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भारतीय संस्कृति

*जैन पंथ समीक्षा* 2

डॉ डी के गर्ग

ये लेख छ भाग में है ,कृपया अपने विचार बताए और शेयर करे।
भाग -2

जैन पंथ में णमोकार मंत्र-

विश्लेषण:-
1 णमोकार मंत्र कब और किसने लिखा? किस धर्म ग्रन्थ से लिया गया है? इसका कोई उत्तर नहीं है,और ये भी स्पष्ट है कि ये मंत्र जैन धर्म के संस्थापक या किसी विद्वान ने नहीं दिया।ये बाद में अचानक जोड़ दिया ।कहते है कि “पाले” महाराष्ट्र की सबसे प्राचीन जैन गुफा है, जिसका समय ईसा से 200 सदी पूर्व का माना जाता है |यहाँ पर ब्राह्मी लिपि में णमोकार मंत्र लिखा हुआ है | ये भी कहा जाता है की 162 ईसापूर्व में हाथीगुम्फा अभिलेख में णमोकार मंत्र एवं जैन राजा खारबेळा का उल्लेख है।
स्पष्ट है की ये मन्त्र शाश्त्रोक्त नहीं है और ना ही किसी ऋषि द्वारा लिखा गया है। णमोकार मंत्र को महामंत्र के रूप में मान्यता किसने दी ,इसका भी उत्तर नहीं है केवल मुक्ति के लालच में एक अंधविश्वास चल रहा है।
णमोकार मंत्र का अर्थ जैन धर्म अनुयाई जो बताते है वह इस प्रकार है — :
णमो अरहंताणं -अरिहंतों को नमस्कार हो।
णमो सिद्धाणं -सिद्धों को नमस्कार हो।
णमो आइरियाणं -आचार्यों को नमस्कार हो।
णमो उवज्झायाणं – उपाध्यायों को नमस्कार हो।
णमो लोए सव्व साहूणं – इस लोक के सभी साधुओं को नमस्कार हो।
एसो पंच णमोक्कारो – यह पाँच परमेष्ठी अति सम्माननीय है ।
यह पाँच परमेष्ठी कौन है जिनको नमस्कार करने मात्र से मुक्ति मिलेगी और पाप नष्ट हो जाएंगे?
जैन धर्म के अनुसार मंत्र का अर्थ :
१ जैन धर्म में पांच अरिहंत – जिन्होंने चार शत्रु कर्मों को नष्ट कर दिया है – ‘नमो अरिहंताणं । ‘
२ सिद्ध – वे व्यक्ति जिन्होंने “सिद्धि” प्राप्त कर ली है,जैन धर्म में सिद्ध शब्द यानी मुक्त आत्मा, जिन्होंने अपने सारे कर्मो का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया है उन्हें संबोधित करने के लिए किया जाता हैं।
३ आचार्य – वे शिक्षक जो आचरण करना / जीवन जीना सिखाते हैं
४ उपाध्याय – कम उन्नत तपस्वियों के गुरु
५ साधु -संसार में सम्यक चारित्र (सही आचरण) का पालन करने वाले भिक्षु या ऋषि
जैन धर्म के विद्वान कहते है कि इन पांचों परम आत्माओं को नमन करने से उसके सभी कर्म नष्ट हो सकते हैं और प्रत्येक जीव की भलाई की कामना साधक अंत में कहता है कि यह मंत्र सबसे शुभ है।

ध्यान रहे कि इस नमस्कार में किसी देव यानी देवताओं जैसे भूमि, वायु ,जल ,पृथ्वी आदि और किसी विशिष्ट व्यक्ति महापुरुष जैसे श्री कृष्ण ,राम, चरक ,वेद व्यास ,परशुराम , पतंजलि आदि के नाम का उल्लेख नहीं है।

विस्तार से विश्लेषण :
१ पहला प्रश्न है की इसको मंत्र के रूप में स्वीकार करना चाहिए ? –
उत्तर है -नहीं ,णमोकार मंत्र केवल एक अभिवादन है ,वह भी उनके लिए जिनका कोई अता-पता नहीं है। सिर्फ अपनी भावना व्यक्त करना है।
मन्त्र किसे कहते है ?

मननात त्रायते इति मन्त्रः
मंत्र वह है, जिससे आप जन्म और मृत्यु के चक्र से तर जाते हैं । पुनरावृत्त विचार ही चिंता है। मंत्र आपको अपनी चिंताओं से मुक्त करने में मदद करते हैं। कई बार हमें आश्चर्य होता है कि हम मन्त्रों का अर्थ समझे बिना कुछ ध्वनियों का जप क्यों करते हैं? क्या हमारी समझ से परे कुछ हमारी सहायता कर सकता है?
हर मंत्र का अर्थ अनंत है। मन्त्र ध्वनि, मन के ज्ञान से परे एक कंपन है। जब मन अनुभूति करने में असमर्थ होता है तो वह बस विलीन हो जाता है और ध्यानस्थ अवस्था में चला जाता है।
इस विषय में स्वयं जैन समाज का कहना है की इस मंत्र द्वारा जैन तीर्थंकरों या संन्यासियों से कोई अनुग्रह या भौतिक लाभ या दुरित से सद्मार्ग पर चलने की कामना नहीं की गई है। यह मंत्र केवल उन प्राणियों के प्रति गहरे सम्मान के संकेत के रूप में कार्य करता है जिनके बारे में उनका मानना है कि वे आध्यात्मिक रूप से विकसित हैं, साथ ही ऐसे लोगों को आदर्श का प्रतीक मानकर उनके द्वारा प्राप्त किए गए अंतिम लक्ष्य यानी मोक्ष (मुक्ति) की याद दिलाता है।

२ जैन समाज मंत्र के अर्थ स्वरूप नमस्कार शब्द का प्रयोग करता आया है ,इसलिए नमस्ते और नमस्कार का भावार्थ और अंतर् भी समझना जरुरी है–
प्रायः लोग नमस्ते और नमस्कार को एक समान अर्थ वाला मानते हैं पर संस्कृत भाषा में दोनों का प्रयोग अलग-अलग रूपों में होता है ।
नमस्ते से भाव है — नमः तुभ्यं अर्थात् आपके लिए नमन या अभिवादन है । झुकना हमारी संस्कृति की विशेषता है अत्यधिक आदर — सम्मान प्रकट करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है ।
नमस्कार में नमः के साथ कार लगा होने से यह क्रिया पद को बतलाता है । प्रायः बेजान वस्तुओं के लिए इसका प्रयोग किया जाता है जैसे सूर्य नमस्कार , चंद्र नमस्कार , सागर नमस्कार । इसलिए नमस्ते और नमस्कार में से नमस्ते शब्द अधिक सार्थक है ।इस आलोक में जड़ पदार्थो को नमस्ते या नमस्कार करना कहा तक उचित है ?
किसी जड़ पदार्थ को केवल नमस्ते या नमस्कार करने के कैसे मुक्ति मिल सकती है ? ये अंधविस्वास नहीं तो और क्या है ? नमस्ते हमारा प्राचीनतम अभिवादन है जो कि अपने से बड़ो को किया जाना चाहिए ,वे इसके बदले में आशीर्वाद देते है और इसका लाभ वैदिक साहित्य में बताया गया है। मनुस्मृति में लिखा है —
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम।।
हिंदी अर्थ – जो व्यक्ति सुशील और विनम्र होते हैं, बड़ों का अभिवादन व सम्मान करने वाले होते हैं तथा अपने बुजुर्गों की सेवा करने वाले होते हैं। उनकी आयु, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों में वृद्धि होती है।
प्रचलित अन्य मान्यताओं का विश्लेषण :
किसी भी अंधविस्वास या मान्यता के पीछे कुछ ना कुछ कुतर्क जोड़ दिए जाते है ,क्योकि ये माना जाता है की मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है जो बिना कर्म के मुक्ति के लिए भटकता रहता है और विवेक शुन्य होकर भेड़ चाल में शामिल हो जाता है। शायद इसी वजह से बाइबल में मनुष्य को भेड़ की संज्ञा दी है। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है की इस नमस्कार को बार बार बोलने से पाप नाश हुए हो ,या ना बोलने से नरक में गया हो। अथवा कोई पशु णमोकार मंत्र सुनने से सद्गति प्राप्त हो जाये ,और इसको रामायण से भी जोड़ कर अंधविस्वास और फैला दिया ,किसी भी पढ़े लिखे ने ये कोशिश नहीं की कि रामायण में ये एक बार मिलान तो कर ले। स्वयं को पढ़े लिखे और विद्वान होने का दावा करने वाले जैन समाज को ये सिद्ध करना चाहिए कि किस तरह इस अभिवादन मंत्र का प्रभाव होता है।

णमोकार मंत्र का वास्तविक भावार्थ क्या हो सकता है ,जिस पर जैन समाज को चिंतन करने की जरूरत है?

इस नमस्कार मंत्र के भावार्थ में ही इसकी वास्तविकता और एक गूढ़ सन्देश छिपा है ,जिसको समझना चाहिए ,ना की रट्टा लगाना और इसके जाप करने से मुक्ति नहीं मिलेगी , इसके पीछे छिपे सूत्र /सन्देश का अनुकरण करना जरुरी है।
१ पहला नमस्कार सूत्र — ‘नमो अरिहंताणं । ‘अरी का अर्थ है शत्रु और ‘हन्ताणं’ का अर्थ है जीतना। जिसने क्रोध, मान, कपट, लोभ, राग और द्वेष के सभी आंतरिक शत्रुओं पर विजय पा ली है।परन्तु मनु ने धर्म के १० नियम बताये है ,किसी एक को छोड़ना अधर्म के श्रेणी में आता है। इसलिए ये अधूरा है। धर्म के दस लक्षण हैं – धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, स्वच्छता, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध)।
२ सिद्ध – वे व्यक्ति जिन्होंने “सिद्धि” प्राप्त कर ली है।जैन धर्म में सिद्ध शब्द यानी मुक्त आत्मा, जिन्होंने अपने सारे कर्मो का नाश कर मोक्ष प्राप्त किया है उन्हें संबोधित करने के लिए किया जाता हैं और मुक्ति के लिए अष्टांग योग आवश्यक है। पतंजलि के योग सूत्र में योग के 8 अंगों का उल्लेख है, जिनमें से प्रत्येक सार्थक और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करता है। उन्होंने आठ अंगों को यम (संयम), नियम (पालन), आसन (मुद्रा), प्राणायाम (सांस लेना), प्रत्याहार (वापसी), धारणा (एकाग्रता), ध्यान (ध्यान) और समाधि (अवशोषण) के रूप में परिभाषित किया।
३ आचार्य – वे शिक्षक जो आचरण करना / जीवन जीना सिखाते हैं। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में आचार्य को परिभाषित किया है –(चर गतिभक्षणयोः) आङ्पूर्वक इस धातु से ‘आचार्य्य’ शब्द सिद्ध होता है। ‘य आचारं ग्राहयति, सर्वा विद्या बोधयति स आचार्य ईश्वरः’ जो सत्य आचार का ग्रहण करानेहारा और सब विद्याओं की प्राप्ति का हेतु होके, सब विद्या प्राप्त कराता है, इससे परमेश्वर का नाम ‘आचार्य’ है।
४ उपाध्याय – उपाध्याय” (संस्कृत – उप + अधि + इण घं‌) इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- ‘उपेत्य अधीयते अस्मात्‌’ जिसके पास जाकर अध्ययन किया जाए,वह उपाध्याय कहलाता है। वैदिक काल से ही गुरुकुल के शिक्षकों को उपाध्याय कहा जाता था।
५ साधु -संसार में सम्यक चारित्र (सही आचरण) का पालन करने वाले भिक्षु या ऋषि–‘सन्तीति सन्तस्तेषु सत्सु साधु तत्सत्यम्। यज्जानाति चराऽचरं जगत्तज्ज्ञानम्। न विद्यतेऽन्तोऽवधिर्मर्यादा यस्य तदनन्तम्। सर्वेभ्यो बृहत्त्वाद् ब्रह्म’ जो पदार्थ हों, उनको सत् कहते हैं, उनमें साधु होने से परमेश्वर का नाम ‘सत्य’ है।
मित्रो , मनुष्य का जन्म बार बार नहीं मिलता ,हमेशा अन्धकार से दूर रहे , सत्य को समझने का प्रयास करें। अपनी बुद्धिमता का सदुपयोग करना आवश्यक है। किसी की भावना को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करना /

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