*अभी तो हमारा पतन शुरू हुआ हैं*

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लेखक आर्य सागर खारी

आज मेरे एक आर्य समाजी मित्र जो पेशे से अधिवक्ता है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट गौतम बुद्ध नगर में प्रैक्टिस करते हैं घर पर आए उनसे काफी विस्तृत वार्तालाप विविध विषय पर हुआ । विषयांतर होते हुए हमारी चर्चा विवाह जो आर्यों या हिन्दूओं का प्रमुख संस्कार है ग्रहस्थ आश्रम का प्रमुख उत्प्रेरक है को लेकर चल गई । अधिवक्ता मित्र ने बताया विवाह जैसी पवित्र संस्था कैसे पतनशील हो रही इस संबंध में विचारणीय प्रसंग उन्होंने बताया। इन दिनों वह एक म्युचुअल डायवोर्स अर्थात पति-पत्नी की आपसी सहमति से होने वाले तलाक में एक पक्ष के अधिवक्ता हैं।। तलाक का कारण केवल इतना है लड़का जो विदेश में मल्टी नेशनल कंपनी में जॉब करता है इन दिनों भारत में ही है और लड़की सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता की बेटी है। दोनों का एक बेटा भी है।

हुआ यह की एक दिन लड़के ने लड़की से अपना कच्छा धोने का अनुरोध कर दिया लड़की ने आवेश में आकर यह कहा मैंने तुम्हारा कच्छा धोने के लिए तुमसे शादी नहीं कि है बस बात यहीं से बिगड़ गई बिगड़ते बिगड़ते फैमिली कोर्ट तक आ पहुंची।

साक्ष्य विधि की भाषा में यदि बात करें तो इस मामले में Fact in issue पत्नी द्वारा अपने पति का कच्छा धोने से इनकार करना है ।

इतनी छोटी सी बात पर ( यह छोटी हमारे लिए है उस दंपति के लिए तो यह बहुत बड़ी समस्या है) मामला तलाक तक जा पहुंचा। ऐसे मामले जब कोर्ट में पहुंचते हैं तो विद्वान न्यायाधीश भी चक्कर खा जाते हैं क्योंकि हिंदू विधि में यह उल्लेख नहीं है की पत्नी को पत्नी का कच्छा धोना चाहिए या नहीं लेकिन धर्म शास्त्रों में बहुत महान व्यापक शिक्षाएं हैं पति-पत्नी के एक दूसरे के प्रति कर्तव्य व्यवहार को लेकर।ऋग्वेद के मंडल दस में विवाह कराने वाला विद्वान वर वधू से कहता है -कि जैसे दो पात्रों का जल मिल जाता है ऐसे ही आज देवों ने तुम दोनों पति-पत्नी के हृदय को मिला दिया है, वृद्धावस्था तक भी तुम्हारा वियोग ना हो।

अथर्ववेद के 14वें कांड में तो यह तक कहा गया है पति-पत्नी को उपदेशित करते हुए जैसे चकवा और चकवी पक्षी पूरा जीवन एक साथ बिताते हैं ऐसे ही तुम भी अपना पूरा जीवन 100 वर्ष तक एक साथ बिताओ मृत्यु का देवता यम भी तुम्हें अकाल ही अलग ना करें।

ऋग्वेद अथर्ववेद यजुर्वेद में विवाह संस्कार ग्रहस्थ आश्रम को लेकर सैकड़ो गहन गंभीर उपदेश महान शिक्षाएं मिलती हैं।

बात मनुस्मृति करें तो वहां यह उल्लेख मिलता है विवाह के पश्चात पत्नी के लिए पति व पति के लिए पत्नी दोनों एक दूजे के लिए पूरी तरह पैर के नाखून से लेकर सिर तक बिक जाते हैं।

समस्या यह आ रही है विवाह के संबंध में जितने भी प्राचीन शास्त्र धर्म ग्रंथ है वह सब अलमारी में धूल फाक रहे हैं। आज डाइवोर्स होने पर पार्टी आयोजित की जाती है डाइवोर्स डे के रूप में। भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है सकारात्मक रूप से या नकारात्मक रूप से यह आप तय करें आप भी समाज का ही एक हिस्सा है। हमारा समाज न तो यह पूरी तरह स्वछंदवादी भोगवादी पश्चिमी समाज में रूपांतरित हो पाया है ना ही पूरी तरह भारतीय रहा है हमारा समाज बीच की स्थिति में है ऐसे में समाज दो वर्गों में बट गया है। बीच की स्थिति हमेशा खतरनाक होती है। इस मामले में एक पक्ष तो यह कहेगा की लड़की ने लड़के का कक्षा धोने से इनकार करके बहुत अच्छा किया है आखिर वह उसकी दासी थोड़ी है फेमिनिस्ट वामपंथी इसी पाले में खड़े आपको दिखाई देंगे। जबकि दूसरे पक्ष की मान्यता यह रहेगी जब पति-पत्नी दो शरीर एक आत्मा है तो ऐसे में पत्नी को पत्नी का कच्छा धोने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए ग्रहस्थ का व्यवहार ऐसे ही चलता है दोनों एक दूसरे की उचित सात्विक आवश्यकताओं की पूर्ति करें।

इस संबंध में आपकी क्या मान्यता है कमेंट बॉक्स में अवश्य सूचित करें। लीगल एथिक्स के कारण मैंने अपने अधिवक्ता मित्र का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

लेखक आर्य सागर खारी

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