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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

कांग्रेस की राजनीति और देश का मतदाता

हमारे देश में यदि संविधान की मौलिक अवधारणा ,चिंतन और उसके मर्म को समझकर काम करने की रणनीति पर विचार किया जाता तो देश से जाति, धर्म और लिंग के आधार पर प्रत्येक प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में काम किया जाता । इतना ही नहीं, इन उद्वेगकारी मनोवृतियों को भी समाप्त करने का प्रयास किया जाता, परंतु आरक्षण और जाति प्रेरित राजनीति को सरकारों ने देश में प्राथमिकता दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि जाति, धर्म और लिंग की दीवारें ऊंची होती चली गईं। आज राहुल गांधी जाति के आधार पर जनगणना कराने की मांग उन लोगों के साथ मिलकर करते देखे जाते हैं जो भारतीय संविधान की इस मौलिक अवधारणा का उपहास करने की राजनीति करते रहे हैं। स्पष्ट है कि यदि देश में जाति आधारित जनगणना की बात एक बार मान ली गई तो इससे देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज दुर्बल होगा। राहुल राहुल गांधी सत्ता स्वार्थ को साधने के लिए भारत के भविष्य को इस समय पूर्णतया उपेक्षित कर रहे हैं। जाति आधारित जनगणना भारत में सामाजिक विसंगतियों और विषमताओं को और अधिक विस्तार देगी। जिससे सामाजिक ताना-बाना खंड-खंड होकर रह जाएगा और देश विरोधी शक्तियां देश को तोड़ने के प्रयास में आज नहीं तो कल सफल हो जाएंगी। देश का बहुसंख्यक सनातन समाज इस बात को गहराई से समझ रहा है। यही कारण है कि चुनाव के दौरान राहुल गांधी की जाति आधारित जनगणना की बात को लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया है।

कांग्रेस की परंपरागत सोच और राहुल गांधी

कांग्रेस की परंपरागत सोच पर काम करते हुए राहुल गांधी ने भारत को कभी भारत के दृष्टिकोण से समझने का प्रयास नहीं किया है। उन्होंने भारत को उन भ्रांतियों, मिथकों और दोगली बातों या विचारधारा के आधार पर समझने का प्रयास किया है, जो भारत को भारत नहीं, इंडिया बनाती हैं। निश्चित रूप से राहुल गांधी इंडिया के बारे में तो बेहतर जानते हैं, पर वह भारत की आत्मा के साथ कभी सहकार स्थापित कर बोलने की क्षमता प्राप्त नहीं कर पाए। यही उनके व्यक्तित्व और चरित्र का सबसे दुर्बल पक्ष है। हम सभी जानते हैं कि इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए जब कम्युनिस्टों का साथ लिया था तो उनकी विचारधारा को भी उन्होंने भारत की राजनीति में प्रवेश देने का निर्णय ले लिया। अपनी नीतियों को भारतीय शासन और शिक्षा में लागू करवाकर कम्युनिस्टों ने कांग्रेस को तत्कालीन परिस्थितियों में दिए गए अपने राजनीतिक समर्थन का बहुत बड़ी मूल्य देश से लिया था। जिसे कांग्रेस ने सत्ता में बने रहने के लिए बड़ी सहजता से सहन कर लिया था। इतना ही नहीं, इस पार्टी ने अपनी विचारधारा के साथ समझौता करके कम्युनिस्टों के तथाकथित समाजवाद को भारत में लागू करने का अतार्किक प्रयास किया। यद्यपि हम सभी जानते हैं कि कांग्रेस ने जिस प्रकार विदेशी विचारधारा अर्थात कम्युनिस्ट समाजवाद को अपनाया उससे देश में बेकारी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला।
 इसका कारण यह था कि गरीबी हटाने और समानता लाने की दृष्टि से प्रेरित होकर कांग्रेस की इंदिरा सरकार ने 97.7% तक आयकर लगाया था। इससे बचने के लिए उद्योगपतियों ने कालाधन और तहबाजारी को बढ़ावा दिया।
आजकल राहुल गांधी केंद्र की मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की कटु आलोचना करते हैं पर कभी यह नहीं बताते कि उनके परिवार के शासन काल में अपनाई गई आर्थिक नीतियों के क्या परिणाम निकले ? और उन परिणामों से उन्होंने व उनकी पार्टी ने क्या शिक्षा प्राप्त की है? यद्यपि वह भली प्रकार जानते हैं कि उनके परिवार के द्वारा जिन आर्थिक नीतियों का पालन किया जा रहा था, उनके चलते देश की अर्थव्यवस्था रुक-रुक कर सांस लेने लगी थी। जबकि उस लीक से हटकर जब मोदी सरकार ने दूसरी लीक बनाकर आर्थिक नीतियों को पंख लगाए तो आज देश अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अपने एक महत्वपूर्ण मुकाम को प्राप्त कर चुका है। राहुल गांधी के पिता के नाना अर्थात देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की आर्थिक नीतियों के साथ-साथ अन्य नीतियों को भी विदेशी मानसिकता और राजनीतिक कार्य प्रणाली से उधार लेकर हमारे देश में लागू करने का काम किया था। यह दु:ख का विषय है कि राहुल गांधी पंडित नेहरू की उन नीतियों के कटुफल सामने आने के उपरांत भी उनसे शिक्षा लेने को तैयार नहीं हैं। वह स्वयं भी उन नीतियां का समर्थन कर रहे हैं जिनके परिणाम देश ने घातक रूप से भुगते हैं। 
क्या राहुल गांधी देश को चुनाव के इस दौर में यह बताने का कष्ट करेंगे कि उन्होंने या उनकी पार्टी की सरकार ने देश के संविधान में समान नागरिक संहिता का उल्लेख होने के उपरांत भी उसे लागू क्यों नहीं किया ? क्या वह बता सकेंगे कि भारतीय शिक्षा प्रणाली में वेद की मानवतावादी सोच और चिंतन को उनकी पार्टी की सरकारों ने क्यों नहीं स्थापित किया ? क्या वह बता सकेंगे कि भारत के ऋषियों और श्री राम व श्री कृष्ण जैसे महापुरुषों को भारतीय शिक्षा पाठ्यक्रम में क्यों नहीं स्थान दिया गया? चुनाव के इस दौर में राहुल गांधी को देश की जनता को यह भी बताना चाहिए कि वह भारत को भारत अर्थात एक राष्ट्र के रूप में क्यों नहीं मानते और क्यों वह भारत को राज्यों का समूह अर्थात विभिन्न राष्ट्रीयताओं का समूह मानते हैं? उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वह भारत की सनातन संस्कृति के विरोध में क्यों बोलते हैं ? भारत के सनातन मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा क्यों नहीं है और क्यों वह भारत के सनातन मूल्यों को भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का समर्थन नहीं करते ?

लोगों की राहुल के प्रति सोच

इस समय देश के मतदाताओं की कांग्रेस के नेता राहुल गांधी से इस बात पर निरंतर सहमति बनी रही है कि वह देशहितों से अलग जाकर चीन के प्रति नरमी दिखा रहे हैं और बार-बार यह कह रहे हैं कि चीन के प्रति भारत की मोदी सरकार की नीतियां देश विरोधी हैं। लोगों को राहुल गांधी का चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के प्रति नरम दृष्टिकोण की रास नहीं आया है।

राहुल गांधी को लेकर लोगों के मन में निरंतर यह प्रश्न उभरता रहा है कि उन्हें सीएए में ऐसी कौन सी कमी दिखाई देती है, जिससे वह भारत के मुसलमान के लिए घातक हो सकता है ? संसार में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए कांग्रेस ने कभी यह आवश्यक नहीं समझा कि वह रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ विश्व को भी हथियारों की आपूर्ति करने की क्षमता प्राप्त कर ले । देश के मतदाताओं ने कांग्रेस को निरंतर तीसरी बार सत्ता से दूर रखकर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने शासनकाल में इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश भारत के लिए सुरक्षा हथियार बाहर के देशों से ही मंगाकर गलती करती रही। लोगों ने कांग्रेस को समझाया है कि उसकी इस प्रकार की नीति का एकमात्र कारण कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार ही था। उसने देश की क्षमताओं और बौद्धिक प्रतिभा पर विश्वास नहीं किया ?
आज जब इन सभी क्षेत्रों में सफलता की नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है तो कांग्रेस को आत्मनिरीक्षण अवश्य करना चाहिए। एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभाते हुए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी देश के मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना चाहिए था कि जिन नये कीर्तिमानों को देश इस समय गढ़ रहा है उन्हें वह और भी ऊंचाई तक पहुंचाने का काम करेंगे। राहुल गांधी ने इसके विपरीत नकारात्मक राजनीति को अपनाया उसी का परिणाम रहा कि 4 जून को जब चुनाव परिणाम आए तो लोगों ने उनकी नकारात्मक राजनीति को ही नकार दिया।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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