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महर्षि पतंजलि के पांच नियम

    कल हमने "सुख से जीने के उपाय" विषय के अंतर्गत महर्षि पतंजलि जी के बताए पांच 'यमों' की चर्चा की थी। पांच यम अर्थात 'सामाजिक कर्तव्य।'
    आज हम उनके बताए हुए पांच 'नियमों' की बात करेंगे। नियम अर्थात 'व्यक्तिगत कर्तव्य।' 

“1– शौच।” “इसका अर्थ है शुद्धि करना। शुद्धि दो प्रकार की है, एक बाह्य शुद्धि और दूसरी आंतरिक शुद्धि। शौच दातुन मंजन करना स्नान करना कपड़े धोना झाड़ू पोछा लगाना घर की सफाई करना मोटर गाड़ी चमकाना जूते चमकाना शाकाहारी सात्विक भोजन खाना मेहनत और ईमानदारी से धन कमाना आदि यह ‘बाह्य शुद्धि’ है। और मन में से राग द्वेष काम क्रोध लोभ ईर्ष्या अभिमान आदि दोषों को दूर करना मन की सफाई करना, यह ‘आंतरिक शुद्धि’ है।”
“2– संतोष।” “आप कोई भी एक लक्ष्य बनाएं। फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरा परिश्रम करें। पूरा परिश्रम करने पर जितना भी फल मिले, उतने में प्रसन्न रहें, लोभ न करें। शिकायत न करें कि “हमने इतनी मेहनत की, फिर भी फल बहुत कम मिला.” इस तरह से शिकायत नहीं करना। “बल्कि जितना मिला उसका लाभ लेना। उसका आनंद लेना, इसका नाम ‘संतोष’ है।” “यदि लक्ष्य प्राप्ति में कुछ कमी रही हो, तो अगली योजना में उसको पूरा करना. आलसी नहीं होना. फिर से पुरुषार्थ करना, इसका नाम संतोष है।” इसका पालन करने से व्यक्ति बहुत अधिक सुखी होता है, और वह हर परिस्थिति में सुखी रहता है।”
“3– तप।” “जीवन में सुख-दुख हानि लाभ मान अपमान ठंडी गर्मी भूख प्यास आदि परिस्थितियां आती रहती हैं। इनको प्रसन्नता से सहन करना ‘तप’ कहलाता है। जब यह परिस्थितियां जीवन में आती हैं, तब सहन तो करनी ही पड़ेंगी, चाहे प्रसन्नता से सहन करें, चाहे दुखी होकर। “यदि प्रसन्नता से सहन करेंगे, तो ‘तप’ कहलाएगा। और यदि दुखी होकर सहन करेंगे, तो ‘मजबूरी’ कहलाएगी।” इनको प्रसन्नता से सहन करना ही उत्तम है। इसी को तप कहते हैं। इससे व्यक्ति जीवन में कभी दुखी नहीं होता।”
“4– स्वाध्याय।” “जो हमें मोक्ष के बारे में बताते हैं, ऐसे दर्शन उपनिषद वेद आदि सत्य शास्त्रों का किसी योग्य वैदिक विद्वान गुरुजी से अध्ययन करना ‘स्वाध्याय’ कहलाता है। गुरु जी का लक्ष्य भी मोक्ष प्राप्ति हो, उनका आचरण भी मोक्ष प्राप्ति कराने वाला हो, ऐसे योग्य वैदिक विद्वान गुरुजी से इन शास्त्रों को पढ़ना चाहिए, और अपनी योग्यता बनाकर फिर दूसरों को पढ़ाना भी चाहिए।” “इसके साथ-साथ ओ३म् का जप, अथवा गायत्री मंत्र आदि वैदिक मंत्रों का जप करना चाहिए, इसका नाम स्वाध्याय है।”
“5– ईश्वर प्रणिधान।” “ईश्वर प्रणिधान अर्थात ईश्वर समर्पण करना चाहिए।” “प्रत्येक कार्य को करते समय ईश्वर से पूछ पूछ कर, ईश्वर को साक्षी मानकर, उस कार्य को करना चाहिए।” “इससे आपके सब बुरे काम छूट जाएंगे और सब अच्छे काम ही आप करेंगे। इससे आपकी बहुत अधिक उन्नति होगी। आप सदा अच्छे काम ही करेंगे, और ईश्वर आपको पूरा दिन अंदर से सुख देता रहेगा। इसको ‘ईश्वर समर्पण’ कहते हैं।”
“जो व्यक्ति अपने व्यवहार में इन यम और नियमों का पालन करेगा, उसका व्यवहार संसार में उत्तम होगा। वह स्वयं भी सुखी रहेगा और दूसरों को भी सुख देगा। आप भी पूरा प्रयास करें।”
—– “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।”

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