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भारतीय संस्कृति

जैन मत समीक्षा –भाग ____१७

Dr DK Garg

निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखों की मदद ली गयी है। कृपया अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।

जैन धर्म में संथारा

हमारी मृत्यु कैसे हो ? इस विषय में शाश्त्र क्या कहते है ?
त्रयम्बक यमामहे सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम्।
ऊर्वारुर्कामव बन्धनामृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।। ऋग्वेद 7/57/12, यजुर्वेद 3160

इसमे भक्त ईश्वर से प्रार्थना करता है कि – हे ईश्वर ! आप निराकार, सर्वव्यापक, तीनों लोकों के स्वामी, सर्वज्ञ और सब जगत को पुष्टि प्रदान करने वाले हो, सबके पालनहार हो । जिस प्रकार खरबूजा सुगन्धि व रस से पक कर बेल रुपी बन्धन से स्वत: ही अलग हो जाता है उसी प्रकार हम भी आपकी भक्ति द्वारा ज्ञान बल व आनन्द में परिपक्व होकर इस संसार रुपी बन्धन से छूट कर मोक्ष को प्राप्त हो जावें !

संथारा का वास्तविक भावार्थ महावीर की दृष्टि में — वर्तमान में संथारा का प्रचलन महावीर के बताये रस्ते से बिलकुल अलग है। महावीर ने कहा है –महावीर ने कहा है– किसी व्यक्ति की अगर जीवन की आकांक्षा शून्य हो गयी हो तो , वह मृत्यु में प्रवेश कर सकता है। भोजन-पानी छोड़कर मृत्यु का इंतज़ार कर सकता है।
उपरोक्त से ये प्रतीत होता है की महावीर ने आत्म हत्या के लिए नहीं उकसाया ,बल्कि ये कहा की जो व्यक्ति बिलकुल असहाय है , और साधारण तरीके से जीवन जीना बिलकुल असंभव हो जाये तो ज्यादा दुखः भोगने के बजाय संथारा विधि से प्राण त्याग देवे।
इस प्रकार से ये कोई तप नहीं है केवल अपने देखो से छुटकारा पा लेना है।
तप क्या है ? तप को दो प्रकार से समझे –१) सत्त्वगुणी तप
तप के विषय में हमारे धर्म ग्रन्थ क्या कहते है ?
तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग: ।। 1 ।।Yoga Sutra 2 – १
शब्दार्थ :- तपः, ( सुख- दुःख, मान- अपमान व लाभ- हानि आदि द्वन्द्वों को सहना ) स्वाध्याय, ( गायत्री मन्त्र आदि का जप एवं मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन करना ) ईश्वरप्रणिधान, ( बिना किसी फल की इच्छा के अपने सभी कर्म भगवान को समर्पित कर देना ) क्रियायोग, ( क्रियायोग अर्थात इन तीनो क्रियाओं का एक साथ पालन करना क्रियायोग कहलाता है । )
सूत्रार्थ :- सुख-दुःख, मान- अपमान व लाभ- हानि आदि सभी द्वन्द्वों को आसानी से सहन करना, गायत्री आदि मन्त्रो का जप व मोक्ष प्रदान करवाने वाले ग्रन्थों का अध्ययन करना व अपने समस्त कर्मों को बिना किसी तरह के फल की इच्छा के ईश्वर में समर्पित कर देना ही क्रियायोग कहलाता है ।
यथार्थ शुद्ध भाव, सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना, मन को अधर्म में न जाने देना, वाह्य इन्द्रियों को अन्यायाचरण में जाने से रोक रखना अर्थात शरीर, इन्द्रिय और मन से शुभ कर्मों का आचरण करना, वेदादि सत्य विद्याओं का पढ़ना-पढ़ाना, वेदानुसार आचरण करना आदि उत्तम धर्मयुक्त कर्मों का नाम तप है।- स्वामी दयानंद
द्वन्द्वसहनं तप:’ अर्थात् द्वन्द्वों को सहन करना तप कहलाता है। धर्म, सत्य और न्याय-मार्ग पर चलते हुए विघ्न-बाधाओं, कष्ट-क्लेशों, भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय, हर्ष-शोक और मान-अपमान, उत्थान-पतन, जन्म-मृत्यु को समभाव से सहन करना ही तप कहलाता है।
महाभारत में युधिष्ठिरजी महाराज ने तप का अर्थ किया है―
‘तप: स्वकर्मवर्तित्वम्’―’पूरी निष्ठा से कर्त्तव्यपालन’ का नाम ही तप है।
चाणक्य जी ने तप की यह परिभाषा की है―
‘तप: सार इन्द्रियनिग्रह’―तप का सार जितेन्द्रियता है। विलासी व्यक्ति तप की पवित्रता को बनाये नहीं रख सकते।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरे:।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं परिचक्षते।।―(गीता १७ । १७)
भावार्थ―फल की इच्छा न करने वाले, योग में लगे हुए मनुष्यों से और उत्कृष्ट श्रद्धा से तपाया गया―यह तीन प्रकार का तप सत्त्वगुणी तप कहलाता है।

२) तामसिक तप–गीता में गुणों की दृष्टि से तीन प्रकार का तप बताया गया है―सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तप। जो निम्न प्रकार है―

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।। ―(गीता १७।१८)
भावार्थ―जो तप आदर, बड़ाई और पूजा के लिए और कपट से किया जाता है, वह रजोगुणी तप कहा गया है।
मूढग्राहेणात्मनो यत् पीडया क्रियते तप:।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाह्रतम्।। ―(गीता १७।१९)
भावार्थ―जो तप मूर्खता के आग्रह से आत्मा को कष्ट देकर अथवा दूसरे को उखाड़ने के लिए किया जाता है, वह तमोगुणी तप कहलाता है

क्या वेद संथारा या अन्य किसी विधि से प्राण त्यागने का समर्थन करता है –वेद क्या कहता हैं?
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात ।।
संक्षिप्त भावार्थ; शरीर के सभी अंगों को स्वस्थ रखने के संकल्प के साथ साथ ईश्वर से शतायु होने की प्रार्थना की गई है।शरदः शतं पश्येम आपकी कृपा से हम सौ वर्षों तक आपको व जगत को देखें शरदः शतं जीवेम सौ वर्षों तक प्राणों को धारण कर जीवित रहें शरदः शतं शृणुयाम सौ वर्षों तक शास्त्रों और मङ्गल-वचनों को सुनें शरदः शतं प्रब्रवाम सौ वर्षों तक स्वयं द्वारा समझी वास्तविकताओं का उपदेश करें शरदः शतं अदीनाः सौ वर्षों तक अदीन अर्थात स्वतंत्र, स्वस्थ, समृद्ध और सम्मानित स्याम रहें च और आपकी कृपा से ही शरदः शतात भूयः सौ वर्षों के उपरान्त भी हम लोग देखें, जीवें, सुने, वेद-उपदेश करें और स्वाधीन रहें।
संथारा द्वारा शरीर के अंगो को निष्क्रिय और कमजोर्र करते रहना ठीक नहीं है । वेद मंत्रो में मानव शरीर के सभी अंगो को स्वस्थ रखने और इनके सदुपयोग से कर्म करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है। ये समझने के लिए हम एक वेद मंत्र का सहारा लेते है जिसमे साधक जल से अपने शरीर के अंग स्पर्श करते हुए ईश्वर से ये प्रार्थना करता है;
ओम वाक वाक ,ओं प्राणः प्राणः
ओं चक्षुः चक्षुः ,ओं श्रोत्रं श्रोत्रं,
ओं नाभिः,ओं हृदयम,ओं कण्ठः,
ओं शिरः,ओं बाहुभ्यां यशोबलम
ओं करतलकरपृष्ठे ।
हे सर्वरक्षक, परमेश्वर! आपकी कृपा से मेरा सारा शरीर स्वस्थ, यशवान और बलवान बने रहे।और मैं अपने इन अंगों का सदुपयोग करता रहूं।
ये शरीर का तप है जिसमे ईश्वर के आंख ,नाक,कान,मुंह,आदि को स्वस्थ रखने के संकल्प के साथ इनका सदुपयोग करके 100 वर्ष तक जीने की प्रार्थना करता है।

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