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आओ कुछ जाने भारतीय संस्कृति

शरीर में आत्मा कहां रहती है? भाग 12

शरीर में आत्मा मृत्यु के समय हृदय में अपनी इंद्रियों की सारी शक्तियों को लेकर वापस आ जाती है । और वहां से विदाई लेती है।विगत किस्त में हम ऐसा वर्णन पढ रहे थे। तथा आत्मा के द्वारा योनि परिवर्तन के विषय में भी पढ़ रहे थे।
इसको और अधिक स्पष्ट करते हुए एक अन्य उदाहरण से समझने का प्रयास किया गया है।

पृष्ठ संख्या 1121 वृद्धारण्यक उपनिषद।

“एक दूसरा उदाहरण योनि परिवर्तन के संबंध में इस कंडिका में दिया गया है। जैसे एक सुनार सोने के एक टुकड़े को लेकर उसे नई और अच्छे रूप वाली वस्तु अंगूठी आदि बना लेता है। इसी प्रकार यह जीव वर्तमान जीर्ण- शीर्ण शरीर को छोड़कर उसकी जगह नया और अधिक सुखप्रद शरीर बना लेता है।”
गीता के द्वितीय अध्याय में इसी भाव को ‘ वांसासि जीर्णानि ‘ शरीर की वस्त्रों से उपमा देकर बड़े हृदयग्राही शब्दों में प्रस्तुत किया गया।
पृष्ठ संख्या 1123 पर।
” जीव की जैसी कामना होती है वैसी ही प्रतिभा वाला बनता है। और जैसी प्रतिभा होती है वैसे ही कर्म करता है और जैसे कर्म करता है वैसा ही उसे फल मिल जाया करता है।”

पृष्ठ संख्या 1126।

” ब्रह्मरंध्र से जीव उसी समय निकला करता है जब उसे
आवागमन के चक्र से छूटकर मोक्ष प्राप्त करनी होती है”।

पृष्ठ संख्या 1130

“जो मनुष्य इस लोक अर्थात प्रचलित जन्म में आत्मोन्नति करते; हुए ईश्वर को जान लेते हैं तब तो वह अपना जन्म सफल करते हुए अमर हो जाते हैं। अन्य अज्ञानी पुरुष दुख के भागी बना करते हैं।”

पृष्ठ संख्या 1133

“निश्चय वह यह आत्मा महान और अज है, जो यह सब प्राणों में विज्ञानमय (अर्थात विशेष ज्ञान) वाला है जो यह हृदय के बीच आकाश है उसमें वह व्यापक है। सबका वश कर्ता ,सबका शासक और सबका स्वामी है, आत्मा श्रेष्ठ कर्मों से न बढ़ता है और न बुरे कर्मों से घटता है। यह सब का स्वामी, समस्त भूतों का अधिपति, प्राणियों का पालक और यह भवसागर का सेतु है।

अर्थात 10 प्रकार के प्राणों, (प्राण ,अपान, व्यान, उदान, समान, नाग ,कूर्म ,कृकल, देवदत्त, धनंजय)दसों इंद्रियों(पांच ज्ञानेंद्रियों ,पांच कर्मेंद्रियां) मन, बुद्धि और अहंकार आदि को वश में करके उन सब का अधिपति आत्मा है।

पृष्ठ संख्या 1143

” समस्त इंद्रियों आदि ज्ञान उपलब्ध करके हृदय की भेंट करती है और हृदय से इस ज्ञान को मनुष्य लेकर अन्य तक पहुंचाता है।इन दोनों के कर्तव्यों के पालन करने से वह स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है”
इस प्रकरण से भी स्पष्ट हुआ कि
हृदय में पहुंचाने का मतलब है कि हृदय में स्थित आत्मा को भेंट करना है।

पृष्ठ संख्या 1144 पर हृदय को और अधिक स्पष्ट किया गया है।

” हृदय की महत्ता बार-बार बतलाई गई है ।हृदय को कहा गया कि वह सत्य ब्रह्म है। सत्य शब्द सच्चाई के अर्थ में यहां प्रयुक्त नहीं हुआ, किंतु सत् मूर्त और अमूर्त रूप पंचभूत से अभिप्रेत हैं। जैसा कि इसी उपनिषद में एक दूसरी जगह प्रयुक्त है ,जहां ब्रह्म शब्द भी पंचभूत समूह के लिए आया है। और उस मूर्त और अमूर्त का संघात बतलाया गया है। भाव यह है कि हृदय प्राकृतिक है। (अर्थात प्रकृति जन्य है)
फिर भी उस हृदय को महान और पूज्य कहा गया है ।इसलिए कि शरीर की स्थिति का कारण हृदय है ।उसकी गति रुकने से ही शरीर बेकार हो जाता है। इसलिए समस्त इंद्रियों और अंतःकरणों का वह पूज्य होता ही है ।फिर उसे अग्रज इसलिए कहा गया है कि गर्भ स्थापन के साथ ही उसकी बुनियाद सर्वप्रथम पड़ जाती है। जो मनुष्य हृदय की उपयोगिता कम समझता है वह ज्ञानियों से पराजित होता है।”

अज का तात्पर्य अजर से है। अर्थात जो कभी वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होता।
संघात कहते हैं पदार्थ के मिलन को।
अग्रज कहते हैं जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है, जो सबसे आगे है जो सबसे पहले है ,वह अग्रज है। अर्थात गर्भ स्थापन के समय सबसे पहले आत्मा आती है इसलिए उसको अग्रज कहा गया है।
हृदय को जो सत्य ब्रह्म कहा गया है वह ईश्वर के रूप में नहीं है। कभी फिर भ्रांति पाल लें कि ‘अहम ब्रह्मस्मी’
संसार में जो भूत हैं जो हमारे शरीर के उपादान कारण हैं। पांच भूत भी ब्रह्म कहे जाते हैं।
पांच भूतों से बने हुए इस शरीर को ब्रह्म कहना ऐसे सीमित अर्थों में हो सकता है लेकिन व्यापक अर्थों में ब्रह्म केवल परमात्मा है।
पंचमहाभूतों में तीन मूर्त हैं।पृथ्वी, जल और अग्नि।
लेकिन वायु और आकाश अमूर्त भूत हैं।
यही पंचमहाभूत हमारे भौतिक शरीर का उपादान कारण होते हैं। उपादान कारण का मतलब है जिनसे शरीर बनता है। जो इस शरीर के बनने के कारण हैं जैसे मिट्टी से बर्तन बनता है तो मिट्टी बर्तन का उपादान कारण है।
जैसे आटे से रोटी बनती है तो आटा रोटी का उपादान कारण है।

क्रमश:
अग्रिम किस्त में।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट,
ग्रेटर नोएडा
9811838317
7827 681439

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