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डॉ डी के गर्ग
निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखो की मदद ली गयी है। कृपय अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।
भाग-12
जैन मत में मूर्ति पूजा
परमात्मा /ईश्वर का स्वरूप -जिसकी आराधना करनी चाहिए –
(१) ईश्वरीय सत्ता सर्वमान्य है। नास्तिक भी उसके संचालित नियमों का उल्लंघन नहीं कर पाते। ईश्वर नियामक होने से यम कहलाता है।
(२) हमारा शरीर बिना आत्म सत्ता के संचालित नहीं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड के संचालनार्थ विश्वात्मा की सत्ता का भान होता है। जीवात्मा अणु और एकदेशी तथा सीमित शक्ति के कारण विश्व की व्यवस्था का संचालक नहीं हो सकता। ब्रह्माण्ड की स्थिरता के कारण इसका व्यवस्थापक भी स्थिर ही हो सकता है।
(३) प्रकृति के अणु अपनी सूक्ष्मता के कारण परमाणु कहलाते हैं। जीवात्मा उनसे सूक्ष्मतर और परमात्मा सूक्ष्मतम है। इन्द्रियों से अर्थ सूक्ष्म है। अर्थों से मन तथा मन से बुद्धि सूक्ष्म है। बुद्धि से आत्मा और आत्मा से महान् आत्मा (परमात्मा) सूक्ष्म है।
(४) इस समस्त ब्रह्माणु का उत्पादक सर्वात्मा है, जो ज्ञानमय में है। बिना ज्ञान के संसार की नियमपूर्वक प्रवृत्ति असम्भव है।शरीर रूपी पुरी में शयन करने से जीव पुरुष है किन्तु ब्रह्माण्ड पुरी में व्याप्त होने से ईश्वर पुरुष है। इसीलिए इनको जीवात्मा और परमात्मा कहा जाता है। दोनों पुरुष हैं। किन्तु परमात्मा महान् और उत्तम है।प्रवृत्ति और उसका नियमपूर्वक संचालन परमात्मा की सिद्धि में सर्वतः प्रथम तर्क है जो अकाट्य है।
(५) प्रवृत्ति की युक्ति के पश्चात् धृति का प्रश्न है। परमात्मा धारक है। समस्त लोक-लोकान्तरों को धारण कर रहा है। उन्हें समय से पूर्व टूटने-फूटने से बचाता है। वेद में लिखा है-
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। -ऋ० १०/१२१/१
जिस परमात्म-तत्व में समस्त सूर्यादि लोक-लोकान्तर समाए हुए हैं। वही सबसे पूर्व वर्तमान सबका एकमात्र अधिपति है। वह अधीश्वर, प्रकाशमान् तथा अप्रकाशमान सब लोकों को धारण कर रहा है। उस सुख स्वरूप दिव्य-गुण-युक्त प्रभु के लिये हम श्रद्धा और भक्ति से पूजा करें।
सब लोक-लोकान्तर एक दूसरे के आकर्षणादिशक्ति से थमे हुए हैं। सूर्य ने पृथिवी को और पृथिवी ने सूर्य को आकर्षित कर रखा है। किन्तु यह आकर्षण भी किसी नियम विधान के आधीन है। जड़ पदार्थों को नियम में चलने चलाने का ज्ञान नहीं है।
(६) प्रत्येक उत्पत्ति मान पदार्थ का नाश भी आवश्यक है। अतः प्रवृत्ति और धृतिकं पश्चात् निवृत्ति का क्रम है। परमात्मा प्रवर्त्तक, धारक और निवर्श्रक है। पानी से मेघ और मेघ से पानी के चक्र की भांति प्रवृत्ति और निवृत्ति सदैव से चली आ रही है। किन्तु इसकी क्रमबद्धता ईश्वराधीन है। वेद ने परमेश्वर को सूत्र का सूत्र कहा है जिसका अभिप्राय यह है कि वह नियम में बांधने वाला है। सब उसके नियम में बंधे हुए हैं।
संसार की स्थिति नियमों पर है। नियमों के समुञ्चय को ही विज्ञान कहते हैं। कृषि-विज्ञान, नक्षत्र विज्ञानादि प्रत्येक विज्ञान का पारस्परिक संश्लेषों का परम संश्लेष ब्रह्मा विज्ञान है।
(७) ईश्वर कर्मफल प्रदाता है। कर्म भी स्वयं फलदाता नहीं।
(८) ईश्वर पूर्ण है। उसकी रचना का ज्ञान भी पूर्ण है। कहा भी तो है-
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।
सृष्टि में व्याप्त ईश्वरीय नियमों का समुच्चय व्यवहार पूर्ण है। उसका ज्ञान सर्गारंभ में भी ईश्वर की ओर से पूर्ण ही होता है। पूर्ण के पूर्ण को लेकर भी पूर्ण ही अविशिष्ट रहता है।
(9)परमात्मा का वास्तविक स्वरुप –
न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यश: (यजु. अ. ३२ मं. ३) हे मनुष्यों ! ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता, उसकी मूर्ति या आकृति नहीं है, उसकी आज्ञा पालन ही उसका स्मरण करना है ।
ऋतश्च, सत्यश्च, ध्रुवश्च, धरुणश्च, धर्त्ता, च विधर्त्ता च विधारय: । (यजु. अ. १७ मं. ८२)
जो सत्य को जानने वाला, श्रेष्ठ, दृढ़ निश्चय युक्त, सबका आधार और धारण करने वाला तथा धारकों का धारक एवं विशेष रुप से सब व्यवहारों का धारण करने वाला परमात्मा है ।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धं कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य: ।(यजु. अ. ४० मं. ८)
वह ईश्वर चारों ओर विद्यमान है, संसार को उत्पन्न करने वाला है, शरीर रहित है, नस-नाड़ियों के बन्धन में नहीं आता, पवित्र तथा पापों से दूर है, ज्ञानी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अजन्मा, ठीक-ठीक उपदेश करता है, हमेशा रहने वाले जीवों के लिये ।
अपाणि पादौ, जवनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षु, स श्रृणोत्यकर्ण, स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता, तमाहुरग्र्यम् पुरुषं महान्तम् (श्वेताश्वरोपनिषद् अ. ३ श्लोक १९)
सारांश : सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। दुसरे शब्दों में अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है। ज्ञान चार प्रकार का होता है, मिथ्या ज्ञान, संशय ज्ञान, शाब्दिक ज्ञान, और तत्त्वज्ञान।
मिथ्या ज्ञान का अर्थ है “वस्तु कुछ और है, तथा आप समझते कुछ और हैं। इसका नाम मिथ्या ज्ञान है।” जैसे रस्सी को सांप समझ लेना।
संशय का तात्पर्य है “जब मन में दो या दो से अधिक विचार हों, परंतु निर्णय कुछ नहीं हो पा रहा। उसका नाम संशय है।” जैसे ईश्वर है, अथवा नहीं है? ईश्वर न्यायकारी है, अथवा अन्यायकारी है? ईश्वर किसी एक स्थान विशेष में रहता है, अथवा सब जगह रहता है?
शाब्दिक ज्ञान का तात्पर्य है कि “शब्दों से तो आप वस्तु का स्वरूप ठीक समझ रहे हैं, स्वीकार भी कर रहे हैं, बोल भी ठीक रहे हैं, परंतु आचरण उस कथन के अनुसार नहीं कर पा रहे। इसका नाम शाब्दिक ज्ञान है।” जैसे ‘सत्य बोलना चाहिए’ कह तो ठीक रहे हैं, परंतु व्यवहार में पूरा-पूरा सत्य बोल नहीं पा रहे, झूठ भी बोलते हैं। इसी प्रकार से कह तो ठीक रहे हैं, कि ‘क्रोध नहीं करना चाहिए,’ फिर भी व्यवहार में क्रोध करते हैं। उसे पूरी तरह से रोक नहीं पा रहे। इसका अर्थ है, कि जो आप समझ रहे हैं और बोल रहे हैं, वह आपका शाब्दिक ज्ञान है।
चौथे क्रम पर तत्त्वज्ञान है। इसका तात्पर्य है कि “जैसा आप शाब्दिक ज्ञान में ठीक-ठीक समझ रहे थे, बोल रहे थे, वैसा ही आप पूरा-पूरा आचरण भी करते हैं। तो यह जो आपके ज्ञान का स्तर होगा, जिससे आप शाब्दिक ज्ञान को व्यवहार में उतार पाएंगे, इसको तत्त्वज्ञान कहेंगे।” जैसे कि यदि कोई कहे कि ‘क्रोध नहीं करना चाहिए’, और वह व्यवहार में कभी क्रोध नहीं करता, तो इसका अर्थ है, उसे इस विषय में तत्त्वज्ञान हो गया। ऐसे ही यदि कोई कहे कि “ईश्वर न्यायकारी है।’ और वह व्यक्ति भी यह मानता है कि “यदि मैं अन्याय करूंगा, तो ईश्वर मुझे दंडित करेगा। वह मेरा भी न्याय कर देगा।” इसलिए वह कभी दूसरों पर अन्याय नहीं करता।” तो इसका अर्थ है, कि उसे इस बात का तत्त्वज्ञान हो गया, कि “ईश्वर न्यायकारी है।”
तत्त्वज्ञान कैसे प्राप्त होता है? “शाब्दिक ज्ञान को बार-बार दोहराने से, उन बातों का लंबे समय तक व्यवहार में परीक्षण/प्रयोग करने से, वह शाब्दिक ज्ञान, तत्त्वज्ञान में बदल जाता है।” “वह व्यक्ति शाब्दिक रूप से जानकर भी बार-बार उसका अभ्यास नहीं करता। अपने क्रोध असत्य आदि दोषों को दूर करने में परिश्रम नहीं करना चाहता।” यह तात्पर्य है इस बात को कहने का, कि “वह अविद्या में ही जीना चाहता है।”
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पुरुषार्थ करना चाहिए। अपनी अविद्या का नाश करना चाहिए। विद्या की वृद्धि करनी चाहिए। वैदिक शास्त्रों का अध्ययन चिंतन मनन और व्यवहार में तपस्या करनी चाहिए। इसी से उसका कल्याण होगा, अन्यथा नहीं।”
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है की मूर्ति पूजा ईश्वर की पूजा नहीं है , केवल अंधविस्वास है।

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