सत्यवान सावित्री की कथा गायत्री की कथा है : स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज

ग्रेटर नोएडा । ( अजय आर्य ) यहां पर चल रहे चतुर्वेद पंचम पारायणयज्ञ के 25 वें दिन बोलते हुए आर्य जगत के मूर्धन्य विद्वान और सुप्रसिद्ध सन्यासी स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने कहा कि आज भी लोग पाखंड और अज्ञान के अंधकार में भटक रहे हैं । उन्होंने कहा कि सत्यवान और सावित्री की कथा हमारे समाज में बहुत अधिक प्रचलित है , लेकिन इसके अर्थ व संदर्भ पर कोई विचार नहीं करता और काल्पनिक अज्ञानता भरी कथाओं में अपना समय और ऊर्जा नष्ट करते रहते हैं । स्वामी जी महाराज ने अपने विद्वत्तापूर्ण उपदेशन् के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि गायत्री मंत्र को ही सावित्री मंत्र कहा गया है।

उन्होंने कहा कि सत्यवान वह है जो सत्य वाला हो और यह हमारा आत्मा ही है जो सत्य का स्वामी है । स्वामी जी महाराज ने सत्यवान और सावित्री दोनों के अर्थों को स्पष्ट करते हुए कहा कि सावित्री मंत्र के जप से हमारे भीतर छाए हुए काम , क्रोध , मद , लोभ , आदि विकारों का सर्वनाश होता है । जिससे आत्मा का परिष्कार और उत्थान होता है । फलस्वरूप यह जीव आत्मा मुक्ति को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सावित्री के संकल्प से उसके पति अर्थात आत्मा का कल्याण होता है । इसी कथा को लोग बिगाड़ कर किन्हीं कथित काल्पनिक सत्यवान व सावित्री की कथा व किस्से से जोड़ने का अज्ञानता पूर्ण कार्य करते हैं , जिससे समाज के लोगों में अज्ञानता उत्पन्न होती हैं।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि देश में वैदिक शिक्षा पद्धति के माध्यम से गुरुकुलीय संस्कारों को बच्चों के भीतर डालने की आवश्यकता है , जिससे उनका नैतिक ,आत्मिक और चारित्रिक उत्थान हो ।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि शांति की चाह संसार के प्रत्येक प्राणी को है । हमारे वैदिक संस्कारों में यज्ञोपरान्त हम सभी शांति पाठ करते हैं । जिसमें हम तीन बार शांति: शांति: शांति: बोलते हैं ।इसका अभिप्राय है कि हम दैहिक , दैविक और भौतिक तीनों प्रकार के ताप अर्थात दुखों से मुक्ति चाहते हैं । शांति तभी प्राप्त होगी जब दुखों से छुटकारा मिल जाएगा , और दुखों से छुटकारे का अभिप्राय है मुक्ति की प्राप्ति हो जाना । इस प्रकार शांति: शांति: शांति: का सीधा सा संक्षिप्त सा अर्थ है कि हम मोक्ष की प्रार्थना करते हैं।

इस अवसर पर वैदिक पंचांग के निर्माता दार्शनेय आचार्य ने भी अपना विद्वतापूर्ण वक्तव्य रखा और लोगों को सुख-शांति की प्राप्ति के लिए यज्ञ से जुड़ने की प्रेरणा दी । यज्ञ के संयोजक के रूप में देव मुनि जी महाराज ने भी अपना वक्तव्य रखा और पांचों महायज्ञों की महिमा का बखान करते हुए सभी उपस्थित जनों को यज्ञ से जुड़कर जीवन में आनंद की प्राप्ति करने की प्रेरणा दी।

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