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राजनीति

21 अगस्त का ‘भारत बंद’ राजनीति से प्रेरित!!

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
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इतिहास साक्षी है कि आर्थिक एवं सामाजिक विकास -उन्नति- प्रगति का विश्व भर में यह दुर्भाग्य रहा है कि जब भी ‘ये’ आगे बढ़ते हैं , ‘इन्हें’ प्रजातंत्र,स्वतंत्रता,
सामाजिक न्याय, शैक्षिक – रोजगार के अवसर, राजनीति में प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक एकता की दुहाई के नाम पर रोकने का भरपूर प्रयास किया जाता रहा है। इतिहास इस बात का भी गवाह रहा है कि :’क्षणिक लाभ अथवा बहकावे अथवा दूरदृष्टी न होने अथवा
पदलोलुपता के लिए टांग अडा़ई जाती रही है !!
कमोबेश ! आजादी के बाद भारतवर्ष का भी यही दुर्भाग्य रहा है । जब जब किसी राजनीतिक दल ने सत्ता के माध्यम से देश और समाज को विकास, उन्नति और साधन संपन्न बनाने का प्रयास किया है तो उसे विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल छत्तीस का आंकड़ा होने पर भी इकट्ठे होकर टांग खींचने लग जाते हैं।
21 अगस्त को अनुसूचित जाति- जनजाति आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति (जिसका मुखिया अभी तक सामने नहीं आया है) का भारत बंद एलान पूर्णतः राजनीति से प्रेरित- पोषित – प्रायोजित माना जाना चाहिए। क्योंकि इस आंदोलन को बहुजन समाज पार्टी , भीम आर्मी, भारत आदिवासी पार्टी, कांग्रेस, आरजेडी, वामपंथी दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, डीएमके, एआईडीएमके, बीजू जनता दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस, हरियाणा विकास पार्टी जैसे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दल जो वर्षों से सत्ता के सिंहासन पर बैठने का सपना देख रहे हैं, आन्दोलन को समर्थन प्राप्त है।
प्रश्न खड़ा होता है कि इस भारत बंद आंदोलन के पीछे की कहानी अधिकांश अनुसूचित जाति -जनजाति के युवा वर्ग समझ ही नहीं पा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय यह ऑब्जरवेशन है, जिसको आदेश के रूप में पारित नहीं किया है। फिर भी केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि वह इसे वापस नहीं ले रही है ?
मेरे अनुसूचित जाति-जनजाति के भाइयों बहनों एसा कुछ नहीं है जो मीडिया में आरक्षण समाप्ति को लेकर जो भ्रम फैलाया और प्रोपोगंडा किया जा रहा है। वह असत्य है! भ्रमित करने वाला है !! आरक्षण 5G व्यवस्था ख़तरे में है , जैसे नारे के माध्यम से समाज में फिर से अव्यवस्था , कटुता फैलाने की साजिश है !!!
सत्य यह है कि
👉सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिलेयर लागू करने का नहीं फैसला दिया हैं?
क्रिमिलेयर पर चीफ जस्टिस चन्द्रचुड की 7 सदस्यीय बैंच के कुछ सदस्यों ने ओपिनियन दी है। यह ओपिनियन फैसले में शामिल नहीं है।
26 विपक्षी दल लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार चुके हैं, उनके बदले की भावना की चिंगारी है। हार का बदला सरकार से नहीं ले सकते इसलिए उन्होंने अनुसूचित जाति- जनजाति के लोगों को सरकार के विरुद्ध आपको हथियार बनाया है। सर्वाधिक है कि मोदी सरकार क्रिमिलेयर लागू नहीं कर रही है । मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के बाद कैबिनेट मंत्रियों की बैठक कर क्रिमिलेयर को लागू नहीं करने का निर्णय लिया हैं। जब मोदी सरकार ने इसे लागू नहीं करने का निर्णय ले लिया है तो फिर राष्ट्रव्यापी विरोध क्यों ? किसलिए ?? केवल और केवल कांग्रेस तथा अन्य पार्टियां अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और स्मिता बचाना चाहती है,राजनीति चमकाना चाहती है और जो ”वोट बैंक” पहले इन पार्टियों का बंधुआ मजदूर था , उन्हें फिर से बंधक बनाने का प्रयास कर रहे हैं !!
अनुसूचित जाति- जनजाति की युवा शक्ति और मातृशक्ति के संज्ञान में लाया जाता है कि बामसेफ : अनुसूचित जाति-जनजाति , पिछड़ा वर्ग एवं इन समुदाय के धर्मांतरित अल्पसंख्यकों के सरकारी कर्मचारियों का अखिल भारतीय संगठन है ,जिसका मुखिया वामन मेश्राम गैर सरकारी कर्मचारी अध्यक्ष है ) का प्रमुख उद्देश्य जिन राज्यों में जातिवाद का प्रभाव अधिक है,जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र के लोगों को इकट्ठा कर उन्हें भड़कना रहा है। अकथित विशेष सोची समझी रणनीति के तहत वर्तमान एनडीए नीति पर काम करने वाली सरकार के विकास कार्यों में बाधा डालना, आरक्षण नीति पर आम जनता को भ्रमित करना तथा आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे पर असर डालने के उद्देश्य से कर्मचारियों और संसाधनों की मदद से यह आंदोलन खड़ा किया गया है। जबकि वास्तव में देखा जाए तो हम अनुसूचित जाति जनजातियों में कुछ जाती है ऐसी है जो पिछले 75 साल से आरक्षण का लाभ लेकर आगे बढ़ गई है
। जबकि कुछ जातियां ऐसी है जिनको आरक्षण का लाभ नहीं मिला है। आखिर वह भी तो संवैधानिक रूप से हमारे भाई -बहन ही हैं। उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इसके तहत एक कैटेगरी में कम प्रतिनिधित्व वाली जातियों को कोटा तय किया जाता है। मान लिजिए एससी के 16 प्रतिशत आरक्षण में 4 प्रतिशत पिछड़ी एससी जातियों नायक, मोची, वाल्मिकि, धोबी, बलाई, चाण्डाल, नट आदि के लिए कर दिया जाये तो कोई हर्ज नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार जातियों के प्रतिनिधित्व एवं स्थिति का सर्वेक्षण किया जाता है। सटीक आंकड़े होने पर ही उन जातियों को सबकोटा में लाभ दिये जाने का प्रावधान है। क्रिमिलेयर उन परिवारों को माना जाता है, जिनकी हर साल की आय 8 लाख हो और यह 3 साल तक लगातार हो। ऐसे को क्रिमिलेयर मानकर आरक्षण से अलग कर देते है। यह ओबीसी में लागू हैं। इससे IAS-RAS स्तर के अफसरों के बच्चों को आरक्षण मिलने के रास्ते बन्द हो जाते है। मुझे लगता है यह बिल्कुल गलत नहीं है। अब एक परिवार से तीन बार लोग सांसद बन गए हैं। विधायक बन गए हैं। आई ए एस,आई पी एस अफसर बन गए हैं।
जिनके पास करोड़ों की संपत्ति है। उदाहरण के लिए बाबू जगजीवन राम रामविलास पासवान, वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे जी का परिवार।
वही वही परिवार इसका लाभ बार बार उठा रहे हैं। उनके स्थान पर अनुसूचित जाति जनजाति के वह परिवार जिन्हें अभी तक किसी भी तरह का लाभ नहीं मिला उन्हें लाभ देने का प्रयास किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कैटेगरी में कोटा बनाने का फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को अधिकार दिया है कि वे चाहे तो कैटेगरी में कोटा कर सकती है। यह राज्यों के लिए स्वैच्छिक
हैं।
जिस मोदी सरकार के विरोध में राष्ट्र बंद का आव्हान किया गया है।
उस मोदी सरकार ने तो भारत के संपूर्ण अनुसूचित जाति- जनजाति के लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिलेयर के सुझाव को रद्द कर दिया है!! फिर आंदोलन किसके विरोध में ?
आंदोलन तो कांग्रेस और राहुल गांधी के विरोध में होना चाहिए, क्योंकि
1975 में पंजाब की कांग्रेस की ज्ञानी जेल सिंह सरकार* ने SC कैटेगरी में आधा सीटों का कोटा (First preference) मजहबी सिख व वाल्मिकि जातियो को देने का फैसला किया था, यह 2006 तक चला। जब पंजाब एवं हरियाणा कोर्ट ने रोक लगा दी। इसके विरोध में पंजाब में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ। वाल्मीकि एवं मजहबी सिख को कोटा रखने के लिए कांग्रेस की अमरिंदर सिंह सरकार The Punjab Scheduled Castes and Backward Classes (Reservation in Services) Act, 2006 कानून लेकर आई। 2010 में चमार महासभा के देविन्दर सिंह के चुनौति देने पर हाइकोर्ट ने 50% कोटा देने की धारा 4(5) पर रोक लगा दी। 2010 में पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। फिर यह केस 5 जजो की बैंच से होता हुआ 7 जजो की बैंच में गया और फरवरी 2024 से इस देविन्दर सिंह बनाम पंजाब सरकार केस की सुनवाई शुरू हुई। इस तरह इस केस में 1 अगस्त को राज्य को वर्गीकरण की स्वतंत्रता देने का निर्णय आया। राज्य द्वारा कोटा दी जाने वाली जातियो की स्थिति की जांच कोर्ट भी कर सकती है। मोदी सरकार ने तो न्यायालय के निर्णय को न्याय संगत बनाने तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के हित में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कैटेगरी के वर्गीकरण के राज्यों को दिये अधिकार के फैसले पर स्टडी करवाने के लिए विशेषज्ञों सौंप दिया हैं।
जैसा कि आलेख में पहले कहा जा चुका है कि बहुजन समाज पार्टी, भीम आर्मी, बामसेफ, हरियाणा विकास पार्टी और कांग्रेस हरियाणा में बीजेपी को येन-केन रोकना चाहती है!! इस घिनौनी हरकत को सोचने , समझने और परखने की जरूरत है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हरियाणा की बीजेपी सरकार ने राज्य के अनुसूचित जाति आयोग के वर्गीकरण पर सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर एससी के 20% आरक्षण में 16% वंचित जातियों को आधा कोटा (first preference) देने का प्रस्ताव रखा हैं। ज्ञातव्य है कि हरियाणा में अभी आचार संहिता लागू हैं। अध्यादेश जारी करने के लिए हरियाणा राज्य सरकार ने चुनाव आयोग से अनुमति मांगी है। चुनाव आयोग के सामने कई कानूनी रोड़े हैं !!
अनुसूचित जाति जनजाति के भैया बहनों के मन में यह भी प्रश्न उठना होगा कि सबकोटा की सीट नहीं भरी गई , तो क्या वो सीट जनरल हो जायेगी?
उत्तर है नहीं, उसे एससी में कंवर्ट करके शेष एससी जातियों से भरी जायेगी। कोटा एक तरह से कुछ सीटों पर वंचित जातियों को first preference की तरह होता हैं। उनसे पद ना भरे जाने पर शेष एससी जातियों से भरे जाते हैं।
राजस्थान में एससी-एसटी की जातियों का अलग-अलग मत हैं। राजसमंद-चित्तौड़गढ के भील समाज लंबे समय से एसटी में कोटे की मांग कर रहा था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का स्वागत किया हैं। वहीं वाल्मीकि समाज की भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया रही हैं।
एससी-एसटी की वंचित जातियों जातियों का कहना है कि वे लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। उन्होने कानूनी लडाइयां लड़ी हैं। जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व उनका हक हैं। उनका कहना है कि विरोध स्वरूप भारत बन्द का आह्वान करने से पहले उनसे सलाह-मशविरा भी नहीं किया।
उपरोक्त कथ्य एवं तथ्य तो यही उजागर करते हैं कि 21 अगस्त को भारत बंद का आवाहन पूर्णतः राजनीति से प्रेरित है।
अनुसूचित जाति-जनजाति के बुद्धिजीवी लोगों को इससे दूर रहना चाहिए।

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