ओ३म् ‘सत्य-सनातन वैदिक धर्म के प्रचार में सत्यार्थप्रकाश का प्रमुख स्थान’

maharishi dayanand

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सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को एक-एक वेद का ज्ञान दिया था। यह चार वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। इन वेदों में इस सृष्टि के प्रायः सभी रहस्यों सहित सभी विद्याओं का भण्डार है। वेदों का यह ज्ञान सर्वान्तर्यामी एवं सर्वव्यापक परमात्मा ने ऋषियों की आत्माओं में अपने जीवस्थ, जीवात्मा के भीतर स्थित अर्थात् अन्तर्यामी, स्वरूप से दिया था। परमात्मा के मनुष्यों व सभी प्राणियों की जीवात्माओं के भीतर व्याप्त होने के कारण उसे ऋषि कोटि की आत्माओं को वेदज्ञान देने में मनुष्यों के समान विद्यादान करने के बाह्य साधनों यथा शरीर व मुख आदि की आवश्यकता नहीं होती। हम ईश्वर से जब प्रार्थना करते हैं तो मौन होकर करते हैं। ईश्वर सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी होने से हमारी सभी बातों को जानता, सुनता व ठीक-ठीक समझता है। इसी प्रकार परमात्मा भी अपना ज्ञान मनुष्य की आत्मा में प्रेरणा देकर प्रदान करते हैं जिसे जीवात्मा ग्रहण कर लेतीे है। वेदों का ज्ञान इसी विधि से परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न ऋषियों व उनके माध्यम से अन्य ब्रह्मा आदि ऋषियों व मनुष्यों को प्रदान किया था। परमात्मा ने वेदों का ज्ञान अपनी निज भाषा संस्कृत में दिया था और इन वेद मन्त्रों के अर्थों का ज्ञान भी परमात्मा ने चार ऋषियों को व इन ऋषियों व ब्रह्मा जी ने अन्य ऋषियों व मनुष्यों को कराया था।

संसार में परमात्मा नाम की सत्ता का अस्तित्व सिद्ध है। इसका प्रमाण हमारी यह सृष्टि व इसके पदार्थ हैं जो अनेकानेक दिव्य गुणों से युक्त हैं। मनुष्य न तो सृष्टि की रचना कर सकता है न ही अग्नि, वायु, जल, शब्द व आकाश आदि सहित पृथिवी, सूर्य, चन्द्र व नक्षत्रों को बना सकता है। अतः मनुष्यों से इतर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, अदृश्य, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य व अविनाशी सत्ता से इस सृष्टि सहित मनुष्य आदि सभी प्राणियों की उत्पत्ति का सिद्धान्त तर्क, युक्ति से सिद्ध है जिसे शुद्ध व पवित्र सभी आत्मायें स्वीकार करती है। ईश्वर की ही तरह से आत्माओं का अस्तित्व भी सिद्ध है। मनुष्य का शरीर जड़ पदार्थ पृथिवी, अग्नि, वायु, जल व आकाश से बना होता है। चेतनता जड़ पदार्थों का गुण नहीं है। हमारी आत्मा अर्थात् हम चेतन सत्ता हैं जो जड़ सत्ता प्रकृति व भौतिक पदार्थों से सर्वथा भिन्न हैं। आत्मा अनादि, नित्य, अमर, चेतन, अल्पज्ञ, अल्पशक्ति से युक्त, जन्म-मरण धर्मा, कर्म करने की प्रवृत्ति वाली, सुख व दुःख का अनुभव करने वाली, भौतिक सृष्टि सहित आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करने की प्रवृत्ति वा इच्छा करने वाली सत्ता है। इसके जन्म का कारण व आधार इसके कर्म होते हैं जो इसने पूर्वजन्म में किये होते हैं। पूर्वजन्म के कर्म दूसरे पुनर्जन्म का आधार होते हैं। यदि कर्म न हों तो जन्म भी न हो। जीवात्मा कर्म के फलों का भोग करने के लिये ही जन्म लेती है और दुःखों से मुक्ति के लिये प्रयत्न करती है। वेदों का ज्ञान मनुष्य को सृष्टि व मनुष्य जीवन को दुःखों से मुक्त करने का मार्ग बताता है। वेदमार्ग का पूर्णतः पालन करने से जीवात्मा जन्म व मरण के दुःखों से दीर्घावधि के लिये मुक्त हो जाती है जिसे मोक्ष कहते हैं। मोक्ष में जीवात्मा सत्य, चित्त व आनन्दस्वरूप ईश्वर के सान्निध्य में आकाश में रहती है और ईश्वर के सान्निध्य से निरन्तर आनन्द का अनुभव व भोग करते हुए मुक्त आत्माओं से मिलती तथा लोक लोकान्तरों का भ्रमण आदि करती है। अतः आत्मा और ईश्वर पृथक-पृथक सत्तायें हैं। प्रकृति एक जड़ सत्ता है जो ईश्वर व जीवात्माओं से पृथक है। यह प्रकृति तीन गुणों सत्व, रज व तम गुणों वाली होती है। इसी से परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड, सृष्टि, लोक लोकान्तर व हमारे सौर्य मण्डल सहित इसके सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व ग्रह-उपग्रहों को बनाया है। यह सत्य व यथार्थ ज्ञान हमें वेदों ने ही कराया है। वेदों के ज्ञान को हमारे प्राचीन ऋषियों ने, जब किसी मत, सम्प्रदाय, रिलीजन व मजहब आदि का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, सारे संसार में प्रचारित किया था। महाभारत व उसके अनेक वर्षों बाद तक विश्व में सभी लोग वेदज्ञान को सत्य, तर्क एवं युक्तिसगत होने से स्वीकार करते व मानते थे।

सनातन धर्म वैदिक धर्म का पर्याय है। सनातन सदा से होने वाले पदार्थों व सत्ताओं को कहते हैं। ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति सनातन, अनादि व नित्य सत्तायें हैं। ईश्वर व उसका ज्ञान वेद भी सनातन है। प्रत्येक प्रलय के बाद सृष्टि और सृष्टि के बाद भोग काल व्यतीत हो जाने के बाद प्रलय होती है। इस प्रकार यह सृष्टि व प्रलय का क्रम दिवस-रात्रि की भांति सदा चलता रहता है। इस सिद्धान्त को सृष्टि को प्रवाह से अनादि व अनन्त होना कहते हैं। परमात्मा अनादि व नित्य सत्ता है। इसी प्रकार से उसका वेद ज्ञान भी नित्य है और यही ज्ञान अनन्त काल तक इसी रूप में सृष्टि में रहेगा। जो भी मनुष्य सत्य की खोज करेगा उसकी सन्तुष्टि वेद ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर ही होगी। वेद से आगे जानने के लिये कुछ शेष नहीं बचता। यह सत्य रहस्य है। इसे हमें समझना है। इस बात को ईश्वर के अनन्य भक्त और उसका योग समाधि में साक्षात्कार किये हुए ऋषि दयानन्द ने प्रत्यक्ष किया था। उन्होंने ही वेदों को विश्व का सर्वोपरि निभ्र्रान्त ज्ञान समझा था और लोक कल्याण की भावना से अपना सारा जीवन परहित को समर्पित कर वेदों का प्रचार किया था। वेदों व वैदिक मान्यताओं का प्रचार ही वस्तुतः सनातन सत्य धर्म का प्रचार है। ईश्वर से उत्पन्न वेदों पर आधारित यह वैदिक धर्म ही संसार के प्रत्येक मनुष्य का धर्म है। संसार के मत-मतान्तर धर्म न होकर मत, सम्प्रदाय आदि हैं। सभी मतों में जो सत्य ज्ञान है वह वहां वेदों से ही पहुंचा है और उनमें जो अविद्या की बातें हैं वह उन-उन मतों की अपनी हैं। इस रहस्य का ज्ञान ऋषि दयानन्द ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में युक्ति व तर्कों सहित प्रस्तुत किया है। अतः वेद व सत्यार्थप्रकाश मनुष्य जाति की सबसे मूल्यवान सम्पत्तियां, निधियां व ज्ञान के कोष हैं। संसार के सब मनुष्यों को वेदों का आदर करना चाहिये और वेदाध्ययन कर वेदों को यथार्थरूप में समझकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिये जिससे वह दुःखों से दूर रहते हुए आत्मा व शरीर की उन्नति करते हुए आत्मा के लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार कर मुक्ति वा मोक्ष को प्राप्त हो सकें। यही मनुष्य के लिये प्राप्तव्य होता है। समाधि व मुक्ति में परमानन्द को प्राप्त करने के लिये ही ईश्वर ने मनुष्यों को वेदों का ज्ञान दिया था। इस वेदज्ञान व लाभ की प्राप्ति वेदाध्ययन से इतर अन्य किसी प्रकार के साधनों से नहीं होती। अतः सबको वेदों की शरण में आना चाहिये।

सनातन उसे कहते हैं कि जो सदा से है और सदा रहेगा। वैदिक धर्म सृष्टि के आदि काल से है। यह इससे पूर्व के कल्पों के सर्गकाल में भी ईश्वर द्वारा उत्पन्न होकर प्रचलित था। इस कारण से वेद व वैदिक धर्म ही सनातन धर्म के पर्याय हैं। वर्तमान में जो मत-मतान्तर प्रचलित हैं वह सनातन धर्म कदापि नहीं कहला सकते। वेदों के विपरीत मान्यताओं से युक्त कोई भी मत व सम्प्रदाय सनातन कदापि नहीं हो सकता। मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, जन्मना जातिवाद, मांसाहार का खण्डन न करने और हिंसा आदि प्रवृत्त नाना मत-मतमतान्तरों में से कोई भी सनातन नहीं है। ऐसे सभी मतों का प्रचलन मध्यकाल में विगत दो-तीन हजार वर्षों में मुख्य रूप से हुआ है। इनसे पूर्व केवल वेद व वेदों पर आधारित ऋषियों के ग्रन्थ व मान्यतायें ही संसार में प्रचलित थी जो सर्वथा सत्य पर आधारित होती थी। वेदों पर आधारित वही मान्यतायें सत्य व सनातन थी और उनसे युक्त मान्यतायें व धर्म ही सनातन सत्य धर्म थीं। हमें वेद व इतर ग्रन्थों की मान्यताओं को सत्य की कसौटी पर कसकर परीक्षा करनी चाहिये और सत्य का ग्रहण तथा असत्य का त्याग करना चाहिये। इसी से हमारी सर्वांगीण उन्नति होगी, सभी मनुष्य दुःखों से मुक्त होंगे और विश्व में मत-सम्प्रदायों के मध्य होने वाली हिंसा सहित पक्षपात, शोषण तथा अन्याय की घटनायें समाप्त होंगी। यदि हमने वेदप्रचार की उपेक्षा की तो वर्तमान में देश व विश्व में जो समस्यायें हैं वह निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होंगी जिससे हमारी सबकी आत्मायें उन्नति के स्थान पर अवनति को प्राप्त होकर जन्म-जन्मान्तरों में मनुष्यता से गिरकर अनेक नीच योनियों में जन्म लेकर दुःख भोगेंगी। इस पर सबको ध्यान देने और अपेक्षित सुधार करने की आवश्यकता है।

महर्षि दयानन्द को सत्यार्थप्रकाश लिखने की आवश्यकता इस लिये आ पड़ी थी कि उनके समय में सत्य वैदिक मान्यतायें एवं वेद विलुप्त हो चुके थे। वेदों का अध्ययन बन्द हो गया था। वेद आसानी से प्राप्त नहीं होते थे। वेद मन्त्रों के सत्य अर्थ भी संस्कृत के विद्वानों तक को विदित नहीं थे। वेदज्ञान विद्वान व साधारण सभी की पहुंच से दूर था। इससे मनुष्य अविद्या से ग्रस्त होकर अकर्तव्यों को करते तथा कर्तव्यों से अनभिज्ञ होने के कारण नहीं करते थे। इन सब अभावों व अविद्या को दूर करने तथा समाज में वेदों को प्रचलित कर वैदिक जीवन पद्धति को प्रचारित करने के उद्देश्य से ऋषि दयानन्द ने वेदानुकूल ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश” की रचना की थी। सत्यार्थप्रकाश यथा नाम तथा गुण वाला ग्रन्थ है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से मनुष्य की सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती है। इसके पाठक की आत्मा में सत्यज्ञान का प्रकाश होता है और अविद्या व अज्ञान की निवृत्ति होती है। आत्मा ईश्वर व सत्य ज्ञान को प्राप्त होती है। मनुष्य को ईश्वर, आत्मा व सृष्टि के ज्ञान सहित अपने परिवारजनों, देश व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का यथार्थ बोध होता है जिसको करके उसकी आत्मा व जीवन की उन्नति होती है। वेदों व सत्यार्थप्रकाश से विद्या की उन्नति व अविद्या का नाश होने से भी देश को लाभ होता है। वेदों के अध्ययन की प्रेरणा मिलती है। ऋषि दयानन्द ने केवल सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ही नहीं लिखा अपितु ऋग्वेद का आंशिक तथा यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य भी किया है। उनका किया हुआ भाष्य संस्कृत तथा हिन्दी में उपलब्ध है। उनके अनुयायी विद्वानों ने चारों वेदों पर हिन्दी सहित अनेक भाषाओं में भाष्य टीकायें व प्रचार ग्रन्थ लिखे हैं जिनमें प्रस्तुत किया गया वेदार्थ सत्य व यथार्थ हैं। इनका अध्ययन व आचरण करने से मनुष्य के जीवन का कल्याण होता है। ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश तथा उनकी स्थापित संस्था आर्यसमाज ने देश से अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, सामाजिक कुरीतियां तथा सामाजिक असमानता सहित देश व समाज से अज्ञान, पक्षपात, शोषण, अन्याय आदि को दूर करने में महती भूमिका निभाई है। आर्यसमाज सिद्धान्त, मान्यताओं के आधार पर विश्व का श्रेष्ठतम संगठन है। इसके सिद्धान्त सत्य व हितकारी हैं। सबको सत्यार्थप्रकाश व आर्यसमाज को अपनाना चाहिये। इसी से मनुष्य व विश्व का कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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