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गुजारा भत्ते के बहाने गुजरे जमाने की राजनीति


(राकेश अचल-विभूति फीचर्स)
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करने के साथ ही देश में कांग्रेस विरोधी सियासत भी शुरू हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कोई भी महिला गुजरा भत्ता देने की मांग कर सकती है,इसमें धर्म कहीं भी आड़े नहीं आता।
माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है या नहीं ,ये प्रमाणपत्र देने की जरूरत किसी राजनीतिक दल को नहीं है ,क्योंकि सुप्रीम कोर्ट किसी राजनैतिक दल का अनुषांगिक संगठन नहीं है। लेकिन अब एक बार फिर शाहबानो और राजीव गांधी याद आ गए हैं। इस फैसले के बहाने भाजपा एक बार फिर से कांग्रेस से सवाल करने लगी है। वैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले किसी दल विशेष के फायदे या नुकसान के लिए नहीं होते। वे व्यक्तियों से जुड़े होते हैं ,खासकर उन व्यक्तियों से जो माननीय अदालत की शरण में खड़े होने का साहस जुटाते हैं।
भला हो अब्दुल समद की पत्नी का जो उसने गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। तलाकशुदा महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि समद ने उसे तीन तलाक दिया है।फैमिली कोर्ट ने 20 हजार रुपये प्रति महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने दो अलग-अलग लेकिन एकमत फैसलों में यह बात कही। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सिर्फ शादीशुदा महिलाओं पर ही नहीं बल्कि सभी महिलाओं पर लागू होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले राजनीतिक दलों के लिए ‘सिलेक्टिव’ हो सकते हैं लेकिन कानून के लिहाज से वे हमेशा उचित माने जाते हैं। तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के मामले में 10 जुलाई का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 1985 में भी शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी पर लागू होती है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। हालांकि इस फैसले को तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार ने, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 लाकर कमजोर कर दिया था जिसमें कहा गया कि मुस्लिम महिला केवल इद्दत के दौरान (तलाक के 90 दिन बाद) ही गुजारा भत्ता मांग सकती है।
मुझे याद आता है कि साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन फैसला सुनाया कि तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने का पुरुष का दायित्व तब तक जारी रहेगा जब तक वह दोबारा शादी नहीं कर लेती या खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हो जाती। बात 34 साल पुरानी है
सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नहीं है । सुप्रीम कोर्ट का फैसला 34 साल पहले के फैसले से भिन्न थोड़े ही है। फैसला तब भी सही था और आज भी सही है । गलत तो ये है कि इस फैसले का सियासी इस्तेमाल किया जा रहा है ।
बहरहाल मैं मुस्लिम समाज की तमाम तलाकशुदा महिलाओं के हक में आये इस फैसले का तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ ।(विभूति फीचर्स)

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