बद्री विशाल –(बद्रीनाथ का मंदिर)* (बद्रीनाथ, केदारनाथ ,विश्वनाथ ,जगन्नाथ आदि के मंदिर की वास्तविकता )

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मैंने कई स्थानों पर लिखा देखा “जय बद्री विशाल”, इसको पढ़ने के बाद बदरीनाथ भगवान के विषय में जानने की उत्सुकता हुई । तब मालूम हुआ कि इससे मिलते जुलते और भी नाम है जैसे कि केदारनाथ ,विश्वनाथ ,जगन्नाथ आदि ।
प्रश्न हैं कि क्या ये सभी एक ही ईश्वर के नाम है या अलग अलग भगवान क्षेत्र के अनुसार है क्योंकि ओरिसा में जगन्नाथ ,उत्तराखंड में केदारनाथ ,बद्रीनाथ है ।
इसलिए ईश्वर को समझने के लिए ये वास्तविकता समझना जरुरी है।
बद्रीनाथ का मंदिर ;
ये मंदिर क्या है,बद्रीनाथ कौन है ,कब आए ,श्रृष्टि को बने कई अरब वर्ष हो चुके है जबकि ये मंदिर कुछ सौ साल पुराना ही है। इस विषय में प्रचलित अनेको पौराणिक मान्यताये है ,जिनमे विरोधाभास है ,तुकबंदी है ,सत्य के पटल पर विश्वास योग्य नहीं है।आप स्वयं ही पढ़ कर समझ लो ,ये आपके सम्मुख प्रस्तुत है।
पौराणिक मान्यताये:
१) बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित हैं । यह कभी भगवान शिव का निवास स्थान था लेकिन भगवान विष्णु ने इसे भगवान शिव से मांग लिया था। कहा जाता है कि एक बार मां लक्ष्मी जब भगवान विष्णु से रूठकर मायके चली गईं तब भगवान विष्णु यहां आकर तपस्या करने लगे। जब मां लक्ष्मी की नाराजगी खत्म हुई तो वह भगवान विष्णु को ढूंढते हुए यहां आई। उस समय इस स्थान पर बदरी का वन यानी बेड़ फल का जंगल था। बदरी के वन में बैठकर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी इसलिए मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बदरीनाथ नाम दिया।
२)यहां भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी। नर अपने अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्रीकृष्ण के रूप में पैदा हुए थे।
३) ‘जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी’ यानी जो व्यक्ति बदरीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता है।
४) एक बार मां लक्ष्मी बद्रीनाथ में बने हुए तुलसी भवन में ध्यानमग्न थीं। तभी भगवान विष्णु ने शंखचूर्ण नाम के एक राक्षस का वध किया था। जीत का जश्न मनाने के लिए पहले शंख बजाया जाता था, लेकिन विष्णु जी लक्ष्मी जी के ध्यान में विघ्न नहीं डालने चाहते थे, इसलिए उन्होंने शंख नहीं बजाया।तभी से बद्रीनाथ में शंख नहीं बजाने की परंपरा है।
५) सतयुग में बद्रीनाथ धाम की स्थापना नारायण ने की थी। भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है।
६) यहां शिवलिंग पर चने की दाल चढ़ाने से अज्ञात ऋणों की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। चने की दाल सवा पाव से सवा मन तक चढ़ाई जाती है।पांडवों ने वनवास के दौरान जब यहां वास किया था तो पितृ ऋण से मुक्ति के लिए उन्होंने चने की दाल से अभिषेक किया था।

विश्लेषण : जितनी भी पौराणिक कथाये है उन सभी में कुछ बाते एक जैसे होती है-।शिव / विष्णु /पार्वती आदि ने तप किया और ब्रह्मा ने आशीर्वाद दिया।
2.इस मंदिर में घी/ पैसा /दाल /सोना चांदी /कपडे आदि दान आदि दान करने से जन्म मरण से मुक्ति मिल जाती है।
3.इस मंदिर में पूजा से वर्तमान और कई कई जन्मो के पाप खतम हो जाते है।
4 यह एक प्राचीन मंदिर है जहा शिव रहते थे ,उन्होंने तपस्या की।
आप बुद्धि लगाकर खुले दिमाक से विचार करें क्या ये सब सत्य प्रतीत होता है ?
2.बदरी फल का वन बताते है ,आगे उसी नाम से मंदिर प्रसिद्ध हो गया ।फिर भगवान बद्रीनाथ किसी फल का नाम है ?और तो और बदरी फल नाम का कोई वृक्ष नही है।
3 महाभारत कथा में कही भी पांडवो के यहां आने और पिंडदान का का उल्लेख नहीं है।4.जो लोग मंदिर के बाहर भीख मांगते है ,दूकान लगाते है ,कुछ वहां चोरी करने वाले भी मिलेंगे ,इनका क्या भविष्य है ?क्योकि ये तो हमेशा भगवान् के सम्मुख ही रहते है।
5 पाप से मुक्ति , मोक्ष्य ,बिगड़े काम का बन जाना आदि ये पडित्तो द्वारा दी जाने वाली प्रमुख गारंटीया है।और इसी तरह के लालच पाखंड के जंजाल में ले जाती है।
6.दरअसल पाखंड के जंजाल में वो फसते है जो कर्म करने में और ईश्वर के न्याय में विश्वास नहीं करते।सिर्फ पंडित नाम के किसी व्यक्ति को बुलाया ,उसने रटे रटाए उल्टे सीधे मंत्र पड़े ,तिलक लगाया अर्थी गई पाप से मुक्ति ,खुल गया मोक्ष का द्वार,ये कैसे संभव है?
विश्लेषण विस्तार से :–

१ )बद्री का अर्थ : ऐसा प्रतीत होता है की बद्री शब्द संस्कृत के भद्र ,भद्रौ आदि से लोकभाषा में उच्चारण में परिवर्तन से बिगड़कर भदरी ,बद्री हो गया।
किसी भी शब्द कोश में ढूँढ लें भद्रा का स्पष्ट अर्थ है कल्याणकारी, हितकारी, सुखकारी।
भद्री का अर्थ है — वेद में भद्र , भद्रा ,भद्रौ आदि शब्द अनेकों बार आये है लेकिन यहाँ प्रमाण के लिए कुछ मन्त्र ही प्रस्तुत कर रहे हैं।
आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो (ऋग्वेद 1ध्89ध्1), (यजुर्वेद 25/14)
दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिरृ॑जूय॒तां (ऋग्वेद 1/89/2),(यजुर्वेद 25/15)
सरूप वृषन्ना गहीमौ भद्रौ धुर्यावभि । ताविमा उप सर्पतः ॥(सामवेद -१६५५)
भद्र की प्राप्ति -ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आसुव।। यजुर्वेद-३०.३ –
भावार्थ -जगदुत्पादकत्व, जगद्धारकत्व, जगत्संहारकत्व, न्यायकारित्व, दयालुत्व, निराकारत्व, अजरत्व, अमरत्व, अभयत्व, पवित्रत्व आदि परमात्मा के अनेक रूप हैं, इसीलिए उसे ‘सरूप’ सम्बोधन किया गया है। स्तोता के आत्मा और मन जब स्वयं परमात्मा को पाने का यत्न करते हैं, तब वहीँ छिपा बैठा वह उनके लिए प्रकट हो जाता है ॥

2 एक प्रमाण –6,000 से अधिक लोगों की मौत के साथ, उत्तराखंड में 2013 की बाढ़, भारत की अब तक की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी। दरअसल, 16 और 17 जून 2013 को भारी बारिश हुई थी।तब अनेको भक्त और पुजारी इस विपदा में मृत्यु को प्राप्त हुए ,तब भगवान् कहा थे ?
3ईश्वर एक ही है और सर्वव्यापी है,उसके सकडो नाम गुणों के आधार पर है.इसलिए भ्रमित ना हों।ईश्वर प्राप्ति के लिए अच्छे कर्म करो और ईश्वर के बताये मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
4.ईश्वर का एक अन्य नाम नाथ भी है और इसलिए आधार पर उसके ये नाम है जैसे कि बद्रीनाथ,केदारनाथ,जगन्नाथ,बाबा विश्वनाथ आदि
नाथ शब्द का पर्यायवाची अर्थ है: प्रभु ,स्वामी ,अधिपति आदि । जो एक ही ईश्वर का प्रतीक है ,नाथ शब्द जोड़कर अलग अलग ईश्वर मान लेना गलत है। वेद में ईश्वर के लिए नाथ शब्द बहुत बार आया है। जैसे की ऋग्वेद में नाथ के 7 संदर्भ मिले है और अथर्ववेद में नाथ के 22 संदर्भ मिलते है।
प्रश्न =क्या भगवान विश्वनाथ,जगन्नाथ,बद्रीनाथ, गणेश,लक्ष्मी , शनि, ब्रहस्पति,शंकर आदि से अलग अलग ईश्वर है?
तो उत्तर है कि बिलकुल नहीं,ये समझ का फर्क है क्योंकि ये सब ईश्वर एक ही है जो सर्वशक्तिशाली है, निराकार, सर्वाधार , सर्वव्यापक है ,परमपिता है .जैसा कि पहले कहा है कि ईश्वर के अनेकों प्रकार के कार्य है जिसके कारण ईश्वर को अलग नाम से पुकारा गया है , और यदि इन कार्यों को समझने के लिए निराकर ईश्वर की चित्रकारी की जाए तो कार्यों के आधार पर एक ही ईश्वर अलग अलग रूपों में नजर आएगा ।
ईश्वर को विश्वनाथ क्यो कहते है?ईश्वर पूरे ब्रह्मांड का रचने वाला है और वही ईश्वर सृष्टि को बनाने ,चलाने और प्रलय करने वाला है इस कारण से ईश्वर का एक नाम विश्वनाथ भी है। जैसा काम वैसा ही नाम। ये सम्पूर्ण दुनिया विश्वनाथ का मंदिर ही है।
शास्त्र क्या कहते है?
हमारे धर्म साहित्य कार्यों के आधार पर ईश्वर को अलग अलग नाम से पुकारा है । एक उदाहरण देखो–
१ (विश प्रवेशने) इस धातु से ‘विश्व’ शब्द सिद्ध होता है।
‘विशन्ति प्रविष्टानि सर्वाण्याकाशादीनि भूतानि यस्मिन् । यो वाऽऽकाशादिषु सर्वेषु भूतेषु प्रविष्टः स विश्व ईश्वरः’ जिस में आकाशादि सब भूत प्रवेश कर रहे हैं अथवा जो इन में व्याप्त होके प्रविष्ट हो रहा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘विश्व’ है, इत्यादि नामों का ग्रहण अकारमात्र से होता है।
2 ‘यो विश्वमीष्टे स विश्वेश्वरः’ जो संसार का अधिष्ठाता है, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘विश्वेश्वर’ है।
प्रश्न बद्रीनाथ का मतलब बताए?
अन्य अर्थो के साथ साथ बद्री का पर्याय प्रभु विष्णु भी है जिसने उज्ज्वल रात बनाई है। जिसका प्रकाश भूमि पर रात्रि को भी उजाला देता है ।
जगन्नाथ का अर्थ है – जगत का अधिपति परमात्मा,जगत का रचियता स्वामी
केदारनाथ का भावार्थ?
केदार का पर्यायवाची भी ईश्वर के गुणों को इंगित करता है। केदार का पर्याय शब्द महेश है। जिसका भावार्थ पहले बता दिया है।
विशेषःउपरोक्त सभी नाम निराकर ईश्वर के है,यदि किसी शरीरधारी ,या मूर्ति,तस्वीर के ये नाम होगे तो वह ईश्वर नही है।
उपरोक्त के आलोक में आपको नाथ शब्द और इसे जुड़े हुए अन्य शब्दों का भावार्थ स्पष्ट हो जायेगा।बाकी आप समझदार है और समझदार को इशारा काफी है।

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