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भारतीय संस्कृति

जैन मत समीक्षा* –भाग _____१८

Dr DK Garg

निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखों की मदद ली गयी है। कृपया अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।

जैन धर्म में संथारा

एक प्रश्न ये हो सकता है की जन्म और मृत्यु होना दुखद है या सुखद ? अनेक जन मृत्यु को दुखदायी व जन्म को सुखदायी मानते हैं। क्योकि मृत्यु का भय अभिनिवेश क्लेश है जो सभी जीवो में पाया जाता है दिखता है। वर्तमान जीवन में हम किसी व्यक्ति को मरता हुआ देखते हैं उसके मरने पर उसके संबंधियों को जो दुख होता है इस प्रक्रिया को देखकर भी तो हमें मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। इसलिए जैन मुनि जो अपनी इच्छा से खाना पीना छोड़ देते है और ख़ुशी से मृत्यु को गले लगाते है ,उनको तपस्वी कहते है और ऐसे तपस्वी मोक्ष्य के अधिकारी है।

इस प्रश्न का उत्तर है की —
1- सांसारिक दृष्टिकोण से जन्म लेना सुखदायक है। क्योंकि जन्म लेने के बाद ही व्यक्ति कुछ अच्छे कर्म करके उन्नति कर सकता है। कुछ सुख भोग सकता है। कुछ सेवा परोपकार आदि शुभ कर्म भी कर सकता है। परन्तु मृत्यु होने पर यह सारी सुविधाएं छूट जाती हैं , खो जाती हैं। इसलिए सांसारिक स्तर पर मृत्यु दुखद होती है।

२ आध्यात्मिक दृष्टि से संसार में जन्म लेना दुख का कारण है, क्योंकि जन्म लेने के बाद बहुत से दुख भी भोगने पड़ते हैं। मृत्यु का जो भय, पैदा होने के कुछ ही समय बाद आरंभ हो जाता है, वह पूर्व जन्म के संस्कारों से इस जन्म में आया है। न्याय दर्शन में महर्षि गौतम जी कहते हैं, यदि आप दुखों से छूटना चाहते हों, तो अगला जन्म लेना बंद करें। यदि अगला जन्म नहीं होगा, तो आपका मोक्ष हो जाएगा, और मोक्ष में आप सब दुखों से छूटकर ईश्वर के आनंद की अनुभूति करेंगे। इसलिए जन्म लेना आध्यात्मिक दृष्टि से अच्छी बात नहीं है। परन्तु केवल योग्य व्यक्ति की मृत्यु होना उसके लिए मोक्ष प्राप्ति का द्वार है, इसलिए अच्छा है। क्योंकि जब व्यक्ति मोक्ष में जाएगा, तो बिना मृत्यु के तो जाएगा नहीं। जिस योगी व्यक्ति ने अपने अविद्या आदि पांच क्लेश पूरी तरह से नष्ट कर लिए हों, वह मोक्ष के योग्य है। उसके लिए मृत्यु सुखदायक है।
और यदि किसी की मृत्यु बुढ़ापे में हो, जो स्वाभाविक मृत्यु होती है, वैसी हो, तो वह भी उस व्यक्ति के लिए सुखदायक है। क्योंकि 80 90 साल की उम्र में चलना फिरना मुश्किल हो जाता है। ठीक से दिखाई नहीं देता। ठीक से सुनाई ‍ नहीं देता। तब व्यक्ति अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है। तो वह भी मृत्यु होने पर इन सब समस्याओं से छूट जाता है। उसके लिए भी मृत्यु सुखदायक है।

योग दर्शन में लिखा है, की पांच प्रकार के क्लेश समाप्त होने पर व्यक्ति राग द्वेष से मुक्त हो जाता है। ये पांच क्लेश क्या है –

अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: पञ्च कलेशा: ।। 3 ।।

शब्दार्थ :- अविद्या, ( सुख को दुःख और दुःख को सुख समझना ) अस्मिता, ( कर्ता व कर्म को एक ही मानना ) राग, ( अत्यधिक आसक्ति अथवा प्रेम ) द्वेष, ( अत्यधिक कटुता या नफरत ) अभिनिवेश, ( मृत्यु का भय मानना यह ) पंच, ( पाँच ) कलेशा:, ( क्लेश अर्थात दुःख या कष्ट हैं । )

अविद्या- चार प्रकार की है। एक- नित्य को अनित्य तथा अनित्य को नित्य मानना, शरीर तथा भोग के पदार्थों को ऐसे समझना तथा व्यवहार करना कि जैसे ये सदा रहने वाले हैं। दूसरा- अपवित्र को पवित्र तथा पवित्र को अपवित्र मानना, नदी , तालाब, बावड़ी आदि में स्नान से या एकादशी आदि के व्रत (फाके) से समझना कि पाप छूट जाएंगे। सत्यभाषण, न्याय, परोपकार, सबसे प्रेमपूर्वक बर्तना आदि में रूचि न रखना। तीसरा- दु:ख के कारण को सुख का कारण तथा सुख के कारण को दु:ख का कारण मानना- काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, ईर्ष्या, द्वेष तथा विषय वासना में सुख मिलने की आशा करना। प्रेम, मित्रता, सन्तोष, जितेन्द्रियता आदि सुख के कारणों में सुख न समझना। चौथा- जड़ को चेतन तथा चेतन को जड मानना, पत्थर आदि की पूजा ईश्वर पूजा समझना तथा चेतन मनुष्य, पशु , पक्षी आदि को दु:ख देते हुए स्वयं जरा भी महसूस न करना कि जैसे वे निर्जीव हों।
२:- अस्मिता- जीवात्मा और बुद्धि को एक समझना अस्मिता है। अभिमान के नाश होने पर ही गुणों के ग्रहण में रूचि होती हैं।
३:- राग- जो जो सुख संसार में भोगे हैं, उन्हें याद करके फिर भोगने की इच्छा करना राग कहलाता है। हर संयोग के पश्चात् वियोग होता है- जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को हो जाता है तब यह क्लेश मिट जाता है।
४:- द्वेष- जिससे दु:ख मिला हो उसके याद आने पर उसके प्रति क्रोध होता है, यही द्वेष है।
५:- अभिनिवेश- सब प्राणियों की इच्छा होती है कि हम सदा जीवित रहे, कभी मरे नहीं, यही अभिनिवेश है। यह पूर्वजन्म के अनुभव से होता है। मरने का भय मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग सभी को बराबर रहता है।
योगी के चित्त पर गुणों का अधिकार (प्रभाव) समाप्त हो जाता है। अधिकार का अर्थ है प्रभाव। अर्थात रजोगुण और तमोगुण योगी के चित्त को अब संसार की ओर घसीट कर नहीं ले जा सकते। और योगी अपने चित्त को दिनभर सात्विक स्थिति में बनाए रखता है, और उससे अपने सारे कार्य करता रहता है। इसमें कोई उसको बाधा नहीं होती।राग द्वेष से युक्त सांसारिक व्यक्ति का इतना सामर्थ्य नहीं होता, कि वह रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव को अपने चित्त से पूरी तरह से हटा पाए। इसलिए वह ऐसा अनुभव करता है कि मैं इस काम को नहीं करना चाहता, फिर भी मैं किये जा रहा हूं। इसे कहते हैं गुणों का अधिकार अर्थात रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव।

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