बाद तैमूर जब भारत के शीश कश्मीर में प्रविष्ट हुआ तो उसने वहाँ पर भी ऐसा ही तांडव मचाया। हिन्दुओं पर अनगिनत निर्ममतापूर्ण अत्याचार किए। इस प्रकार वह आतंक का पर्याय बन कर भारत आया था।

अपने मजहबी उन्माद में पगलाए इस विदेशी क्रूर आक्रमणकारी ने भारतवर्ष के हिन्दू किसानों से उनका अन्न तक छीन लिया था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि हिन्दुस्तानी लोग भूख से मरने लगें। इतने पर भी जब उसे संतोष न हुआ तो उसने लूटे गये क्षेत्रों में आग लगा दी। उसके ऐसे अत्याचारों को देखकर मानवता कराह उठी थी। चारों ओर चीख-पुकार और दुःखी लोगों की आवाजें सुनाई देती थीं। पर इस बहरे गूंगे तैमूर के लिए ये सारी चीख पुकारें दुःख का कारण न होकर आनन्द का विषय बन गई थीं। उसके इस प्रकार के आनन्द का कारण यही था कि वह अपने मन से ऐसे ही ‘मनमोहक’ दृश्यों की कल्पना करके अपने घर से चला था।

कश्मीर में अपने आतंक का साम्राज्य स्थापित कर तैमूर फतहबाद, राजपुर और पानीपत में अपने मज्जहबी आतंक से काफिरों को आतंकित करता हुआ अन्त में दिल्ली आ धमका। दिल्ली के बहुत से हिन्दुओं को तैमूर के अत्याचारों की सूचना पहले ही मिल चुकी थी कि तैमूर अब से पूर्व मुलतान, दीपालपुर, सरसुती, कैथल आदि में कितने ही अत्याचार कर चुका है। हृदय को झकझोर देने वाले तैमूरी अत्याचारों की कहानी से बहुत से हिन्दू राजधानी दिल्ली से इधर-उधर भाग गये या जिन्हें अवसर मिला उन्होंने आक्रांता के क्रूर अत्याचारों से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, अथवा अपने बच्चों व पत्नी को जीवित ही जला दिया। जो हिन्दू बचे उनके साथ क्रूरता की सीमाएँ लाँधकर अत्याचार किये गये। आत्मरक्षा में हिन्दुओं के द्वारा अपने ही बच्चों व परिजनों को जला देने की ऐसी हृदयविदारक घटनाओं को इतिहासकार या कोई लेखक दो चार पंक्तियों में लिख कर आगे बढ़ जाता है, परन्तु जब इन भयावह दृश्यों की कल्पना की जाती है या यह अनुभव किया जाता है कि यदि यह अत्याचार मेरे साथ हो रहे होते तो कैसा लगता? तब पता चलता है कि हमारे पूर्वजों ने कितने अमानवीय और पाशविक अत्याचारों को सहन कर अपना धर्म और संस्कृति बचाने का व्रत निभाया।

तैमूर का उद्देश्य भी हिन्दुत्व का विनाश ही था

तैमूर का जीवनीकार मुलफुजात-ए-तैमूर में तैमूर को उद्धृत करते हुए हमें बताता है कि उसने दिल्ली के लिए प्रस्थान करने से पूर्व कह दिया था- “मैंने तेहाना से अपना माल असबाब भेज दिया था। मैंने जंगलों और पहाड़ों के रास्ते सफर किया। मैंने 2000 शैतान जैसे लोगों की हत्या की, उनकी पत्नियों और बच्चों को बंदी बनाया, और उनके सारे धन तथा गायों को लूट लिया। समाना, कैथल और असपंदी के सारे लोग धर्मविरोधी बुतपरस्त, काफिर और नास्तिक हैं जो अपने-अपने घरों में आग लगाकर अपने बच्चों सहित दिल्ली भाग गये, और सारा देश सूना कर गये।”

एक क्रूर दरिंदा भारत की छाती पर था आ बैठा।
हिन्द की अज्जमत को जिसने बेशर्मी से था लूटा ।।
उसके निन्दित कर्मों से इतिहास छुपाता है चेहरा।
जिसने मानवता के ऊपर बिठा दिया था पहरा ।।

तैमूर लंग के आक्रमण का मूलोद्देश्य हिन्दुत्व का विनाश करना था। गाजी बनने का चाव था और दीनी खिदमत में उसकी अगाध निष्ठा थी। उसे उलेमा और सूफियों ने परामर्श दिया- “इस्लाम को मानने वाले सुल्तान का और उन सभी लोगों का, जो मानते हैं, कि अल्लाह के अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का पैगंबर है, यह परम कर्ततव्य है कि वे इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए युद्ध करेंगे, उनका पंथ सुरक्षित रह सके, और उनकी विधि व्यवस्था सशक्त रही आवे, वह अधिकाधिक परिश्रम कर अपने पंथ के शत्रुओं का दमन कर सकें। विद्वान् लोगों के ये आनंददायक शब्द जैसे ही सरदारों के कानों में पहुँचे, उनके हृदय हिन्दुस्तान में धर्म युद्ध करने के लिए, स्थिर हो गये और अपने घुटनों पर झुक कर, उन्होंने इस विजय वाले अध्याय को दोहराया।” (संदर्भ: तैमूर की जीवनी ‘मुलफुजात-ए-तैमूर’ एलियट एण्ड डाउसन खण्ड तृतीय पृष्ठ 397)।

इस्लामिक आक्रमणकारियों के बारे में दिए गए ऐसे उदाहरणों से पता चलता है कि उस समय इस्लामिक आक्रमणकारी और उनकी सेना हिन्दुस्तान की ओर वैसे ही भागती या लपकती थी जैसे कोई किसान अपनी लहलहाती फसल को चाव से काटने के लिए खेत की ओर जा रहा हो। वास्तव में उस समय हिन्दू इन मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए एक फसल जैसे ही हो गए थे।

काट दिए गए दस हजार हिन्दू

भटनेर में हिन्दुओं ने तैमूर की सेना का सामना किया। धर्म और स्वतन्त्रता की रक्षार्थ हिन्दुओं ने जमकर संघर्ष किया, परन्तु विजयश्री नहीं मिली, तो उन लोगों ने स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर अपना सिर मौन रहकर चढ़ा दिया। तैमूर की उक्त जीवनी के पृष्ठ 421-422 पर लिखा है-“इस्लाम के योद्धाओं ने हिन्दुओं पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया और तब तक युद्ध करते रहे जब तक अल्लाह की कृपा से मेरे सैनिकों के प्रयासों को विजय की किरण नहीं दीख गयी। बहुत थोड़े समय में ही किले के सभी व्यक्ति तलवार के घाट उतार दिये गये और समय की बहुत छोटी अवधि में ही दस हजार हिन्दू लोगों के सिर काट दिये गये। अविश्वासियों के रक्त से इस्लाम की तलवार अच्छी तरह धुल गयी, और सारा खजाना सैनिकों की लूट का माल बन गया।”

काटे हजारों हिन्दू और जी भरके की थी लूटपाट।
ढेर लगा दिए शीशों के जमकर की थी मारकाट ।।

जहाँ मुसलमानों के नायक या आदर्श व्यक्तित्व की सोच ऐसी हो कि हिन्दुओं के रक्त से धरती धुल गई और हिन्दुओं के खजाने को सैनिकों ने लूट का माल बना दिया- वहाँ पर यह कैसे माना जा सकता है कि वे लोग हिन्दू समाज के साथ समन्वय बनाकर रहने की भावना में विश्वास करते हैं? जिनके आदर्श नायकों की सोच घृणित हो उनके अनुयायियों की सोच का घृणित होना भी अनिवार्य है। आज जिन लोगों को हम हिन्दुओं के धन माल को लूटते हुए या उनकी बहन बेटियों के साथ अत्याचार करते हुए या हिन्दुस्तान का इस्लामीकरण होने पर हिन्दुओं के घर व जमीन जायदाद उनके हो जाने के सपने देखते हैं या ऐसे ही नारे लगाते या भाषण देते दीखते हैं, उनके बारे में हमें ये समझ लेना चाहिए कि ये सारे के सारे लोग तैमूर लंग के ही मानस पुत्र हैं। इसलिए यह नहीं मानना चाहिए कि जो लोग तैमूर को अपना आदर्श मानते हैं उनकी सोच तैमूर से कहीं अलग होगी।

लूट ली गईं हजारों हिन्दू महिलाएँ

उसी पुस्तक में आगे उल्लेख है कि “जब मैंने सरस्वती नदी के विषय में पूछा, तो मुझे बताया गया कि उस स्थान के लोग इस्लाम के पंथ से अनभिज्ञ थे। मैंने अपनी सैनिक टुकड़ी उनका पीछा करने भेजी और एक महान (भयंकर) युद्ध हुआ। सभी हिन्दुओं का वध कर दिया गया, उनकी महिलाओं तथा बच्चों को बंदी बना लिया गया और उनकी संपत्तियाँ और वस्तुएँ मुसलमानों के लिए लूट का माल हो गयीं। सैनिक अपने साथ कई हजार हिन्दू महिलाओं और बच्चों को साथ ले लौट आये। हिन्दू महिलाओं और बच्चों को मुसलमान बना लिया गया।”

जाट भारतवर्ष की एक क्षत्रिय जाति है। इसका एक गौरवपूर्ण इतिहास है। कितने ही स्थलों पर जाट रणबांकुरों ने अपनी वीरता का प्रदर्शन कर देश-धर्म की रक्षा की है। भारत की क्षत्रिय जातियों में जाटों का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने तैमूर के काल में भी अपना शौर्य प्रदर्शन किया, और शत्रु के जमकर दाँत खट्टे किये। तैमूर ने अपनी जीवनी में लिखा है-“मेरे ध्यान में लाया गया था कि ये उत्पाती जाट चींटी की भाँति असंख्य हैं। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा महान उद्देश्य अविश्वासी हैं। हिन्दुओं के विरुद्ध धर्मयुद्ध करना था। मुझे लगने लगा कि इन जाटों का पराभव (पूर्णतः विनाश) कर देना मेरे लिए आवश्यक है। मैं जंगलों में और बीहड़ों में घुस गया, और दैत्याकार दो हजार जाटों का मैंने वध कर दिया। उसी दिन सैयदों, विश्वासियों का एक दल जो वहीं निकट ही रहता था, बड़ी विनम्रता और शालीनता से मुझसे भेंट करने आया और उनका बड़ी शान से स्वागत किया गया। मैंने उनके सरदार का बड़े सम्मान से स्वागत किया।” (वही पुस्तक पृष्ठ 429)

एक लाख हिन्दुओं की करायी थी हत्या

तैमूर की उक्त जीवनी में उल्लेख है- उन्तीस तारीख को मैं पुनः अग्रसर हुआ और जमुना नदी पर पहुँच गया। नदी के दूसरे किनारे पर लोनी का दुर्ग था। लोनी दुर्ग को तुरन्त विजय कर लेने का मैंने निर्णय किया। अनेकों राजपूतों ने अपनी पत्नियों तथा बच्चों को घरों में बन्द कर आग लगा दी, और तब वे युद्ध क्षेत्र में आ गये। शैतान की भाँति (अर्थात् एक वीर योद्धा की भाँति) लड़े और अन्त में मार दिये गये। दुर्ग रक्षक दल के अन्य लोग भी लड़े और कत्ल कर दिये गये, जबकि बहुत से लोग बंदी बना लिये गये। दूसरे दिन मैंने आदेश दिया कि मुसलमान बंदियों को पृथक् कर दिया जाए, और उन्हें बचा लिया जाए, किन्तु गैर मुसलमानों को धर्मांतरणकारी तलवार द्वारा कत्ल कर दिया जाए। मैंने यह आदेश भी दिया कि मुसलमानों के घरों को सुरक्षित रखा जाए, किन्तु अन्य सभी घरों को लूट लिया जाए और विनष्ट कर दिया जाए। (‘एलियट और डाउसन’ खण्ड तृतीय पृष्ठ 432-33)

यहाँ तैमूर ने एक लाख हिन्दुओं का एक दिन में ही वध करा दिया था। वध के उपरान्त भी उन सबके कटे हुए सिरों को एक साथ एक स्थान पर एकत्र कराके उनका टीला बनवा दिया था। यह कार्य तैमूर ने लोनी के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की हत्या करके पूर्ण किया था। जिसके परिणाम स्वरूप दूर-दूर तक लोगों में आतंक और भय व्याप्त हो गया था। चारों ओर दुर्गंध फैल गयी थी और उस दुर्गंध, ने महामारी का रूप ले लिया था। इसलिए बहुत से लोगों ने अपने घर बार छोड़ दूर चले जाने का निर्णय ले लिया था। आप तनिक कल्पना करें कि जो हिन्दू लोग अपने मुर्दों को भी यह सोचकर तुरन्त चिता की भेंट चढ़ा देते हैं कि इनके रहने से दुर्गंध फैलेगी और पर्यावरण प्रदूषित होगा, वायु विषैली बनेगी और उसका जीवन व स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ेगा, वे लोग एक लाख लाशों से निकलती हुई दुर्गंध को कैसे सहन कर पाए होंगे? और एक लाख लाशों की दुर्गंध कितनी दूर-दूर तक फैल गई होगी? सचमुच वह कितना आतंकपूर्ण दृश्य रहा होगा?

पाशविकता की भेंट चढ़े लाख-लाख थे लोग यहाँ।
दानवता सिर चढ़ बोल रही हुआ धर्म का ढोंग यहाँ॥

अपनी जीवनी तुजुके तैमूरी को तैमूरलंग कुरान की इस आयत से ही प्रारम्भ करता है ‘ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सख़्ती बर्तों।’ वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है- हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है। (आगे वर्णित है) (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें।

क्रमशः

मेरी “मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना” पुस्तक से ….

– डॉ राकेश कुमार आर्य

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