ओ३म् “वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा गुरुकुलीय शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार से ही सम्भव”

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वेद ईश्वरीय ज्ञान होने के साथ धर्म और संस्कृति सहित सभी विद्याओं का आदि स्रोत भी है। वेद धर्म व संस्कृति विषयक पूर्ण ज्ञान प्रस्तुत करता है। वेदों की विद्यमानता में धर्म व संस्कृति के ज्ञान व उसके प्रचार व प्रचलन के लिये किसी अन्य ज्ञान की पुस्तक की आवश्यकता नहीं है। वेद नित्य ज्ञान है। वेदों की भाषा ईश्वरीय भाषा है, इस कारण वेदों के ज्ञान के लिये इनके अनुवाद व भाष्यों की आवश्यकता है। वेदों के सिद्धान्तों व मान्यताओं की व्याख्या के लिये ईश्वर व वेदों के सत्य अर्थों के साक्षात्कर्ता ऋषियों व योगियों की वेद व्याख्याओं वा उनके पूरक व वैदिक मान्यताओं के अनुकूल ग्रन्थों की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति ब्राह्मण, दर्शन व उपनिषद ग्रन्थों सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि एवं आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों से होती है। वेद मन्त्रों की व्याख्या को जानने के लिये हमारे पास ऋषि दयानन्द सहित अनेक आर्य विद्वानों के प्रामाणिक भाष्य हैं। इनकी सहायता से विश्व के सभी मानव लाभ उठाकर अपने जीवन को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होकर जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। गुरुकुल वह शिक्षा प्रणाली व साधन है जिसकी सहायता से हम वेदों की दैवीय भाषा संस्कृत की व्याकरण एवं शब्दार्थ प्रक्रिया को जान व समझ सकते हैं। आर्ष व्याकरण के अध्ययन व ज्ञान से हम वेदों सहित समस्त उपलब्ध संस्कृत साहित्य का अध्ययन व अनुसंधान कर संस्कृत के विपुल साहित्य से संसार के सभी मनुष्यों के जीवन को सुख व शान्ति से युक्त करने सहित उन्हें पारलौकिक वा पुनर्जन्मों में सुख व उन्नति को प्राप्त करा सकते हैं।

सृष्टि के आदि काल से महाभारत काल तक संस्कृत भाषा व विद्या का देश देशान्तर में प्रचार व प्रसार था। इसलिये वैदिक धर्म एवं संस्कृति ही एकमात्र विश्व का धर्म एवं संस्कृति थी। महाभारत युद्ध के परिणामों में एक परिणाम वैदिक धर्म एवं संस्कृति का विलुप्त होना हुआ। इसका कारण यह था कि महाभारत युद्ध के बाद हमारे विद्या के केन्द्र गुरुकुलों में ज्ञान व उसके अनुसंधान के प्रति शिथिलता आ गई थी। गुरुकुलीय व्यवस्था ध्वस्त प्रायः हो गई थी। यदि देश भर में वैदिक, आर्ष विद्या व शिक्षा के केन्द्र गुरुकुल होते तो वैदिक धर्म का पराभव कदापि न हुआ होता। ऋषि दयानन्द का काल आते-आते गुरुकुलीय पद्धति पूर्णतया ध्वस्त व अप्रचलित हो चुकी थी। इस कारण से वेद एवं वैदिक धर्म के आधारभूत ग्रन्थों दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति आदि का पठन पाठन अवरुद्ध हो गया था। महाभारत के बाद देश में कुछ स्वार्थी लोग भी उत्पन्न हुए जिन्हें संस्कृत भाषा का तो ज्ञान था परन्तु वेदों के सत्य आशय समझने व सत्य पर चलने की उनमें दृण इच्छा शक्ति व भावना नहीं थी। उन्होंने वेदों के अर्थों के अयोग्यतापूर्ण लौकिक भाषा के आधार पर मनमाने मिथ्या एवं दूषित अर्थ किये और मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में वेद विरुद्ध प्रक्षेप भी किये। इसके परिणामस्वरूप वेदों के सत्य अर्थों का अनर्थ होने से वेद विरुद्ध मान्यताओं का देश व संसार मे ंप्रचार हुआ। सत्य वैदिक धर्म विलुप्त होता रहा व समाज में अज्ञान व अन्धविश्वासों में वृद्धि होती रही। इस अज्ञान व अन्धविश्वासों का परिणाम ही अनेक मिथ्या परम्पराओं का प्रचलन रहा और सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार व सर्वव्यापक ईश्वर की उपासना के स्थान पर मूर्तिपूजा प्रचलित हो गई। फलित ज्योतिष की मान्यतायें भी वेदविरोधी होने से मनुष्य जाति के पतन का मुख्य कारण सिद्ध हुई हैं। अवतारवाद, मृतक श्राद्ध सहित समाज में गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था के स्थान पर जन्मना जातिवाद की मान्यताओं का प्रचलन भी वेदार्थ से विपरीत अज्ञान व अन्धविश्वासों के कारण ही हुआ। इन कारणों से समाज पतनावस्था को पहुंच कर ईश्वर की सत्योपासना व वैदिक यज्ञ आदि कर्मकाण्ड से दूर होकर अविद्या व अज्ञान के चक्रव्यूह में फंस गया जिससे सामाजिक विषमताओं सहित यवनों व अंग्रेजों की गुलामी आदि की दुःखदायी स्थिति से वैदिक धर्मियों को गुजरना पड़ा। वैदिक धर्मी आर्यों को इस कारण दिन प्रतिदिन अवर्णनीय दुःखों का सामना करना पड़ा और विधर्मियों द्वारा मातृशक्ति के अपमान को भी सहन करना पड़ा। यह विचार कर अत्यन्त पीड़ा होती है। इन संकटों को सहन करते हुए भी वैदिक धर्मियों ने गुलामी और दुःखों के कारण मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष और जन्मना जातिवाद आदि की अवैदिक व असत्य मान्यताओं का त्याग नहीं किया और आज भी यह सभी अवैदिक दोष व बुराईयां समाज में विद्यमान हैं जिनका परिणाम भविष्य में भी हितकर होने वाला नहीं है।

सन् 1825 में ऋषि दयानन्द जी का गुजरात के मोरवी प्रान्त के टंकारा नाम स्थान पर जन्म हुआ। उन्होंने ईश्वर के सत्यस्वरूप को जानने और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये अपनी आयु के 22वें वर्ष में गृहत्याग किया। वह देश के सभी विद्वानों एवं योगियों के सम्पर्क में आये। उन्होंने योग में प्रवीणता और वैदिक ज्ञान में ऋषित्व प्राप्त किया और अपने विद्यागुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की प्रेरणा से देश व संसार से अज्ञान व अविद्या को दूर करने को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया। इस पथ पर चलते हुए उन्होंने वैदिक ज्ञान का प्रचार व प्रसार किया। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं संस्कारविधि आदि अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। सत्यार्थप्रकाश व अपने प्रवचनों में उन्होंने संस्कृत विद्या के प्रचार व प्रसार पर बल दिया और इसके लिये गुरुकुलों व वैदिक पाठशालाओं की स्थापना की रूपरेखा प्रस्तुत की। ऋषि दयानन्द के एक प्रमुख शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1902 में हरिद्वार के कांगड़ी ग्राम में वैदिक गुरुकुल का सूत्रपात किया। इसका अनुकरण कर ऋषि दयानन्द के अनेक शिष्यों ने देश के अनेक भागों में वैदिक आर्ष शिक्षा प्रणाली पर आधारित बालकों तथा बालिकाओं के पृथक-पृथक अनेक गुरुकुलों की स्थापना व उनका संचालन किया। आज भी ऋषि दयानन्द जी के अनेक शिष्य न केवल गुरुकुलों का संचालन कर रहे हैं अपितु समय-समय पर नये गुरुकुलों की स्थापना करते रहते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि हमें गुरुकुलों के माध्यम से वेदों के अनेक विद्वान, आचार्य, प्राचार्य, धर्मोपदेशक व वैदिक साहित्य के भाष्यकार व व्याख्याकार उपलब्ध हुए हैं। ऋषि दयानन्द के भक्त आर्यसमाज के विद्वानों ने वेदभाष्य सहित वेदों पर प्रभूत वैदिक साहित्य का सृजन कर वेदाध्ययन एवं वेदप्रचार के क्षेत्र में प्रशंसनीय योगदान किया है। हम समझते हैं कि वैदिक साहित्य के सृजन के क्षेत्र में गुरुकुलों में शिक्षित विद्वान जितना साहित्य सृजित करते हैं उतना संसार का कोई मत व मतान्तर व उसके अनुयायी नहीं करते। आर्यसमाज में बड़ी संख्या में स्थान-स्थान से पत्र व पत्रिकाओं का प्रकाशन भी नियमित रूप से होता है। देहरादून से ही ‘आर्ष ज्योति’ व ‘पवमान’ आदि मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जाता है। आर्यसमाज की विचारधारा के दैनिक व साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन भी किया जाता है जिससे धर्म पिपासु जनता को वेदों का सन्देश प्राप्त होता रहता है और लाखों आर्यसमाज के अनुयायी वैदिक विचारधारा का अध्ययन करते हुए प्रतिदिन ईश्वरोपासना वा सन्ध्या व दैनिक यज्ञ करते हुए समय-समय पर विशेष यज्ञों के अन्तर्गत वेद परायण यज्ञों का संचालन करते हैं। आर्यसमाजों को शास्त्रीय ज्ञान से सम्पन्न योग्य आर्य पुरोहित प्रदान करने का कार्य भी हमारे गुरुकुल ही करते हैं। आर्यसमाज व इसके गुरुकुलों ने ही देश को पं0 रामनाथ वेदालंकार, पं0 विश्वनाथ वेदोपाध्याय, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, पं. शिवपूजन सिंह कुशवाह, पं0 राजवीर शास्त्री, पं0 हरिशरण सिद्धान्तालंकार, पं0 धर्मदेव विद्यामार्तण्ड आदि अनेकों उच्च कोटि के वैदिक विद्वान व वेदभाष्यकार दिये हैं।

वर्तमान समय में दिल्ली के गुरुकुल गौतमनगर के प्राचार्य एवं विश्व प्रसिद्ध ऋषिभक्त स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने भी अपना समस्त जीवन गुरुकुल आन्दोलन को सफल बनाने में समर्पित किया है। आपके द्वारा देश के विभिन्न भागों में आठ गुरुकुलों की स्थापना कर उनका संचालन किया जा रहा है। स्वामी जी के सभी गुरुकुलों में संस्कृत की आर्ष व्याकरण का अध्ययन कराया जाता है। इन गुरुकुलों के माध्यम से सैकड़ों वैदिक विद्वान आर्यसमाज को मिलते हैं। स्वामी जी ने 24 वर्ष पूर्व देहरादून में भी एक आर्ष गुरुकुल पौंधा की स्थापना की थी। इसके आचार्य यशस्वी डाॅ0 धनंजय आर्य जी हैं। आपने इस गुरुकुल को इस अल्पावधि में अनेक उपलब्धियों से युक्त किया है। देश के विभिन्न भागों के लगभग 125 ब्रह्मचारी यहां वैदिक व्याकरण सहित वैदिक ग्रन्थों वा वैदिक साहित्य का अध्ययन अध्यापन करते हैं। वर्ष में एक बार इस गुरुकुल का वार्षिकोत्सव होता है जिसमें आर्य जगत् के शीर्ष विद्वान डा0 रघुवीर वेदालंकार, डा0 ज्वलन्त कुमार शास्त्री, डा0 सोमदेव शास्त्री, पं0 धर्मपाल शास्त्री सहित अनेक संन्यासी एवं पं0 नरेशदत्त आर्य, पं. दिनेश पथिक, पं0 रुहेल सिंह आदि भजनोपदेशक व गीतकार पधारते हैं। गुरुकुल के विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण एवं वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन के साथ आधुनिक विषयों का अध्ययन भी कराया जाता है। वर्तमान में डाॅ0 यज्ञवीर जी, आचार्य शिवकुमार वेदि, आचार्य श्री शिवदेव आर्य जी आदि गुरुजन यहां ब्रह्मचारियों को अध्ययन कराते व मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। अतीत में डाॅ0 रघुवीर वेदालंकार, पं0 राजवीर शास्त्री आदि अनेक विद्वान यहां अध्ययन कराते रहे हैं। प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डा0 महावीर अग्रवाल जी भी स्वामी प्रणवानन्द जी के मित्र हैं और उन्हें अध्ययन-अध्यापन में सभी प्रकार का सहयोग प्रदान करते हैं। गुरुकुल नित्य प्रति प्रगति के पथ पर अग्रसर है। ऐसे ही आर्यसमाज के शताधिक गुरुकुल वैदिक साहित्य के अध्ययन-अध्यापन एवं प्रचार में देश के विभिन्न भागों में संलग्न हैं और वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार वैदिक धर्म की रक्षा में सहयोगी बन रहे हैं।

हम समझते हैं कि जब तक देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या में गुरुकुल विद्यमान हैं व रहेंगे, वैदिक धर्म एवं संस्कृति जीवित एवं सुरक्षित रहेगी। गुरुकुलों के माध्यम से वैदिक धर्म और संस्कृति का देश-देशान्तर में प्रचार हो रहा है। हमें वैदिक धर्म के अनुयायियों की घटती जनसंख्या पर भी विचार करना चाहिये और देश की आबादी में वैदिक सनातन धर्मियों के अनुपात में हो रही कमी को दूर करने के सभी उपाय करने के साथ आवश्यक होने के लिये इसके लिये आन्दोलन भी करने चाहिये। वैदिक धर्म की रक्षा व संवर्धन के लिये यह कार्य आवश्यक है। हम आशा करते हैं कि आर्यसमाज के अनुयायी आर्ष शिक्षा पर आधारित गुरुकुलों के संचालन में इनके संचालकों एवं आचार्यों को अपना सभी प्रकार का पूर्ण सहयोग एवं समर्थन प्रदान करेंगे। हम आशा करते हैं कि सभी गुरुकुल व इसके व्यवस्थापक भी मिशनरी भाव से गुरुकुलों को नयी ऊंचाइयां प्रदान करेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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