क्या जेल से बाहर आकर फिर जेल जा सकते हैं केजरीवाल ?

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सुभाष चन्द्र
12 जुलाई को जब संजीव खन्ना/दीपांकर दत्ता ने केजरीवाल को जमानत दी थी तो जो शर्ते तब लगाई थी वो आज CBI के केस में भी लगी है। दिल्ली सरकार का काम तब भी ठप था और अब दूसरी जमानत मिलने और जेल से बाहर आने के बाद भी ठप ही रहता। फिर पहली जमानत मिलने पर जेल में रहते हुए Resign क्यों नहीं किया और अब क्यों किया?

लोग इसका उत्तर नहीं ढूढ़ पाए। सत्य यह है कि केजरीवाल के जेल में रहते उसके वकीलों की करोड़ों की फीस के बिल बतौर CM सरकार से अदा होते थे। अगर वह तब resign करता तो वकीलों का भुगतान उसे करना पड़ता लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट में सारे मामले ख़त्म हो चुके है और ट्रायल कोर्ट के बचे हैं। जो भी मोटे मोटे बिल अदा होने थे, वो resign करने से पहले तक के period के अदा हो जाएंगे। इसलिए उसने अब resign किया।

त्याग की मूरत बनना था तो संजीव खन्ना से बेल मिलने पर Resign करता बल्कि जेल जाने से पहले Resign करता।

जेल में रह कर भी मुख्यमंत्री बना रहा, यह राजनीति में बदलाव किया केजरीवाल ने। चोरी के आरोप लगने के बाद भी “ईमानदार” बना रहा, ये बदलाव ही तो है।

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यह दुर्भाग्य है कि केजरीवाल और उसके गिरोह को सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने हर किसी के एक ही मामला उठाया है Bail is rule jail exception hai और मुकदमा चलने में बहुत समय लगेगा। फिर तो सभी ऐसे लोगों को छोड़ देना चाहिए जनके मुकदमों में समय लगेगा वो भी चाहे आतंकी ही क्यों न हों।
मनोनीत CM आतिशी ने कहा है सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार की एजेंसियों के मुंह पर तमाचा मारा है और केजरीवाल की गिरफ़्तारी को गलत बताया है।

ये सीधा contempt of court है लेकिन सत्ता के नशे में चूर केजरीवाल और उसके गिरोह पर मेहरबान सुप्रीम कोर्ट के जज इस बात का संज्ञान नहीं लेंगे जबकि उन्होंने तो गिरफ़्तारी को वैध कहा है और आतिशी कह रही है कोर्ट ने arrest को गलत कहा।

उसने कहा मुख्यमंत्री तो दिल्ली के एक ही हैं और वो ही रहेंगे अरविन्द केजरीवाल, मैं उनके ही मार्गदर्शन में काम करुँगी। यानी मतलब साफ़ है, मुख्यमंत्री आतिशी होगी लेकिन सत्ता की चाबी केजरीवाल के हाथ में होगी और केजरीवाल, सिसोदिया के खिलाफ सबूत फाइलों से साफ़ करती रहेगी। ऐसे ही रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाएगा केजरीवाल क्योंकि दोष उस पर नहीं लगेगा।

यही बात सौरभ भारद्वाज ने कही है। उसने कहा कि “ये बात मायने नहीं रखती की सीएम की कुर्सी पर कौन बैठेगा। कुर्सी तो केजरीवाल की है और आगे भी रहेगी।

सिर्फ चुनाव तक इस कुर्सी पर भरत की तरह राम की खड़ाऊं रखकर एक व्यक्ति बैठेगा”।

मतलब साफ़ है कि केजरीवाल proxy सरकार चलाएगा जैसे सोनिया गांधी ने चलाई थी लेकिन सत्ता का भूखा त्याग और तपस्या की मूर्ति बनने की कोशिस कर रहा है।

राम की खड़ाऊं की बात करना बहुत आसान है लेकिन सौरभ भरद्वाज को नहीं पता कि राम को सत्ता की लालसा कभी नहीं रही, न वनवास जाने से पहले और न वनवास से आने के बाद जबकि तुम्हारा “राम” सत्ता से चिपका रहा और आज भी अपने स्वार्थ के लिए आतिशी को गद्दी सौंप कर घर बैठा है।

तुम्हारा फर्जी राम तो कह रहा है वो जनता से वोट लेकर फिर सत्ता में आएगा। कैसे आएगा, क्या चुनाव जीत कर जमानत की शर्ते ख़त्म हो जाएंगी? ये फर्जी राम अगर सच में त्यागी होता तो जेल जाने से पहले त्यागपत्र दे देता।

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