वैदिक सम्पत्ति – 335 वैदिक आर्यों की सभ्यता, जड़ सृष्टि से उत्पति

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(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक सम्पत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

  प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य    
  (चेयरमैन 'उगता भारत')

गताक से आगे …

जड़ सृष्टि से चेतन सृष्टि का सम्बन्ध

जड़ सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए हम लिख आये हैं कि हमारा यह सौर जगत् ही विराट् है। इस विराट् का शिर द्यौ अर्थात् सूर्यस्थानी आकाया है, नेत्र सूर्य हैं, प्राण हवा है, पेट विद्युत और मेघ हैं और पैर पृथिवी है। पृथिवी से लेकर आकाश तक इस विराट् के खड़े आकार का यह रूपक मनुष्य के खड़े शरीर के साथ मिल जाता है अर्थात् मनुष्य का भी शिर द्यौ की ओर और पैर पृथिवी की ओर ही हैं और वह भी विराट् की तरह खड़े शरीरवाला ही है। इसका कारण विराट् और मनुष्य का पितापुत्रसम्बन्ध ही है। आदिम अमैथुनी सृष्टि विराट् से ही उत्पन्न होती है, इसलिए मनु भगवान् कहते हैं कि मैं- मनुष्य – विराट् से ही उत्पन्न हुआा हैं । + मनुष्य विराट् के ही आकार का है। इसलिए बाइबल में भी कहा गया है कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी आकृति का बनाया ‘अङ्गादङ्गात्संभवश्सि’ के अनुसार विराट् के प्रत्येक अङ्ग से मनुष्य के प्रत्येक अंङ्ग की उत्पत्ति हुई है और दोनों के अङ्गों का आधार झाधेय सम्बन्ध है। मनुष्य के शिर का आधार द्यौ है, अतः जबतक शिर द्यौ की ओर रहता है, तभी तक मनुष्यका मस्तिष्क और मेवा काम करती है। परन्तु ज्यों ही शिर द्यौ की ओर से हट जाता है, त्यों ही मस्तिष्क की मेघा अर्थात् ज्ञानशक्ति मन्द और अन्धकाराच्छन्न हो जाती है। यह बात हमको दो अनुभवों से ज्ञात होती है। एक तो जब हम अपने शिर को द्यौ की ओर से हटाकर लेट जाते हैं तो निद्रा आने लगती है और ज्ञानशक्ति मन्द पड़ने लगती है, अर्थात् ह्म विना द्यौ की ओर से शिर को हटाये सो नहीं सकते – बेहोश नहीं हो सकते । दूसरे जब हम कोई नशा पीते हैं और हमारी बुद्धि मन्द होने लगती है तब हमारे पैर लड़खड़ाने लगते हैं और हम गिरने लगते हैं अथवा पड़कर सो जाते हैं। अर्थात् हम बुद्धि खोकर और बेहोश होकर खड़े नहीं रह सकते। इन दोनों नित्य के अनुभवों से यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो रही है कि हमारे शिर और बुद्धि का द्यौलोक


  • मां-स- भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाम्यहम् ।

एताम्मांसस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिणः ।। (मनु० ५।५५)

अर्थात् जिसका मैं यहाँ मांस खाता हूँ, वह परलोक में मेरा मांस खायगा। विद्वानों ने मांस शब्द की बही निरुक्ति की है।

  • तपस्तप्त्वासूजय तु स स्वयं पुरुषो विराट्। तं मां वित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारं द्विजसत्तमाः ।।

से आधाराधेय सम्बन्ध है। जिस प्रकार द्यौ का शिर के साथ सम्बन्ध है, उसी तरह सूर्य और नेत्रों का भी सम्बन्ध है। जब तक सूर्य रहता है, तभी तक नेत्र काम देते हैं, पर जब सूर्य अस्त हो जाता है और अंधेरा हो जाता है, तब नेत्र भी अन्ये हो जाते हैं। संसार में जितना प्रकाश है, चाहे बिजली का हो अथवा अग्नि का, सब सूर्य से ही प्राप्त होता है। इसीलिए वेद में सूर्य और अग्नि को एक ही कहा गया है। इस सूर्यरूपी अग्नि से ही बिजली, गैस और तेल के चिराग जलते हैं और चिरागों को जलाकर ही सूर्य का स्थानापन्न प्रकाश उत्पन्न किया जाता है तब नेत्र काम देते हैं। कहने का मतलब यह कि सूर्य और नेत्रों का भी आघाराषेय ही सम्बन्ध है। बायु और प्राणों का तथा प्राणों और बाहुबलों का भी वही सम्बन्ध है। यदि संसार से वायु सींच ली जाय, तो हम एक बार भी साँस नहीं ले सकते और विना प्राण के थोड़ा भी बल प्राप्त नहीं कर सकते। इसीलिए ‘आणो वै बलं’ कहा गया है। प्राण और बल का सम्बन्ध उस समय अधिक स्पष्ट होता है, जब काम करते करते मनुष्य की दम उखड़ जाती है। दम के उखड़ते ही मनुष्य निर्बल हो जाता है, इसलिए वायु और प्राण का तथा प्राण और बल का भी आधाराधेय ही सम्बन्ध सिद्ध होता है। पृथिवी घौर पैरों का जैसा घनिष्ठ सम्बन्ध है, वह प्रत्यक्ष ही है। अर्थात् विना पृथिवी के कोई भी खड़ा नहीं हो सकता। कहने का मतलब यह है कि हमारे जितने अङ्ग-उपाङ्ग हैं, वे सब विराट् के चङ्गों के साथ नत्थी हैं और उन्हीं के सहारे स्थिर हैं।

हम लिख आये हैं कि मनुष्य को यह शरीर बुद्धिपूर्वक सात्त्विक कर्म करने से ही मिला है। अर्थात् बुद्धि के सदुपयोग ही से वह विराट् की झाकृति का बन सका है और इस प्रकार विराट् के प्रत्येक अङ्ग से सहयोग प्राप्त कर सका है। किन्तु जिन मनुष्यों ने बुद्धि का उचित उपयोग नहीं किया, केवल अन्धपरम्परा से कुछ न कुछ करते रहे हैं उनकी बुद्धि का सदर मुकाम, शिर, द्यौलोक की घोर से हटाकर क्षितिज की ओर झाड़ा कर दिया गया है और सब पशु बना दिये गये हैं। बुलबुल से लेकर शुतुरमुर्ग तक, मछली से लेकर मगर तक, हाथी से लेकर लीख तक और बन्दर से लेकर वनमनुष्य (गोरिला) तक जितने पशु कहलानेवाले प्राणी हैं, सब आड़े शरीरवाले ही हैं। इनमें से किसी का शिर चाकाश की ओर नहीं है। हाँ, ये चलते फिरते अवश्य हैं। इस से ज्ञात होता है कि इनकी कर्मेन्द्रियों का हास नहीं हुआ। इसका कारण यही है कि इन्होंने जान बूझकर अनाचार नहीं किया। परन्तु जिन मनुष्यों ने प्रमाद और अभिमान से जान बूझकर दुष्कर्म किये हैं, उनकी कर्मेन्द्रियाँ भी छीन ली गई हैं और उनकी ज्ञानेन्द्रियों का सदर मुकाम ‘शिर’ जमीन में गाड़ दिया गया है घौर सब वृक्ष बना दिये गये हैं। इसीलिए न तो वे कुछ शान ही रखते है और न इधर उबर चल फिर ही सकते हैं। इसी त्रिगुणात्मक सृष्टि के विषय में कपिलमुनि कहते हैं कि-

कचें सत्त्वविशाला तमोविशाला मूलतः मध्ये रजोविशाला ।

नावृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धेयः

आबहारतम्वपर्यन्तं तत्कृते सृष्टिराविवेका (सांख्यदर्शन)

अर्थात् सतोगुणी कर्म करनेवाले ऊपर की ओर जाते हैं, रजोगुणी मध्य की भोर बाते हैं धौर तमोगुणी नीचे की ओर जाते हैं। इस तरह से योनियों का एक दूसरी में जाने का भङ्कर लगा ही रहता है। परन्तु बझा अर्थाद मनुष्यजाति के बादि पितामह र लकार स्तम्ब अर्थात् वृक्षों तक विवेक करने से यह चक्कर छूट जाता है। इन सूत्रों में मनुष्य से लेकर वृक्षों तक के भार को बतला कर स्पष्ट कर दिया गया है कि सतोपुरली मनुभ्य खड़े शरीरवाले, रजोगुणी पशु बाड़े शरीरवाले और तमोगुणी वृक्ष उडे शरीरवाते हैं और अपने अपने कमों के अनुसार विराद् अर्थाद जड़ दृष्टि के साथ सम्बन्ध रखते हैं।
क्रमशः

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