हमारे पूर्वज पिताओं अर्थात् पितरों ने दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त किया?

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हमारे पूर्वज पिताओं अर्थात् पितरों ने दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त किया?
हमें परमात्मा की पूजा अर्थात् ईश्वर भक्ति के मार्ग का अनुसरण क्यों करना चाहिए?अपने जीवन को पूर्ण और संरक्षित कैसे करें?

प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यं शवसानाय साम।
येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चन्तो अङ्गिरसो गा अविन्दन् ।। ऋग्वेद मन्त्र 1.62.2 (कुल मन्त्र 712)

(प्र – भरध्वम् से पूर्व लगाकर) (वः) आप सब (महे) उस महान् (परमात्मा) के लिए (महि) अत्यन्त (नमः) नमन (भरध्वम् – प्र भरध्वम) पूरी तरह से धारण करता है और पालन करता है (आङ्गूष्यम्) स्तुति के योग्य (शवसानाय) ज्ञान की शक्ति के बल पर सभी कार्य करने वाला (साम) पूजा के गीत (येन) जिसके द्वारा (नः) हमारे (पूर्वे) प्राचीन, पूर्ण करने वाले (पितरः) पूर्वज पिता, संरक्षण करने वाले (पदज्ञाः) पथ को जानने वाला (अर्चन्तः) पूजा करते हुए (अङ्गिरसः) हमारे शरीर और समूची सृष्टि के प्रत्येक भाग में शक्ति और आनन्द के रूप में विद्यमान (गाः) वाणियाँ (ज्ञान की) (अविन्दन्) प्राप्त करने वाला।

व्याख्या:-
हमारे पूर्वज पिताओं अर्थात् पितरों ने दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त किया?

आप उस महान् परमात्मा के लिए अत्यन्त नमन को पूरी तरह से धारण करते हो और बनाये रखते हो जो अपने ज्ञान की शक्ति के बल पर सभी कार्य करता है और पूजा के गान के साथ स्तुति के योग्य है।
इन स्तुति गीतों के साथ हमारे प्राचीन पूर्वज पिता अर्थात् पितर जीवन के मार्ग को जानते हुए उस सर्वविद्यमान परमात्मा की पूजा करते थे जो हमारे शरीर के प्रत्येक भाग और समूची सृष्टि के प्रत्येक भाग में शक्ति और आनन्द की तरह विद्यमान है, इस प्रकार वे प्रकाश और ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त करते थे। इस प्रकाश के साथ ही हम भी अपने जीवन को पूर्ण और सुरक्षित कर सकते हैं।

जीवन में सार्थकता: –
हमें परमात्मा की पूजा अर्थात् ईश्वर भक्ति के मार्ग का अनुसरण क्यों करना चाहिए?
अपने जीवन को पूर्ण और संरक्षित कैसे करें?

यह मन्त्र परमात्मा की पूजा अर्थात् ईश्वर भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने की विशिष्ट प्रेरणा देता है कि हमें उस महान् सर्वोच्च शक्ति की पूजा और स्तुति का गान करना चाहिए। सर्वोच्च दिव्य ज्ञान तथा आनन्द के साथ-साथ उस सर्वविद्यमान शक्ति की अनुभूति प्राप्त करने का यही एक मार्ग है। इसी मार्ग पर हमारा जीवन पूर्ण और संरक्षित हो सकता है, अन्यथा यह अपूर्ण और असंरक्षित तथा दुर्गुणों और कठिनाईयों का मिश्रण बना रहेगा। हमारे पूर्वज पिताओं, प्राचीन ऋषियों और सन्तों ने इसी मार्ग का अनुसरण किया था।


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