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ओ३म् -23वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि- “वैदिक सिद्धान्तों के प्रभावशाली प्रचारक थे कीर्तिशेष प्रा. अनूप सिंह”

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दिनांक 21 जून, 2024 को कीर्तिशेष आर्यविद्वान श्री अनूप सिंह जी की 22वीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर हम उनको सादर नमन करते हैं। हम उनके ऋणी हैं। उनके व्यक्तित्व से हम प्रभावित हुए थे। हमारा आर्यसमाज की सदस्यता ग्रहण करने का कारण जहां ऋषि दयानन्द जी का महान् व्यक्तित्व व वैदिक धर्म के सत्य सिद्धान्त थे, वहीं हम पर श्री अनूप सिंह जी का प्रभाव भी पड़ा था। हम आर्यसमाज मन्दिर व संस्था तक अपने एक पड़ोसी सहपाठी मित्र श्री धर्मपाल सिंह जी के द्वारा ले जाये गये थे। वह हमें प्रत्येक रविवार को अपने साथ सत्संग में ले जाते थे। हमने कुछ ही महीनों में वहां अनेक विद्वानों को सुना तथा वहां आर्य भजनोपदेशकों के भजनों व गीतों से भी प्रभावित हुए थे। प्रत्येक रविवार को आर्यसमाज में होने वाले यज्ञ में भी हम भाग लेते थे। हमने पुस्तकों के माध्यम से यज्ञ व इसके लाभों को जाना था। उन दिनों व आज भी हम आर्यसमाज के समान महान उद्देश्यों से युक्त देश व समाज का हित व कल्याण करने वाली दूसरी कोई संस्था नहीं देखते। अतः सत्यार्थप्रकाश एवं कुछ अन्य वैदिक साहित्य के अध्ययन, आर्यसमाज के विद्वानों व सदस्यों के चमत्कारी व्यक्तित्व व प्रभाव सहित श्री अनूप सिंह जी तथा श्री धर्मपाल सिंह जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हम आर्यसमाजी बने थे।

आर्यसमाज ईश्वर के सत्यस्वरूप को मानता है जो कि सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, अनादि, नित्य, न्यायकारी तथा जीवों को कर्मानुसार जन्म देने वाला तथा सृष्टिकर्ता है। उसी को जानकर उपासना करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं और आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। आर्यसमाज त्रैतवाद के सिद्धान्त को मानता व उसका प्रचार करता है। यही सिद्धान्त वस्तुतः सत्य एवं यथार्थ है। आर्यसमाज की मान्यता है कि ईश्वर ने आज से 1.96 अरब वर्ष पूर्व सृष्टि को उत्पन्न कर वनस्पतियों सहित मानव को जन्म दिया था। मानव को युवावस्था में अमैथुनी सृष्टि में जन्म देकर चार वेदों का ज्ञान चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को उनकी आत्माओं में अन्तःप्रेरणा द्वारा दिया था। इसका सविस्तार वर्णन सत्यार्थप्रकाश में देखा जा सकता है। ऋषि दयानन्द द्वारा सत्यार्थप्रकाश में दिया गया वेदों के आविर्भाव का विवरण तर्क एवं प्रमाणों से युक्त है। उनकी मान्यता है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। यही वैदिक परम्परा भी है और सभी ऋषि मुनि व सनातनी विद्वान भी इसे मानते हैं। वेद में कहानी किस्से, ज्ञान विज्ञान विरुद्ध कोई बात तथा अविश्वसीय कथायें आदि नही है। मनुष्य का सम्पूर्ण विकास वेदज्ञान से होता है और मनुष्य को वेदों से ही ईश्वर व आत्मा सहित प्रकृति व सृष्टि का सत्य स्वरूप भी विदित होता है। वेद मनुष्य जीवन को मोक्ष प्राप्ति का द्वार बताते हैं जो कि सत्य ही है। इसी कारण से ऋषि पंतजंलि ने योगदर्शन लिखकर मनुष्य को अष्टांग योग द्वारा समाधि को प्राप्त कर ईश्वर के साक्षात्कार करने का सत्य विज्ञान व दर्शन दिया है। ऋषि दयानन्द भी योगदर्शन को वेदानुकूल एवं मान्य आर्ष ग्रन्थों में सम्मिलित व परिगणित करते थे।

हमने आर्यसमाज का सदस्य बन कल आचार्य अनूपसिंह जी के पूरे जीवनकाल में उनका सान्निध्य प्राप्त किया। उनकी संगति से ही हमें स्वाध्याय एवं लेखन की प्रेरणा मिली थी। उनके साथ हम दिल्ली, लखनऊ, हरिद्वार, मसूरी आदि अनेक स्थानों पर भी गये थे। हमने अपने जीवन में उनके दर्जनों प्रवचनों को सुना था और उनसे गहराई से प्रभावित हुए थे। उन्होंने न केवल देहरादून आर्यसमाज व अन्य अनेक धार्मिक संस्थाओं में धर्म प्रवचन किये थे अपितु वह देश के अनेक आर्यसमाजों के उत्सवों व अन्य अवसरों पर भी वेद प्रचार वा उपदेशार्थ जाते थे। आचार्य प्रा. अनूप सिंह जी गोमाता के रक्षक एवं प्रेमी थे। उनके द्वारा साप्ताहिक पत्र ‘अनूप सन्देश’ प्रकाशित होता था। ऋषिभक्त अनूपसिंह जी अपने पत्र के प्रत्येक अंक में किसी क्रान्तिकारी देशभक्त के त्यागमय जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करते रहते थे। क्रान्तिकारियों के जीवन पर हमने उनके झकझोर कर देने वा रोमांचित कर देने वाले व्याख्यानों को भी अनेक बार सुना है। उन्होंने गोरक्षा के महत्व पर हमसे एक लेख लिखवाकर ‘अनूपसन्देश’ में प्रकाशित किया था। वह लेख हमारे जीवन का आरम्भिक लेख था। आचार्य अनूपसिंह जी को प्रायः सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों एवं बलिदानियों के त्याग व बलिदान की जानकारी थी। वह उन क्रान्तिकारियों के जीवनों पर व्याख्यान दिया करते थे। वह पत्रकार एवं प्रतिष्ठित लेखक थे। उनकी एक पुस्तक बाइबिल के गपोड़े भी प्रकाशित हुई थी। वीर विनयायक सावरकर के वह अनन्य भक्त थे। उनकी प्रेरणा से हमने सावरकर जी की दो कृतियां ‘मोपला विद्रोह’ एवं ‘गोमांतक’ पढ़ी थी। उसके बाद हमने वीर सरकार जी की अनेक पुस्तकें पढ़ी जिसमें ‘भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857’ भी सम्मिलित थी। उनकी प्रेरणा से ही हमने वैद्य गुरुदत्त जी की भी उनके पुस्तकें एवं उपन्यास पढ़े जो वैदिक धर्म के समर्थन एवं देशभक्ति एवं देशोन्नति से ओतप्रोत हैं। वैदिक धर्म एवं योग के प्रा. अनूपसिंह जी अनन्य प्रेमी थे। योग के विख्यात आचार्य एवं समाधि सिद्ध योगाचार्य स्वामी योगानन्द सरस्वती उनके गुरु व मित्र थे। प्रा. अनूप सिंह जी ने वर्षों तक उनका सान्निध्य प्राप्त किया था। आर्यसमाज के उच्च कोटि के संन्यासी महात्मा आनन्दस्वामी जी के योग गुरु भी स्वामी योगानन्द सरस्वती जी ही थे। स्वामी योगेश्वरानन्द जी का योग-आश्रम ऋषिकेश में योग-निकेतन के नाम से आज भी कार्यरत है। यदि आचार्य अनूप सिंह जी कुछ वर्ष और जीवित रहते तो वैदिक धर्म के प्रचार द्वारा समाज की और अधिक सेवा करते। दिनांक 21 जून, 2024 को उनकी तेइसवीं पुण्यतिथि पर हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।

हमने उनके जीवन से प्रेरणा लेकर वैदिक विषयों पर लेखन कार्य को अपनाया व अब भी जो कुछ बन पा रहा है, लेखन का कार्य कर रहे हैं। ईश्वर से हम प्रार्थना करते हैं कि प्रा. अनूपसिंह जी जैसे उत्साही वैदिक धर्मप्रेमी एवं युवा विद्वान हमारे देश व समाज को प्रदान करें जो अपनी वैदिक ज्ञान में उच्च कोटि की योग्यता एवं कार्यों से वैदिकधर्म का आचरण व प्रचार करते हुए ऋषि दयानन्द के कार्यों को आगे बढ़ायें एवं कृण्वन्तों विश्वर्मायम् के लक्ष्य को सिद्ध करने में सहायक हों। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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