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स्वर्णिम इतिहास

_कोटि-कोटि नमन 27 अगस्त/जन्म-तिथि, लोकदेवता गौरक्षक वीर गोगा जी महाराज_*

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इतिहास को छिन्न भिन्न करने का इतिहास में नाम मुगलों और और उनके समर्थकों का रहा है
क्षत्रिय योद्धाओं के इतिहास को मिटाने में जन्हा एक तरफ मुगलों का योगदान रहा है वन्ही इसी क्रम में लोकतांत्रिक सरकारों का भी बराबर उतना ही योगदान रहा हैं
और अब तो इन्होंने इतिहास को बांटना शुरु किया हुआ है जो कि गलत है और क्षत्रिय समाज इन गलत हरकतों का डटकर विरोध करता आया है और करता रहेगा।।
कुछ इतिहासकार जनहा इनको मुस्लिम घोषित करने पर तुले हुए हैं वहीं कुछ इतिहासकारों ने इनको मुस्लिमो का काल घोषित किया है और यही सच्चाई है। सर्व प्रथम गजनवी को अगर किसी ने ललकारा था तो वो थे जाहर वीर गोगा जी चौहान।। जो कि चौहान वंश में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद ख्याति प्राप्त राजा थे। आइए जानते हैं इनके बारे में-:

जब गोगाजी ने छुड़ाए थे गजनवी के छक्के

गोगाजी और महमूद गजनवी के बीच 1024 ईसवी में युद्ध हुआ। उस समय गजनवी सोमनाथ पर आखिरी आक्रमण के लिए जा रहा था।

हनुमानगढ़. लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित ददरेवा के चौहानवंशी शासक गोगाजी प्रजा वत्सल, गोरक्षक और सांपों के देवता के रूप में तो प्रतिष्ठित एवं पूजित हैं ही। इसके अलावा शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ की रक्षा के लिए उनका महमूद गजनवी जैसे क्रूर और दुर्दांत आक्रांता की विशाल सेना से मुट्ठीभर परिजनों और सैनिकों के साथ लोहा लेकर वीर गति पाना इतिहास की ऐसी घटना है, जिस पर भविष्य में भी गर्व होगा।
गुरु गोरखनाथ की कृपा से उत्पन्न गोगाजी के इष्ट देव सोमनाथ ही थे। गोगा बाबा ने सोमनाथ से शिव लिंग लाकर गोगा गढ़ में उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाई थी। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर सत्रह बार आक्रमण किया और वहां से अकूत धन संपदा लूटकर गजनी ले गया।
गोगाजी और महमूद गजनवी के बीच 1024 ईसवी में युद्ध हुआ। उस समय गजनवी सोमनाथ पर आखिरी आक्रमण के लिए जा रहा था। पूर्व में मरुस्थली के मस्तक पर उसका रास्ता गोगाजी ने ही रोका। उस समय गोगाजी ददरेवा के शासक थे। उम्र थी 78 साल। सोमनाथ पर गजनवी के आखिरी आक्रमण के बारे में जिन इतिहासकारों ने लिखा है, उन्होंने गोगाजी और गजनवी के बीच हुए युद्ध का उल्लेख जरूर किया है। गोगाजी और उनकी सेना के लिए यह युद्ध आत्महत्या करने जैसा था। एक तरफ गजनवी की विशाल सेना तो दूसरी तरफ मु_ी भर सैनिक। लेकिन सवाल गोगा बाबा के इष्ट देव के मंदिर को लूटने जा रहे लुटेरे को रोकने का था सो संख्या बल गौण हो गया। वर्तमान में जहां गोगामेड़ी है, वहीं पर भीषण युद्ध हुआ। इसमें गोगा बाबा सहित उनके 82 पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और दौहित्र तथा ग्यारह सौ सैनिक वीर गति को प्राप्त हुए।

जौहर की ज्वाला

गोगाजी के वीर गति पाने के बाद उनके गढ़ की स्थिति का वर्णन भी इतिहासकारों ने किया है। गढ़ का नाम गोगा गढ़ और घोघा गढ़ बताया गया है। गोगा बाबा के परिवार सहित वीर गति पाने का समाचार गढ़ में पहुंचते ही वहां मौजूद स्त्रियां, युवतियां और किशोरियां जौहर की ज्वाला में समा जाती है। इसी दौरान गजनी की सेना लूटमार के लिए गढ़ में प्रवेश करती है। जौहर की ज्वाला में जीवित मूर्तियों को जलते देख गजनी की सेना भयभीत होकर गढ़ से बाहर भाग जाती है।

बाबा को विदाई

गजनी के साथ युद्ध में गोगा बाबा वीर गति को प्राप्त होते हैं। गजनी की सेना सोमनाथ पर आक्रमण के लिए मरुस्थली में आगे बढ़ जाती है। गोगा गढ़ में जीवित बचे कुलगुरु ब्राह्मण नंदिदत रणभूमि में आते हैं। चारों तरफ शवों के ढेर पड़े हैं। गिद्ध और गीदड़ शवों को नोच रहे होते हैं। शवों के ढेर में से नंदिदत अपने प्रिय गोगा राणा का शव ढूंढ़ निकालते हैं। उसे पीठ पर लादकर शुद्ध स्थान पर ले जाते हैं और वहीं अंतिम संस्कार कर देते हैं। शेष शवों का अंतिम संस्कार मरुस्थली की रेत डाल कर किया जाता है। कई इतिहासकार गोगाजी का अंतिम संस्कार उनके परिजनों की ओर से किए जाने का उल्लेख करते हैं।

मरुस्थली के वीर ने लिया गजनी के लुटेरे से लोहा

ददरेवा से आए परिजनों ने गोगाजी का अंतिम संस्कार गोगामेड़ी में उसी जगह किया जहां समाधि बनी हुई है। इस जगह पर मंदिर निर्माण की सही तिथि तो ज्ञात नहीं। लोक मान्यता है कि भादरा के पास थेहड़ों से ईंटें लाकर गोगा मेड़ी में मंदिर निर्माण किया गया था। विक्रम संवत् 1911 में बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तथा सभी जातियों के जल कुण्डों को निर्माण करवाने के लिए भूमि आवंटित की।

🚩लोकदेवता श्री गोगा जी महाराज के जन्मोत्सव गोगा नवमी पर आप सबको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं🚩🙏

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