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डॉ डी के गर्ग

इस लेख के ४ भाग है

आजकल गुरु बनाने की परम्परा चल पड़ी है कि गुरु बिन मोक्ष नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं, गुरु ईश्वर से बढ़कर है। गुरु भभूत निकालते है ,चमत्कार करते है।एक-एक गुरु ने लाखों की संख्या में चेले पाल रखे हैं। ये एक अजीब परम्परा शुरू हुई है। बाबाओं द्वारा अपनी स्तुति करवाने के लिए अलग -अलग ढ़ंग से प्रयोग किये गए है। कोई अपने को महागुरु लिखता है तो किसी के चेले उसको सद्गुरु , जगत गुरु कहते है। इनमें बड़ा कौन किसके चेले ज्यादा हैं ये बहस चलती रहती है।
गुरु पूर्णिमा पर्व पूरे भारत वर्ष में अत्यधिक जोश और आध्यात्मिक भावना के साथ मनाये जाने वाला पर्व है। इसके अतिरिक्त हमारे देश में शिक्षक दिवस भी मानाया जाता है जो पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णनन के सम्मान में मनाते है।
इस पर्व पर गुरु दक्षिणा ,गुरु पूजा और गुरु सम्मान का आयोजन होता है। और बहुत से गुरुओ की तो जैसे लाटरी निकल पड़ती है उनके महलनुमा आश्रम में चमचमाती गाड़िया ,और गरीब ,मध्यमवर्गीय शिष्य गुरु की एक झलक के लिए सैलाब की तरह उमड़ पड़ते है। और गुरु के दर्शन से धन्य होकर खूब चढ़ावा देते है। कार सेवा के नाम पर वह झाड़ू लगाने से लेकर जो भी काम मिल जाये वही करते है।
गुरुडम प्रथा का इतिहास: सामान्यतः शिक्षक को गुरु की संज्ञा दी जाती है। गुरु शब्द वेद से लिया गया है। प्राचीन काल में गुरु शिष्य की परम्परा का रामायण ,महाभारत में उल्लेख मिलता है लेकिन ये केवल शिक्षक द्वारा शिष्य को ज्ञान और प्राक्षिण देने तक ही सीमित है ,ना की शिष्य राम ,कृष्ण आदि के द्वारा इन शरीरधारी गुरुओ को ईश्वर मानकर उनको पूजना , जैसा की आज हो रहा है ।
सिख पंथ की शुरुआत लगभग ४०० वर्ष पहले से पहले गुरुनानक देव जी द्वारा दक्षिण एशिया के पंजाब में हुई थी ,जो पहले गुरु थे ,इसके बाद सिख पंथ में अन्य गुरु जुड़ते गए और अंत तक सिख पंथ में १० गुरु हुए ।
इसके अच्छे और बुरे दोनों परिणाम हुए।अच्छा परिणाम ये हुआ की गुरु ने शिष्यों की अच्छी की बाते सिखाई , अच्छा ग्रन्थ दिया ताकि इसको समझकर अच्छे रस्ते पर लाया जा सके।बुरा परिणाम ये हुआ की गुरु के रास्ते पर चलने और ग्रंथ के अनुसार चलने के बजाय ग्रन्थ की पूजा और गुरु की तस्वीर की पूजा सुरु कर दी ,अलग से गुरु के नाम से पंथ खड़ा कर दिया। गुरु का उद्देश्य इसी बीच गायब हो गया। गुरु के शिष्य सदाचरण से दूर हो गए और गुरु के नाम का ढोल पीटना सुरु करके अलग से समाज खड़ा कर दिया।
आज पंजाब और हरियाणा में लगभग एक हजार से ज्यादा गुरु है और सभी अपने अपने विस्तार में लगे हुए है। कुछ गुरु अन्तर्रष्ट्रीय स्टार भी बन गए है जिनमे प्रमुख है -रामपाल, आशाराम बापू, डेरा सच्चा सौदा, साईं बाबा, निरंकारी बाबा ,हंसा पंथ, राधा स्वामी, श्रीराम शर्मा (गायत्री परिवार) आशुतोष महाराज ,जय गुरु देव, करोली बाबा ,नीम करोली बाबा ,आनंद मार्गी, ब्रह्म कुमारी , इस्कॉन वाले प्रभु पाद, श्री श्री रविशंकर ,सत्य साई बाबा ,जय गुरु जी ,अक्षरधाम पंथ ,वगैरह वगैरह इस प्रकार से कभी न ख़त्म होने वाली इस सूची में अनेक बाबा, अनेक स्वघोषित भगवान, अनेक कल्कि अवतार इस समय भारत देश में घूम रहे हैं। इनकी मृत्यु के बाद इनका परिवार ,रिश्तेदार वारिस बनकर गुरु प्रसाद देते है, इस तरह दूकान चलती रहती है। और इनके शिष्य अभिवड़ां भी इस [रकार से रखते है की गुरु की जय जैकार होती रहे जैसे – जय गुरु देव , जय गुरु जी , धन धन संतो , जय गुरु तेरा आसरा ,जय राधा स्वामी आदि।
गुरुडम और अन्धविश्वास
बहुत लोग यह सोचते हैं की इन गुरुओं ने इतने व्यापक स्तर पर पाखंड को फैला रखा हैं फिर भी लोग सब कुछ जानते हुए भी इन गुरुओं के चक्कर में क्यों फँस रहे हैं। हम रामपाल के उदहारण से यह समझने का प्रयास करेंगे कि कोई भी स्वघोषित गुरु कैसे अपनी दुकानदारी चलाता हैं।
1. रामपाल हर सत्संग में प्रसाद में खीर खिलाता था :रामपाल की खीर को लेकर कई कहावतें प्रचलित थी। सतलोक आश्रम में हर महीने की अमावस्या पर तीन दिन तक सत्संग होता था। तीनों दिन साधकों को खीर जरूर मिलती थी। दूसरे व्यंजन भी परोसे जाते थे। साधकों का मानना था कि बाबा की खीर की मिठास से जीवन में भी मिठास आती थी। गौरतलब यह हैं की यह खीर उस दूध से बनती थी जिस दूध से रामपाल को नहलाया जाता था। पाठक स्वयं सोच सकते हैं की उस दूध में पसीना एवं शरीर से निकलने वाले अन्य मल भी होते थे।
2. रामपाल 10 हजार में आशीर्वाद से कई लाइलाज बीमारियों का निदान का दावा करता था। इसके लिए साधक को स्पेशल पाठ कराना पड़ता था ।करोली बाबा मोती रकम लेकर कैंसर से मुक्ति का दवा करता है ।
3.पाप कर्म से मुक्ति : राधा स्वामी , अक्षरधाम वाले घनश्याम पांडेय ,रामपाल, निरंकारी , ब्रहकुमारी जैसे सेकड़ो गुरु पाप कर्म को माफ़ करवा देने की बात कहते है।
4. मृतप्राय को जिंदा करने की ताकत : करोली बाबा जैसे कई बाबा लोग भी हैं, जिनके शिष्य ऐसे किस्से सुनाते है जिसमें बाबा के दर्शन मात्र से मृत प्राय: व्यक्ति भी जिंदा हो उठा।
5. स्वर्ग में सीट पक्की : ये लोग अपने साधकों को दीक्षा देकर सतलोक यानी स्वर्ग की प्राप्ति का दावा करते है । इसके लिए गुरु की दीक्षा और गुनाम लेना जरुरी बताते है इसके बाद उसकी स्वर्ग में सीट पक्की ।
6.गुरुनाम लेने के बाद यज्ञ कर्म और धार्मिक कर्मकांडो से मुक्ति, रिश्वत लेने की छूट, शराब और ऐयाशी तक की छूट, वेद आदि धर्म ग्रंथो के अध्ययन की जरुरत नहीं। गुरु हाथ पकड़कर मुक्ति दिला देगा।
सभी पाखंडी गुरुओं की यही सब बातें हैं जो अलग अलग रूप में मुर्ख बनाने के लिए प्रचारित कर दी जाती हैं। प्राय: सभी पाखंडी गुरु यह प्रचलित कर देते हैं की जीवन में जितने भी दुःख, जितनी भी विपत्तियाँ, जितने भी कष्ट, जितनी भी कठिनाइयाँ, जितनी भी दिक्कते जैसे बीमारी, बेरोजगारी, घरेलु झगड़े, असफलता, व्यापार में घाटा, संतान उत्पन्न न होना आदि हैं उन सभी का निवारण गुरुओं की कृपा से हो सकता हैं।

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