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धर्म-अध्यात्म

आत्मा शरीर में कहां रहता है? भाग 13

13वीं किस्त।

बृहदारण्यक उपनिषद पृष्ठ संख्या 1145,1146
“जगत उत्पन्न होने से पहले प्रलय काल में प्रकृति गति शून्य और जड़ता पूर्ण हुआ करती है। जब ईश्वर गति देता है तो वह आंदोलित होकर विकृत हुआ करती है।(जिसको बहुत से विद्वानों ने महा विस्फोट का नाम दिया है) प्रकृति की असली हालत न रहने और महतत्व के उत्पन्न होने से पहले की अर्थात बीच की आंदोलन प्रकृति का नाम ‘आप’ ‌है। यहां’ आप ‘ शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। उस,’ आप’ से सूक्ष्म और स्थूल भूत उत्पन्न होकर दृश्यमान जगत उत्पन्न होता है । यहां जगत के लिए ‘ सत्य’ शब्द इसलिए प्रयुक्त हुआ है। जिससे कोई उसे मिथ्या नहीं समझे ।उस महान दृश्यमान‌ जगत से क्रमपूर्वक जगत उत्पत्ति की प्रथानुसार ‘हृदय’ उत्पन्न होता है। उस हृदय की प्रकृति का सूत्रपात होने से ‘ इंद्रिय ‘ उत्पन्न होने लगती हैं। दृश्य जगत इंद्रियों के विषय शब्द, स्पर्श आदि से पूर्ण होता है।
इसलिए इंद्रियां उनकी उपासना अर्थात उनका उपभोग करने लगती है
वह दृश्यमान जगत सत्य है। इसलिए इस सत्य का रहस्य उपनिषत्कार उद्घाटित करते हैं। उन्होंने बतलाया कि यह शब्द तीन अक्षरों से ‘स ” ती’ ‘यम ‘से बना हुआ है ।जिनमें’ स’ और ‘यम’ पहले और अंत के अक्षर सत्य है। और बीच की’ ती ‘‌ का अक्षर असत्य है ।आदि और अंत के अक्षरों को सत्य और बीच वालों को अनृत (अर्थात असत्य अथवा अनि्त्य) कहने के दो कारण हैं।
पहला कारण यह है की सत्य दृश्य मान जगत की उत्पत्ति का कारण ईश्वर प्रदत्त गति और जगत का अंत होने से बाकी रहने वाली कारण रूप प्रकृति, नित्य होने से दोनों सत्य है। परंतु मध्य का जगत विकृत हुई प्रकृति ,विकृत और अनित्य होने से उसे अनृत कहा गया है। इसका दूसरा कारण यह है कि’ स’ और ‘यम’ स्वर होने से सत्य और ‘त’ व्यंजन होने से असत्य है।
सत्य शब्द के उपरोक्त तीनों अक्षरों में’ स’ पहला और दूसरा ‘यम ‘ सत्य और बीच का ‘ती’ केवल एक अनृत है। इसलिए सत्य की जगत की वास्तविक सत्ता में बहुतायत है। और इसीलिए इस रहस्य के समझने वाले विद्वान जगत के चमक दमक वाले पदार्थ का शिकार नहीं बना करते हैं।”

लो जी दूर हुई यह शंका भी कि बहुत लोग कहते थे कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या ।
लेकिन ऐसा नहीं है जगत भी सत्य है। समझने की बात यह रही कि जगत विकृत हुई प्रकृति है। और विकृत और अनित्य होने से उसे मिथ्या समझा जाने लगा। जबकि हम जानते हैं कि ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों अमर है। और इस प्रकृति के विकृत स्वरूप में जगत है। और यह सृष्टि में प्रत्येक बार जगत ‌ रचा अथवा बनाया जाता है ।ईश्वर उसको गति प्रदान करता है इसलिए जगत प्रवाह से सत्य हुआ।

पृष्ठ संख्या 1147

जब ज्ञानी पुरुष जीवन मुक्त इस शरीर को छोड़कर ब्रह्म लोक के लिए सूर्य के मार्ग से सूर्य लोक में पहुंचता है, तब उसे वह अपने लिए शुद्ध ही पाता है। क्योंकि वह मुक्त जीव सूर्य लोक से आगे ब्रह्म लोक को चला जाता है। इसलिए अब शौर्य शक्ति किरणों के द्वारा उसकी ओर नहीं जाती। क्योंकि इस शक्ति की उपयोगिता शरीर के लिए ही हुआ करती है ।और वह मुक्त आत्मा शरीर को चिरकाल के लिए छोड़ चुका होता है”

पृष्ठ संख्या 1148 -1149

सूर्य मंडल और सीधे नेत्र में जो पुरुष अर्थात आत्मा उनके सर ‘भू’ और पैर’ स्व’है ।अंगों की संख्या और अक्षरों की संख्या केवल उपमा क्षमता दिखलाने के लिए दी गई है उसका और कुछ अभिप्राय नहीं है। पता है इससे कोई नहीं भ्रांति पैदा मत कर लेना कि आत्मा के सर और पैर होते हैं।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट,
ग्रेटर नोएडा।
चलभाष,
9811 838317
7827 681439

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