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आत्मा की पहचान के लक्षण

प्रश्न — हमने सुना है, आत्मा की पहचान के कुछ लक्षण न्याय दर्शन में बताए हैं। हम जानना चाहते हैं कि, उनमें से कौन से गुण स्वाभाविक हैं, और कौन से नैमित्तिक हैं?

उत्तर — न्याय दर्शन के अध्याय 1,आह्निक 1, सूत्र 10 के अनुसार आत्मा में 6 लक्षण बताए गए हैं । इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख-दुख और ज्ञान । सूत्र है, —- इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुखज्ञानान्यात्मनो लिंगम्।।
लिंगम् का अर्थ है लक्षण। लक्षण का अर्थ होता है, किसी पदार्थ की पहचान के चिह्न। लक्षण का अर्थ स्वाभाविक गुण नहीं होता।
लक्षणों में जो बातें बताई जाती हैं, उनमें से कुछ स्वाभाविक भी हो सकती हैं, जैसे इच्छा, ज्ञान आदि। और कुछ नैमित्तिक भी गुण भी हो सकते हैं, जैसे इच्छा ज्ञान, सुख दुख की अनुभूति करना आदि। तथा गुणों के अतिरिक्त, लक्षणों में कुछ क्रियाएं भी हो सकती हैं। जैसे साँस लेना, अपने जैसी नस्ल की संतान उत्पन्न करना, विचार करना, देखना, सुनना, सत्य बोलना, सेवा करना, चोरी करना, दान देना आदि।
तो स्वाभाविक गुण, नैमित्तिक गुण और कुछ क्रियाएं आदि सब मिलाकर के लक्षण कहलाता है। अर्थात उन लक्षणों से उस वस्तु की पहचान होती है, कि वह वस्तु, उस स्थान पर है अथवा नहीं है?
तो न्यायदर्शन के उक्त सूत्र में, जीवात्मा की पहचान के 6 लक्षण बताए हैं, न कि स्वाभाविक गुण।
सूत्र में शब्द है, आत्मनो लिंगम्.
लिंगम् अर्थात् लक्षण।
अब हम यह विचार करेंगे, कि इन 6 लक्षणों में से कितने गुण स्वाभाविक हैं, और कितने नैमित्तिक!

स्वाभाविक गुण उसे कहते हैं, जो गुण किसी पदार्थ में सदा से हो और सदा रहे. उसको कभी छोड़े नहीं। जैसे गर्मी गुण, अग्नि में स्वाभाविक है।

और जो गुण कभी किसी पदार्थ में आ जाए और कभी उसको छोड़ दे, तो इसका अर्थ है, कि वह बाहर से = अन्य पदार्थ से आया हुआ गुण है, अथवा किसी अन्य पदार्थ के संयोग से उत्पन्न हुआ हुआ गुण है। जैसे गर्मी गुण, पानी में, अग्नि के संयोग से उत्पन्न हो जाता है। उसको नैमित्तिक गुण कहते हैं।

तो आत्मा के बताए गए इन 6 लक्षणों में से 4 गुण दोनों प्रकार के हैं , स्वाभाविक भी और नैमित्तिक भी ।
6 में से, जो 2 गुण हैं, वे केवल नैमित्तिक हैं, जो आते हैं और चले जाते हैं। वे आत्मा में न सदा से हैं, और न सदा रहेंगे।
ये 2 नैमित्तिक गुण हैं, सुख और दुख।
कभी सुख आता है, कभी दुख आता है ।
जब सुख आता है, तो दुख छूट जाता है। जब दुख आता है, तो सुख छूट जाता है। इससे पता चला कि ये दोनों गुण स्वाभाविक नहीं हैं। यदि ये दोनों गुण सुख-दुख, स्वाभाविक होते, तो आत्मा या तो सदा सुखी रहता या सदा दुखी रहता। परंतु ऐसा नहीं है।
न तो आत्मा सदा सुखी रहता है, और न ही सदा दुखी रहता है। इससे सिद्ध हुआ कि ये दोनों गुण नैमित्तिक हैं। छः लक्षणों में से 2 लक्षणों अर्थात् सुख दुख का वर्णन हो गया, कि ये केवल नैमित्तिक हैं, स्वाभाविक नहीं हैं।

बाकी के 4 गुण स्वाभाविक भी हैं, और नैमित्तिक भी ।
ऊपर लिखी स्वाभाविक तथा नैमित्तिक गुणों की परिभाषा को मन में रखकर नीचे के उदाहरण पढ़ते जाइए ।

पहला गुण है इच्छा। कौन सी इच्छा? सुख प्राप्ति की इच्छा, यह आत्मा का स्वाभाविक गुण है। यह आत्मा में सदा से है, और सदा रहेगी ।
परंतु धन सम्मान प्राप्त करने की इच्छा, लड्डू खाने, सोना चांदी प्राप्त करने आदि की इच्छा कभी होती है, कभी नहीं रहती। ऐसी इच्छाएं नैमित्तिक हैं। जब ये नैमित्तिक इच्छाएं हट जाएंगी, तब मोक्ष हो जाएगा। धन सम्मान प्राप्त करने की इच्छा आदि नैमित्तिक इच्छाओं के हटने पर ही मोक्ष होना संभव है, उसके बिना नहीं। क्योंकि ये इच्छाएँ मोक्ष प्राप्त करने में बाधक हैं।
और जो स्वभाविक इच्छा है, “सुख प्राप्ति की इच्छा”. वह तो मोक्ष में भी रहेगी, आज भी है। वह सदा से है, और सदा रहेगी। उसके रहने पर भी, मोक्ष हो जाएगा। वह मोक्ष प्राप्ति में बाधक नहीं है।

दूसरा गुण है द्वेष। यह भी दोनों प्रकार का है। आत्मा को दुख से द्वेष है. यह सदा से है, और आगे भी सदा रहेगा। इसलिए यह आत्मा का स्वाभाविक गुण है । यह मोक्ष में भी रहेगा। यह ऐसा द्वेष है, जो परेशान नहीं करता। इसलिए मोक्ष प्राप्ति में बाधक नहीं है। इसके रहते हुए भी मोक्ष हो जाएगा।
परंतु किसी कुत्ते ने काट खाया, अथवा किसी मनुष्य ने धोखा दिया , तो उससे द्वेष हो गया। यह नैमित्तिक द्वेष है। यह कभी हो जाता है, कभी हट जाता है । जब तक कुत्ते ने नहीं काटा था अथवा किसी मनुष्य ने धोखा नहीं दिया था, तब तक उनसे द्वेष नहीं था। कुत्ते के काटने के बाद और मनुष्य द्वारा धोखा दिया जाने के बाद, उनसे द्वेष उत्पन्न हो गया। इसलिए यह द्वेष नैमित्तिक गुण है। इसके हटने पर ही मोक्ष होगा, क्योंकि यह मोक्ष प्राप्ति में बाधक है।

इसी प्रकार से तीसरा गुण प्रयत्न है. यह
प्रयत्न भी दो प्रकार का है । सुख की प्राप्ति का प्रयत्न, तथा दुख की निवृति का प्रयत्न. ये दोनों प्रकार का प्रयत्न स्वाभाविक है। यह सदा से है, और सदा रहेगा। आप सदा से सुख प्राप्ति का प्रयत्न करते रहे हैं, आज भी करते हैं, तथा भविष्य में भी करते रहेंगे। इसे कभी नहीं छोडेंगे।
इसी तरह से दुख से छूटने का प्रयत्न भी आप सदा से करते रहे हैं, आज भी करते हैं, और भविष्य में भी सदा करेंगे। इस कारण से यह प्रयत्न स्वाभाविक गुण हुआ।
परंतु धन सम्मान आदि की प्राप्ति का जो प्रयत्न है वह नैमित्तिक है। जब धन सम्मान प्राप्ति की इच्छा हट जाएगी, तो उसकी प्राप्ति का प्रयत्न भी हट जाएगा। इसलिये वह नैमित्तिक हैl

और चौथा गुण है ज्ञान। यह भी दोनों प्रकार का है । आत्मा में कुछ ज्ञान स्वाभाविक है, जिसके कारण वह चेतन पदार्थ कहलाता है। आत्मा का स्वाभाविक ज्ञान क्या है? वह सुख को जानता है, दुख को जानता है । उसे सिखाना नहीं पड़ता , कि इस अनुभूति का नाम सुख है , इस अनुभूति का नाम दुख है । वह स्वभाव से ही जानता है कि सुख कैसा होता है । और सुख उसे अच्छा लगता है, यह उसका स्वाभाविक ज्ञान है।
जैसे 20 दिन के छोटे बच्चे के मुंह में थोड़ा सा शहद चटा दें , तो वह खुश हो जाता है। उसे कोई सिखाता नहीं है कि शहद चाटने पर खुशी के लक्षण चेहरे पर प्रकट करना । वह स्वतः ही खुशी के लक्षण प्रकट करता है। इसका अर्थ है वह जानता है कि यह स्वाद मुझे अच्छा लगा , यह सुखदायक लगा।
इसी प्रकार से यदि उसके मुंह में कड़वा करेले का रस टपका दिया जाए , तो वह अजीब सा मुंह बनाता है । इससे पता चलता है कि वह जानता है, यह अनुभव अच्छा नहीं रहा । यह स्वाद पसंद नहीं आया । यह दुखदायक है। तो उस दुख को भी वह स्वभाव से जानता है । यह उसका स्वाभाविक ज्ञान है। और वह यह भी जानता है कि “मैं कुछ हूं।” यह अनुभूति भी उसे है। यह भी उसकी स्वाभाविक अनुभूति अथवा ज्ञान है इत्यादि।
और इसी स्वाभाविक ज्ञान के आधार पर वह माता-पिता गुरुजनों और ऋषियों विद्वानों तथा ईश्वर से नैमित्तिक ज्ञान को धारण कर लेता है।
इस प्रकार से यह पता चलता है कि माता-पिता और गुरुजनों आदि से जो ज्ञान आत्मा प्राप्त करता है, वह नैमित्तिक है। वह ज्ञान उसके पास पहले नहीं था, बाद में प्राप्त हुआ।
यदि स्वाभाविक ज्ञान आत्मा में न होता, तो वह भी प्रकृति के समान जड़ पदार्थ होता। और कुछ भी नया ज्ञान न सीख पाता। जैसे प्रकृति में स्वाभाविक ज्ञान नहीं है, इस कारण से वह नैमित्तिक ज्ञान को भी धारण नहीं कर पाती।
देखिए, कितने आश्चर्य की बात है। कि ईश्वर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान है। और यह प्रकृति अनादि काल से सर्वज्ञ ईश्वर के साथ रहती है। और आज तक उसने ईश्वर से एक अक्षर भी ज्ञान नहीं सीखा। क्यों नहीं सीखा? क्योंकि उसके पास अपना स्वाभाविक ज्ञान नहीं है। जीवात्मा के पास स्वाभाविक ज्ञान है, इसी कारण से वह ईश्वर एवं गुरुजनों आदि से नया-नया ज्ञान सीखता रहता है।

वैशेषिक दर्शन में आत्मा की पहचान के कुछ अन्य लक्षण भी लिखे हैं। जैसे शरीर धारण करना, जीवित रहना, सांस लेना, मन से विचार करना, आंख नाक आदि इंद्रियों का प्रयोग करना इत्यादि। जहां-जहां भी ऐसे लक्षण पाए जाएं, तो समझ लीजिए वहां पर आत्मा है। तो ये आत्मा की पहचान के लक्षण अर्थात चिह्न कहलाते हैं।

आधुनिक भौतिक वैज्ञानिकों तथा समाज के अन्य बुद्धिजीवी महानुभावों से विनम्र निवेदन है, कि आत्मा के लक्षणों पर विचार करें और ईमानदारी से इस आत्मा की सत्ता को स्वीकार करें। आत्मा को न मानते हुए, केवल भौतिक पदार्थों को मानकर, स्वयं भ्रांति में न रहें, और दूसरों में भी भ्रांति न फैलाएं। अन्यथा आप को ईश्वर की न्याय व्यवस्था से बहुत दंड भोगना पड़ेगा। जब तक आप आत्मा और ईश्वर को ठीक प्रकार से नहीं जानेंगे, तब तक संसार की समस्याएँ नहीं सुलझेंगी। आप सबका शुभ चिन्तक.

लेखक – स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।

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