Categories
धर्म-अध्यात्म

आत्मा शरीर में कहां रहती है? भाग 8

गतांक से आगे आठवीं किस्त।
लेकिन एक महत्वपूर्ण ज्ञानवर्धक किस्त।

इस संबंध में बृहदारण्यक उपनिषद में जो विवरण आया है उसको सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
महर्षि याज्ञवल्क्य महाराज का नाम आपने सुना होगा। आप उनकी विद्वत से भी परिचित होंगे।
राजा जनक से भी आप परिचित हैं जिनको विदेह कहा जाता था।
बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को समझाते हुए निम्न प्रकार बताते हैं।
पृष्ठ संख्या 1084 से 1089 तक
“राजन जो यह सीधी आंख में पुरुष (पुरुष आत्मा को कहते हैं) है यह इंध नाम वाला है। इसी इंध को इंद्र नाम से पुकारते हैं।”
स्पष्ट हुआ कि जागृत अवस्था में जब आत्मा सीधी आंख में रहती है यह तब का प्रकरण है।
इससे आगे महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को निम्न प्रकार उपदेश करते हैं।
“बाई आंख में यह पुरुष रूप इंद्र की विराट नाम की पत्नी है। इन दोनों अर्थात पति-पत्नी की यह मिलने की जगह है जो यह हृदय में आकाश है।”
परंतु ये वास्तव में पति-पत्नी नहीं है। यह साहित्य है।यह भाषा है समझाने के लिए।
दाईं आंख का पुरुष और और बाई आंख में विराट नाम की पत्नी ये दोनों रहते कहां हैं?
स्पष्ट किया कि हृदय में जो आकाश है उसमें रहते हैं।
जैसा हम अन्य उपनिषदों में भी पढ़ते रहे हैं।उसी को बृहद्रारण्यक उपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के संवाद में दिया गया है।
अब और आगे पढ़िए महर्षि याज्ञवल्क्य और अधिक स्पष्ट करते हैं।
“और जो यह हृदय के भीतर लाल पिंड है यह इन दोनों का अन्न है। और जो हृदय के भीतर यह जाली सी है वह इन दोनों का वस्त्र है। और जो यह हृदय से ऊपर नाडी गई है यह इन दोनों का गतिमार्ग है ।जैसे एक बाल मोटाई में से हजार टुकडे किया हुआ ऐसी सूक्ष्म इसकी ‘हिता ‘नामक नाड़ियां हृदय में स्थित है। निश्चित रूप से इन्हीं से वह बहता हुआ सारे शरीर में बहता है। इसलिए यह सूक्ष्म शरीर इस शरीरात्मा (स्थूल शरीर) से अधिक शुद्ध आहार वाला सा होता है”
हृदय से निकलने वाली और हमारा (अर्थात आत्मा का) हित करने वाली नाड़ियां को हिता नाम की नाडी कहा गया है।
अर्थात जागृत अवस्था में जीव का स्थान दाई आंख बतलाया जाता है ।और उसे वैश्वानर कहा जाता है,जिसको इंध कहा गया है।
जीव का स्थान जागृतअवस्था में आंख इसलिए माना गया है कि जागृत अवस्था का ज्ञान मनुष्यों को आंख के द्वारा ही हुआ करता है ।यह अवस्था अधिकतर इंद्रियों के काम करने की अवस्था है। इसमें सभी इंद्रियां अपना-अपना काम करती रहती है ।इंद्रियों को मर्यादा में रखने ही से यह अवस्था उपासक को आत्मा की ओर ले जाने का कारण बना करती है।

इसके बाद सपन अवस्था में देखते हैं क्या स्थिति है आत्मा की?

सपना अवस्था में और जागृत अवस्था में श्रेणी का नहीं अपितु केवल स्थिति का भेद हुआ करता है ।जागृत में दोनों प्रकार की इंद्रियां बाह्य और अंतःकरण काम करते हैं परंतु स्वप्न में केवल एक प्रकार की अतः इंद्रियां अपना काम जारी रखती हैं। इसलिए इस अवस्था में भी आत्मा अर्थात जीव का स्थान आंख ही रहता है। जीव शरीर में सूक्ष्म शरीर के साथ रहता है ।इसलिए बाई आंख में इस सूक्ष्म शरीर को विराट अर्थात चमकने वाला कहकर उसे इंद्र रूपी जीव की पत्नी कहा गया है। पति और पत्नी का अटूट संबंध हुआ करता है ।और जीवात्मा और सूक्ष्म शरीर का भी मोक्ष होने तक अटूट संबंध ही रहा करता है। इसलिए सूक्ष्म शरीर को जीव की पत्नी (अर्थात उस पर आश्रित रहने वाली) कहा है। सीधी आंख में रहने वाले जीव को प्रकाश में इंद्र कहा गया है तो चेतना के प्रकाश से प्रकाशित बाई आंख में रहने वाले को (अर्थात सूक्ष्म शरीर को) विराट कहा गया है।
आलंकारिक वर्णन में उस एकांत हृदय आकाश को संस्ताव कहा गया है जहां जीवात्मा सूक्ष्म शरीर के साथ पति और पत्नी के रूप में रहता है।
अब स्पष्ट करो कि संस्ताव किसे कहते हैं?
यज्ञ के उस स्थान को कहते हैं जहां बैठकर ऋत्विज ईश्वर स्तुति किया करते हैं।
लोहित पिंड भोजन के अत्यंत सूक्ष्म अंश को जो हृदय में रहता है और जिससे सूक्ष्म शरीर पुष्ट होता है उसी को यहां इन दोनों पति-पत्नी का अन्न कहा गया है।
तथा हृदय में पाई जाने वाली जाली को पति-पत्नी की चादर बताया गया।
हृदय से ऊपर को जो नाडी चलती है वह इन दोनों के चलने का मार्ग बतलाया गया है।
अति सूक्ष्म नाड़ियां जो शरीर में फैली हुई है उन्हीं को हिता नाम की नाडी कहा जाता है। इनके द्वारा भोजन का अत्यंत सूक्ष्म और शुद्ध अंश रूप में सारे शरीर में बहता रहता है। और सूक्ष्म शरीर की पुष्टि इसी रस‌ से हुआ करती है। और इसीलिए उसे अधिक शुद्धाहारी कहा गया है। क्योंकि यह रस मल आदि से रहित होता है।
सुषुप्त अवस्था
सूक्ष्म शरीर में से इस अवस्था में प्राण के सिवा और कोई उसका अवयव काम नहीं करता। मन और इंद्रियां आदि सभी के काम बंद रहते हैं।
और अंतिम अवस्था तुरिया अवस्था है जिसको चौथी अवस्था कह सकते हैं। यह क्या होती है?
महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को इस अवस्था के बारे में निम्न प्रकार बताया ।
तुरीय अवस्था।
इस अवस्था में आत्मा के बाहरी काम सभी बंद हुआ करते हैं। केवल उसके आंतरिक कार्य जारी रहा करते हैं।इसलिए बाह्य कार्यों की दृष्टि से उसे ‘नेति नेति’ कहा जाता है ।और उसके वे ही गुण प्रकट किए जाते हैं जो प्रकार की दृष्टि से निषेध परक होते हैं। इसलिए आत्मा को यहां ‘नेति नेति ‘के सिवा अग्रह्य (जो पकड़ा ना जा सके) अशीर्य (जो अक्षय है जिसका क्षीण नहीं होता)असंग(कीसी में आसक्ति नहीं ,किसी के साथ नहीं रहना )और असित (जो बंधन रहित है,ना दुखी होता ना नष्ट होता) कहा गया है। यह सारी शिक्षा जो महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक को दी है ,प्रकट करती है कि संसार में निर्भीकता प्राप्त करने अथवा परलोक को उज्जवल बनाने अथवा ईश्वर तक पहुंचने के लिए आवश्यक है कि उपासक बाहर से भीतर की ओर चले और इतना घूसे कि आत्मा से बाहर का जगत उस पर अपना कोई प्रभाव ना डाल सके। इसी अवस्था को योग दर्शन में चित्त की मृत्यु के निरुद्धावस्था कहा गया है। तथा राजा जनक को आत्म तत्व वेत्ता होने तक की शिक्षा महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रदान की थी।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट।
ग्रेटर नोएडा,।
चलभाष,
9811 838317
7827 681439

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betbox giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
Betgar güncel
Betgar giriş
Betgar giriş adresi
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
nitrobahis giriş
noktabet giriş
betvole giriş
betvole giriş
betkolik güncel giriş
betkolik güncel
betkolik giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betnano giriş
romabet giriş
yakabet giriş
queenbet giriş
queenbet giriş
betnano giriş
winxbet giriş
betamiral giriş
livebahis giriş
grandpashabet giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betkare giriş
kareasbet giriş
noktabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
nisanbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
livebahis giriş
livebahis giriş
nisanbet giriş
nisanbet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betpark giriş