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गौ और गोवंश

महात्मा गाँधी और गौरक्षा

#डॉविवेकआर्य
1947 के दौर की बात है। देश में विभाजन की चर्चा आम हो गई थी। स्पष्ट था कि विभाजन का आधार धर्म बनाम मज़हब था। भारतीय विधान परिषद के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद के पास देश भर से गौवध निषेध आज्ञा का प्रस्ताव पारित करने के लिए पत्र और तार आने लगे। महात्मा गाँधी ने 25 जुलाई की प्रार्थना सभा में इसी इस विषय पर बोलते हुए कहा-
“आज राजेंद्र बाबू ने मुझ को बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हज़ार पोस्ट कार्ड, 25-30 हज़ार पत्र और कई हज़ार तार आ गये हैं। इन में गौ हत्या बकानूनन बंद करने के लिये कहा गया है। आखिर इतने खत और तार क्यों आते हैं? इन का कोई असर तो हुआ ही नहीं है। हिंदुस्तान में गोहत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता। हिन्दुओं को गाय का वध करने की मनाही है इस में मुझे कोई शक नहीं हैं। मैंने गौ सेवा का व्रत बहुत पहले से ले रखा है। मगर जो मेरा धर्म है वही हिंदुस्तान में रहने वाले सब लोगों का भी हो यह कैसे हो सकता है? इस का मतलब तो जो लोग हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा। हम चीख-चीख कर कहते आये हैं कि जबरदस्ती से कोई धर्म नहीं चलाना चाहिये। जो आदमी अपने आप गोकशी रोकना चाहता उसके साथ में कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें? अगर हम धार्मिक आधार पर यहाँ गौहत्या रोक देते हैं और पाकिस्तान में इसका उलटा होता है तो क्या स्थिति रहेगी? मान लीजिये वे यह कहें कि तुम मूर्तिपूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह शरीयत के अनुसार वर्जित है। … इसलिए मैं तो यह कहूंगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बंद होना चाहिये। इतना पैसा इन पर बेकार फैंक देना मुनासिब नहीं है। मैं तो आपकी मार्फ़त सरे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बंद कर दें। ( हिंदुस्तान 26 जुलाई, 1947)”
“हिन्दू धर्म में गोवध करने की जो मनाई की गई है वह हिन्दुओं के लिए है सारी दुनियाँ के लिए नहीं। ( हिंदुस्तान 10 अगस्त 1947)”
” अगर आप मज़हब के आधार पर हिंदुस्तान में गो कशी बंद कराते हैं तो फिर पाकिस्तान की सरकार इसी आधार पर मूर्तिपूजा क्यों नहीं बंद करा सकती! (हरिजन सेवक 10 अगस्त 1947) ”
गाँधी जी के गौ वध निषेध सम्बंधित बयानों की समीक्षा आर्यसमाज के प्रसिद्द विद्वान पं धर्मदेव विद्यामार्तण्ड ने सार्वदेशिक पत्रिका के अगस्त 1947 के सम्पादकीय में इन शब्दों में की-
माहात्मा जी के उपर्युक्त वक्तव्य से हम नितांत असहमत हैं। प्रजा जिस बात को देशहित के लिए अत्यावश्यक समझती है क्या अपने मान्य नेताओं से पत्र, तार आदि द्वारा उस विषयक निवेदन करने का भी उसे अधिकार नहीं है? क्या देश के मान्य नेताओं का जिन के हाथों स्वतन्त्र भारत के शासन की बागडोर आई है यह कहना कि प्रजा द्वारा प्रेषित हज़ारों तारों और पत्रों का कोई प्रभाव तो हुआ ही नहीं सचमुच आस्चर्यजनक है। क्या प्रजा की माँग की ऐसी उपेक्षा करना देश के मान्य नेताओं को उचित है? हिंदुस्तान में गौहत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता। ऐसा महात्मा जी का कहना कैसे उचित हो सकता है? क्या विधान परिषद् की सारी शक्ति महात्माजी ने अपने हाथ में ले रक्खी है जो वे ऐसी घोषणा कर सकें? यह युक्ति देना कि ऐसा करने से हिन्दुओं के अतिरिक्त दूसरे लोगों पर जबर्दस्ती होगी सर्वथा अशुद्ध है। इसके आधार पर तो किसी भी विषय में कोई कानून नहीं बनना चाहिये क्योंकि बाल्यविवाह, अस्पृश्यता, मद्यपान निषेध, चोरी निषेध, व्यभिचार निषेध आदि विषयक किसी भी प्रकार के कानून बनाने से उन लोगों पर एक तरह से जबर्दस्ती होती है जो इन को मानने वा करने वाले हैं। जिस से समाज और देश को हानि पहुँचती है उसे कानून का आश्रय लेकर भी अवश्य बंद करना चाहिये। स्वयं महात्मा गांधीजी की अनुमति और समर्थन में गत वर्ष 11 फरवरी को वर्धा में जो गौरक्षा सम्मलेन हुआ था उसमें एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत किया गया था कि ‘इस सम्मेलन का निश्चित विचार है कि भारत के राष्ट्रीय धन के दृष्टीकौन से गौओं, बैलों और बछड़ों का वध अत्यंत हानिकारक है इसलिए यह सम्मेलन आवश्यक समझता है कि गौओं, बछड़ों और बैलों का वध कानून द्वारा तुरंत बंद कर दिया जाए। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि जो पूज्य महात्माजी गत वर्ष तक गोवध को कानून द्वारा बन्द कराने के प्रबल समर्थक थे वही अब कहें कि इस विषय में कानून नहीं बनाना चाहिए। गोवध निषेध और मूर्तिपूजा निषेध की कोई तुलना नहीं हो सकती। गोवध निषेध की मांग धार्मिक दृष्टि से नहीं किन्तु आर्थिक और संपत्ति से भी की जा रही है क्योंकि गोवध के कारण गोवंश का नाश होने से दूध घी आदि उपयोगी पौष्टिक वस्तुओं की कमी से हिन्दू, मुसलमान,ईसाई, सिख और सभी को हानि उठानी पड़ती है। बाबर, हुमायूँ, अकबर, शाह आलम आदि ने अपने राज्य में इसे बंद किया था। गोवध निषेध के समान कोई चीज पाकिस्तान सरकार कर सकती है तो वह सुअर के मांस के सेवन और बिक्री पर प्रतिबन्ध है। इससे कोई हानि न होगी यदि उसने ऐसा प्रतिबन्ध लगाना उचित समझा। गौवध निषेध विषयक प्रबल आंदोलन अवश्य जारी रखना चाहिए।
इस लेख से यही सिद्ध होता है कि गाँधी जी सदा हिन्दू हितों की अनदेखी करते रहे। खेद जनक बात यह है कि उनकी तुष्टिकरण उनके बाद की सरकारें भी ऐसे हो लागु करती रही। नेहरू जी की सरकार ने और 1966 में प्रबल आंदोलन के बाद इंदिरा गाँधी ने भी गोवध निषेध कानून लागु नहीं किया। मोदी जी को भी 6 वर्ष हो गए है। यह कानून कब लागु होगा? हिन्दुओं में एकता की कमी इस समस्या का मूल कारण है।

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