विश्व शान्ति हेतु इस्लामिक दर्शन में संशोधन आवश्यक

इस्लामिक दर्शन

सामान्यतः आज देश के विभिन्न भागों में बंग्ला देशी व पाक परस्त ज़िहादी अनेक प्रकार से इस्लामिक आतंकवाद में लिप्त हैं, जिससे बढती हुई राष्ट्रीय व सामाजिक समस्याओं का किसी को अनुमान ही नहीं हो रहा है । क्योंकि भारत की हज़ारों वर्ष पुरानी सत्य सनातन संस्कृति और दर्शन को आज के छद्म सेक्युलर केवल मैकाले व मार्क्सवाद की दृष्टि से देखने के आदी हो चुके हैं।साथ ही हमारी संस्कृति को नकारने के लिए पाकिस्तानी विचारधाराओं को हमारे विभिन्न नगरों, विश्वविद्यालयों, मीडिया समूहों, बुद्धिजीवियों, अधिकारियों और राजनैतिक दलों में विस्तार मिल रहा है। जब इस्लामिक जिहाद से हमारे देश के साथ साथ पूरा विश्व ही चिंतित है, तो भी कुछ वर्षो पूर्व (17.03.2016) नई दिल्ली में आयोजित “वर्ल्ड सूफ़ी फोरम” में मोदी जी का कथन “इस्लाम का अर्थ शांति” ,क्या उनकी राजनैतिक विवशता थी ?

उन्होंने आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ने का विरोध करते हुए भी धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों को धर्मविरोधी बताया। उनके अनुसार सूफी विचार सभी को एक मानता है और वह मानवीयता व अमानवीयता के संघर्ष में अहम भूमिका निभा सकता है। इससे ऐसा आभास हुआ कि राजनेताओं की भाषण कला लोकतांत्रिक राजनीति के अनुरूप बहुत कुछ कहने की सामर्थ्य रखती है। जबकि मुगलकालीन इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब सूफियों ने भारत में इस्लाम स्थापित करने के लिए मुस्लिम आक्रान्ताओं का साथ दिया व लिया होगा ?

अगर सूफियों का सन्देश वैश्विक शांति है और वे सभी को एक मानते हैं व क़िसी में भेदभाव नहीं करते तो इस फोरम में सम्मलित होने वाले 20 देशों के मुस्लिम उलेमाओं को कश्मीर, अफगानिस्तान, ईराक़ व सीरिया आदि क्षेत्रों में चल रहे भयानक नरसंहार से कराहती हुई मानव पीड़ा का अहसास अभी तक क्यों नहीं हुआ ? भारतीय उपमहाद्वीप व यूरोप के विभिन्न देशो में जिहाद के लिए पैर पसारता दुर्दांत आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट आदि की भविष्य की योजनाओं के विरुद्ध क्या किसी मुस्लिम सूफी ने कोई सकारात्मक सक्रियता का परिचय दिया या भविष्य में ऐसा कुछ साहस करने की संभावना व्यक्त की है ? फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि आतंकवादी किसी सनक, मूर्खता या धनलोभ के कारण ही अपनी जान नहीं देते। वे समझते हैं कि वे अल्लाह की राह पर अल्लाह के लिए अपनी जान देते हैं। तभी तो अधिकतम आतंकवादी घटनाओं में एक विशेष (मुस्लिम) समुदाय की संलिप्तता को प्रायः प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सभी मानते हैं। जबक़ि कुछ वर्ष पूर्व के समाचार पत्रों के अनुसार अमरीकी संसद की आयी एक रिपोर्ट तो प्रत्यक्ष कहती है कि भारत में घरेलू इस्लामी आतंकवाद बढ़ रहा है।

इस पर भी ध्यान देने वाली बात यह है कि जब तक मदरसों में इस्लामी शिक्षा द्वारा जिहाद को पवित्र बताया जाता रहेगा तब तक आतंकवाद रुक नहीं सकता और आतंकवादी जिस विचारधारा के पोषक हैं उसमें पंथनिरपेक्षता, मानवता व मानवाधिकार आदि के दर्शन भी नहीं होते । इन इस्लामिक जिहादियों को विश्व में इस्लामिक झंडे लहराने की महत्वाकांक्षा ने भी अत्याचारी बना दिया है।

परिणामस्वरूप आज जिहादी मानसिकता से सभी व्यथित हैं फिर भी अगर इसके मूल कारणों की अवहेलना की जाती रहेगी तो इस्लाम में वैश्विक मानवीय विचारधारा का सूत्रपात कैसे हो सकेगा ? इसी सन्दर्भ में 31 जुलाई 1986 में दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्री जिलेसिंह लोहाट के कुरान के विषय में किये गये एक ऐतिहासिक निर्णय के अनुसार कुरान की उन आयतों में जो बहुत ही खतरनाक और घृणास्पद होने के कारण मुसलमानों व अन्य समुदायों के बीच भेदभाव व द्वेष का निर्माण करती हैं, आवश्यक संशोधन करवा कर साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने का प्रयास समस्त मानवतावादियों के लिए सार्थक हो सकता है। आज जब वर्तमान युग में मज़हबी आतंक ‘जिहाद’ से भारत सहित विश्व के अनेक देशों में मानवता संकट में है तो फिर कोई यह क्यों नही सोचता कि इस्लामिक विद्याओं और उसके दर्शन में सुधार करके सकारात्मक वातावरण बनाया जाए ?

यह विचित्र है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं , सामाजिक एवं मजहबी नेताओं आदि ने कभी भी अपने मजहबी दर्शन व विद्याओं में संशोधन का विचार ही नही किया बल्कि वे सभी रूढीवादी व कट्टरपंथी विचारों को या तो प्रोत्साहित करने में ही लगे रहे या फिर उदासीन रहे । काश ऐसा होता तो आज पृथ्वी निर्दोषों व मासूमों के रक्त से लाल न होती। जिहादी जनून के प्रकोप से समाज व संसार सुरक्षित रहते हुए विकास के पथ पर निर्बाध गति से अग्रसर रहता। साथ ही सभ्यताओं के टकराव से विश्व को सुरक्षित करते हुए शांति स्थापित करने में सरलता होती ।

अतः यह समझना होगा कि सत्य सनातन वैदिक हिन्दू धर्म वैसी शिक्षा नहीं देता है जैसी कुछ सम्प्रदायो में “अन्य धर्मियों की हत्या करो या उनका धर्मांतरण करो” अथवा “छलकपट की नीति अपनाकर अन्य धर्मियों का धर्मांतरण करो” पढ़ाया जाता है। कुरान के दूसरे अध्याय के 27 पृष्ठों में कम से कम 25 बार गैर मुस्लिमों को हानि पहुँचाने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है | उनके लिए नकारात्मक विशेषण भी हैं | जिसको पढ़ कर प्रश्न उठता है कि क्या इतनी अभद्र बातें भी मजहबी ग्रन्थ का हिस्सा हो सकती हैं? इसलिये अत्याचारी व अमानवीय कट्टरपंथी विचारधाराओं की जड़ों को ढूँढ कर उनको सकारात्मक बनाना कठिन हो सकता है परंतु असंभव नहीं ? यह आज की प्रमुख आवश्यकता है ।

यह भी विचार करना चाहिये कि महान् विद्वान व चार बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहें विलियम ग्लैडस्टोन ( जीवनकाल: 1809-1898) ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में यह उल्लेख किया था कि जब तक धार्मिक ग्रन्थ में ऐसी बातें रहेंगी तब तक दुनिया में शान्ति नहीं होने वाली | कुछ पिछले समाचारों से यह भी ज्ञात हुआ कि सन 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबान व अलक़ायदा आदि जिहादी संगठन पाक व अफगानिस्तान की सीमाओं पर अनेक छोटे छोटे बच्चों को धन देकर व जन्नत का वास्ता देकर जिहाद के लिये प्रशिक्षित करके “फिदायींन” बनाते हैं। इसके अतिरिक्त एक वरिष्ठ पत्रकार व राष्ट्रवादी विचारक के प्रकाशित एक लेख में जिहाद के विषय में कुछ निम्नलिखित तथ्य मिले–

~ए बी सी (ABC) के पत्रकार बिल रेडेकर के अनुसार – एक बार जब पेशावर के पास एक प्रसिद्ध मदरसे में फर्श पर बैठ कर 60 लडके कुरआन की पढाई कर रहें थे, “तो मैने उन छात्रों से पूछा कि स्कूल ख़त्म करने के बाद उनमें से कितने डॉक्टर या इन्जीनियर बनना चाहेंगे ? केवल दो लडकों ने हाथ उठाया | फिर मैंने पूछा कि कितने लड़के बड़े होकर जिहाद के लिए लड़ना चाहते हैं ? सबने हाथ उठा दिये।”

~एक पाकिस्तानी पत्रकार आरिफ जमाल ने कश्मीर में सक्रिय रहे 600 जिहादियों के अंतिम पत्रों का अध्ययन करके “एशिया टाइम्स” में शोध प्रकाशित किया था | उन्होंने पाया कि शायद ही ऐसा कोई पत्र हो जिसमें जिहाद में मरने के बाद इनाम स्वरूप जन्नत में मिलने वाली 72 हूरों का जिक्र न किया गया हो | इसका अर्थ स्पष्ट है कि उन्हें हुरों का लालच नहीं दिया गया होता तो वे जिहाद के लिए नहीं जाते | अपने अंतिम पत्र में जिहादियों ने यह लिख कर इसको जिहाद के लिए अत्यधिक उकसाने वाला बिंदु माना है |

~अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (UNAMA) की अधिकृत स्कालर क्रिस्टीन फेयर ने जिहादी मानव – बमों पर अध्ययन किया था | उन्होंने पाया कि लगभग सभी आत्मघाती जिहादी इस विश्वास से प्रेरित होते हैं कि “काफ़िर को मारना हमारा कर्तव्य है ” | इसमें किसी ने चाहे कोई गलत कार्य किया हो या नहीं , उसका “काफिर” होना ही काफी है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त विश्व के अनेक मानवतावादी व समाजशास्त्रियों का भी यह मानना है कि अगर समय रहते जिहादी मानसिकता को नियंत्रित नही किया गया तो वैश्विक जिहाद की विषबेल को फैलने से कोई रोक नही सकेगा ? इसलिए इस्लाम को शांति का मज़हब व इसके अनुयायियों को शांतिदूत बताने वालों को यह स्वीकार करना होगा कि इस्लामिक जिहाद अनेक हिंसात्मक,भयावह व विध्वंसकारी घटनाओं से मानवता के साथ साथ संसार के सुंदर रूप को भी नष्ट करने का एक जनून है। इसलिये इस्लामिक विद्याओं व इनके दर्शन शास्त्रो में आवश्यक सकारात्मक संशोधन करवाना इन विद्याओं के विशेषज्ञों और उदारवादी धर्मगुरुओं का प्रमुख दायित्व बनता है ।

अतः वर्तमान विज्ञानमय आधुनिक युग में मध्यकालीन रूढ़िवादिताओं व परंपराओं में आवश्यक संशोधनों द्वारा वैश्विक जिहाद को नष्ट करके विश्व में मानवता की रक्षा व शांति की स्थापना हेतु इस्लामिक उलेमाओं (धर्मगुरुओं) का महत्चपूर्ण सकारात्मक योगदान लिया जा सकता है।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
गाज़ियाबाद

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