भारत की 18 लोकसभाओं के चुनाव और उनका संक्षिप्त इतिहास, भाग 12, 12वीं लोकसभा – 1998 – 1999

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छोटे नेताओं की छोटी हरकतों, छोटी सोच और संकीर्ण मानसिकता के कारण देश अभी भी अंधेरे में टक्कर मार रहा था। उसे नेता की खोज थी। पर नेता नहीं मिल रहा था। संक्रमण काल की रात्रि अभी और गहराती जा रही थी। अंधकार छंटने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसी परिस्थितियों में 16 फरवरी से 28 फरवरी 1998 के बीच तीन चरणों में 12 वीं लोकसभा के चुनाव संपन्न हुए। पर परिणाम वही रहा जो 1996 के लोकसभा के चुनाव के पश्चात देखने को मिला था। इस बार भी किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। लोगों ने खंडित जनादेश दिया। जिससे त्रिशंकु लोकसभा अस्तित्व में आई।

12वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम

  12वीं लोकसभा के चुनाव के समय कांग्रेस ने सारे देश में अपने कुल 477 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। भाजपा ने इस चुनाव में 388 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे थे। जब चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस को केवल 141 सीट ही प्राप्त हो सकीं , जबकि भाजपा 182 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल हुई। उसने पिछली लोकसभा की अपेक्षा अपनी कुछ और बढ़त बनाने में सफलता प्राप्त की। चुनाव परिणाम से पता चला कि समता पार्टी ने उस समय 12 सीट, भाकपा ने 9 सीट, माकपा ने 32 सीटें प्राप्त की। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपना अच्छा प्रदर्शन किया, जहां उसे 57 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई। भाजपा को अपने गठबंधन साथियों के साथ कुल मिलाकर 252 सीटों पर सफलता प्राप्त हो गई थी, जो कि बहुमत से अब थोड़ा ही पीछे थी। 

अटल जी के लिए सत्ता पथ प्रशस्त हो गया था। यद्यपि अभी भी यह पथ कंटकाकीर्ण था। पर कवि हृदय अटल जी जैसे उदारवादी व्यक्तित्व के नेता के लिए इस मार्ग पर चलना अब अधिक कठिन नहीं था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक प्रकार के थपेड़े खाए थे। अनेक प्रकार के राजनीतिक उतार चढ़ाव देखे थे। यही कारण था कि इस बार जब वह सरकार बनाने के लिए आगे बढ़े तो 1996 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय जिस प्रकार की चिंता की लकीरें उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थीं, वह इस बार उतनी दिखाई नहीं दे रही थीं। अटल जी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरे हुए थे।

12वीं लोकसभा की दलीय स्थिति

12वीं लोकसभा के लिए कुल 543 सीटों पर चुनाव हुआ था। जिनमें से भाजपा 182 , कांग्रेस 141, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) 32, समाजवादी पार्टी 20, एआईएडीएमके 18, राष्ट्रीय जनता दल 17, तेलुगू देशम पार्टी 12, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया 9, बीजू जनता दल 9, अकाली दल 8 सीट जीतने में सफल हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने 17 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में अच्छा प्रदर्शन किया। इसी प्रकार भाजपा ने भी 17 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई और सीटें जीती। जबकि इससे पूर्व के 1996 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने 26 राज्यों में अच्छा प्रदर्शन करते हुए सीटें जीती थीं। इस बार कांग्रेस का जनाधार घटा और उसकी मत प्रतिशतता भी गिरी। 1998 के लोकसभा चुनावों पर सरकारी कोष से 666.2 करोड रुपए खर्च किए गए थे।

12वीं लोकसभा की सरकार के घटक दल

यद्यपि इस बार भी त्रिशंकु लोकसभा अस्तित्व में आई परंतु इस बार किसी प्रकार से भी आए हुए जनादेश को कोई गैर भाजपाई राजनीतिक दल या गठबंधन तोड़ने मरोड़ने या अपने पक्ष में व्याख्यायित करने में सफल नहीं हो पाया। भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में शिवसेना, अकाली दल, समता पार्टी ,एआईएडीएमके और बीजू जनता दल के सहयोग से सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की। अटल जी ने इस बार 13 महीने के लिए सरकार का नेतृत्व किया। अपने संक्षिप्त से काल में उन्होंने संक्रमण काल से गुजरते देश को एक सक्षम नेतृत्व देने का सराहनीय प्रयास किया। देश के सम्मान को बढ़ाने की दिशा में भी उन्होंने कई ठोस कदम उठाए। राजस्थान के पोखरण में परमाणु विस्फोट कर पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन के साथ – साथ संसार के उन देशों की आंखें खोलने में भी वह सफल रहे जो भारत से शत्रुता मानते रहे हैं या शत्रुता का भाव प्रदर्शित करते रहे हैं।

अटल जी ने निभाया गठबंधन – धर्म

 राजनीति में गठबंधन की सरकारों को लेकर अटल जी ने 'गठबंधन धर्म' जैसे शुद्ध साहित्यिक शब्द का प्रयोग अपने आप करना आरंभ किया। इस शब्द के माध्यम से उन्होंने अपने आलोचकों और प्रशंसकों दोनों को ही यह संकेत और संदेश देने का प्रयास किया कि जब गठबंधन सरकार चलाई जा रही होती है तो उसमें अपना एजेंडा पीछे रखकर चलना पड़ता है। सर्व समन्वय और सर्वसम्मति के आधार पर सरकार चलाई जाती है। इसके उपरांत भी अटल जी ने कुल मिलाकर राजनीति को कुछ सीमा तक शुद्ध करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने गठबंधन (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अर्थात एन0डी0ए0 ) के सभी साथियों को देश के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया और राजनीति के स्वार्थ पूर्ण परिवेश को थोड़ा स्वच्छ करने का  सार्थक प्रयास किया। इससे लगा कि संक्रमण काल से गुजरते देश को आशा की नई कारण दिखाई दे रही है। अटल जी का अपना व्यक्तित्व था। जिसके चलते अनेक दल उनके साथ आकर जुड़े। जिन्होंने अटल जी को सरकार चलाने में सहयोग दिया। बदले में अटल जी ने भी गठबंधन के अपने प्रत्येक साथी को समुचित सम्मान देने का प्रयास किया। यह पहली बार था जब गठबंधन की सरकार देश में चली और सरकार के चलते हुए गठबंधन के किसी दल के नेता ने 'चरण सिंह' या 'चंद्रशेखर' बनने का साहस नहीं किया। यह केवल इसलिए संभव हो पाया कि इस समय मोरारजी देसाई या  वी0पी0 सिंह प्रधानमंत्री नहीं थे बल्कि अटल जी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे।

इस बार राजनीतिक घटनाक्रम कुछ दूसरे तरीके से घटता हुआ दिखाई दिया। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार को 13 महीने हुए तो ऑल इंडिया अन्ना डी0एम0के0 ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद नए चुनाव कराए जाने देश के लिए आवश्यक हो गये। इसके उपरांत भी अटल जी की शांत गंभीर और सटीक निर्णय लेने की छवि ने भाजपा को और भी अधिक प्रसिद्धि दिलाई।

सोनिया का सक्रिय राजनीति में प्रवेश

 इसी समय राजनीति में सोनिया गांधी का भी प्रवेश हुआ। उनके आने पर विदेशी बनाम देसी का मुद्दा भी बड़े जोरदार ढंग से उछाला गया। यह केवल सोनिया गांधी को राजनीति में आने से रोकने के लिए किया गया था। सोनिया गांधी पर अनेक प्रकार के आरोप लगाए गए, पर वह उन सबकी उपेक्षा करते हुए राजनीति में प्रवेश करने में सफल रहीं। आरंभिक चरण में उन्होंने बहुत शांति और धैर्य के साथ अपने आप को संयत रखते हुए लोगों का सामना करना आरंभ किया। इससे उनकी छवि अच्छी बनी और जो लोग उन्हें विदेशी विदेशी कहकर पुकारते थे, उनकी ओर देश के लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया। देश के लोगों को सोनिया गांधी यह विश्वास दिलाने में सफल रहीं कि वह इस देश की बहू हैं और इसे बहुत प्यार करती हैं। यह अलग बात है कि विदेशी बहू होने के कारण और अपने मूल संप्रदाय अर्थात ईसाई धर्म को न छोड़ने के कारण उन्हें आगे चलकर प्रधानमंत्री बनने से पीछे हटना पड़ा। धीरे-धीरे कई चीजों से पर्दा हटा और लोगों की धारणा सोनिया गांधी के प्रति बदलनी आरंभ हो गई। इसके उपरान्त भी वह पार्टी की निर्विवाद नेता बनी रहीं।

सीताराम केसरी और सोनिया गांधी

1997 में कांग्रेस का अध्यक्ष पद सीताराम केसरी के पास था। इंदिरा गांधी के समय में वह कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हुआ करते थे। सीताराम केसरी ने कांग्रेस का अध्यक्ष रहते हुए गांधी नेहरू परिवार को धीरे-धीरे राजनीति के हाशिए पर लाने का प्रयास किया। इससे सोनिया गांधी सचेत हुईं। फलस्वरूप उन्होंने राजनीति में आने का मन बनाया। 1997 में उन्होंने कांग्रेस में सक्रियता से अपनी उपस्थित देनी आरंभ की। उनकी इस प्रकार की सक्रियता से ही यह स्पष्ट हो गया था कि अब वह संगठन की अध्यक्ष बनेंगी और अब सीताराम केसरी के दिन गिनती के रह गए हैं। अंत में यही हुआ। 1998 में लोकसभा के चुनाव होने के तुरंत पश्चात कांग्रेस के लोगों ने सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया।

भाजपा ने स्थिर सरकार देना बनाया मुद्दा

उस समय जिस प्रकार सरकार अस्थिरता और अराजकता का प्रतीक बन चुकी थी, उसे भाजपा ने 12वीं लोकसभा के चुनाव में एक विशेष मुद्दा बनाया । भाजपा ने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि यदि उसकी सरकार आती है तो वह एक स्थिर सरकार देने का काम करेगी। यद्यपि यह लोकसभा भी देश को स्थाई सरकार नहीं दे पाई। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 13 महीने सरकार चलाने के बाद अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए पहले दिन से ही समस्याएं खड़ी करनी आरंभ कर दी थीं। उनकी इच्छा थी कि उनके विरुद्ध चल रहे सभी मुकदमों को अटल सरकार वापस ले और सुब्रमण्यम स्वामी को वित्त मंत्री बनाया जाए । जयललिता की इस प्रकार की टेढ़ी मांगों को अटल जी ने मानने से इनकार कर दिया। जिसके चलते जयललिता ने केंद्र की अटल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। जिसके कारण अटल जी की सरकार गिर गई। यह घटनाक्रम 26 अप्रैल 1999 को घटित हुआ।
वरिष्ठ पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने इंडिया टुडे के 10 मई, 1999 के अंक में लिखा था, "उस रात कोई भी नहीं सोया। सरकार की तरफ़ से बीजेपी साँसद रंगराजन कुमारमंगलम ने मायावती को यहाँ तक आश्वासन दे दिया कि अगर उन्होंने पहले से तय स्क्रिप्ट पर काम किया तो वो शाम तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन सकती हैं। उनके खेमें में गतिविधि देख तब विपक्ष के नेता शरद पवार उनके पास पहुँचे। मायावती उनसे जानना चाहती थीं कि अगर उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ वोट दिया तो क्या सरकार गिर जाएगी? पवार का जवाब था 'हाँ.' जब वोट देने का समय आया तो मायावती अपने साँसदों की तरफ़ देख कर ज़ोर से चिल्लाईं 'लाल बटन दबाओ।'
इलेक्ट्रॉनिक स्कोरबोर्ड पर जब सबकी नज़र गई तो पूरा सदन अचंभित रह गया। अटल सरकार के पक्ष में 269 और विपक्ष में 270 मत पड़े थे।
 उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति के0आर0 नारायणन ने कांग्रेस की सोनिया गांधी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। क्योंकि संख्याबल के दृष्टिकोण से भाजपा के बाद कांग्रेस ही लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी। परंतु उन्होंने सरकार बनाने में असमर्थता व्यक्त की। ऐसी स्थिति में नए चुनाव कराना आवश्यक हो गया था।

12वीं लोकसभा के पदाधिकारीगण

12वीं लोकसभा के अध्यक्ष जी0एम0सी0 बाल योगी थे। उन्हें 24 मार्च 1998 को इस पद पर चुना गया था और 20 अक्टूबर 1999 तक वह इस पद पर कार्य करते रहे। उपाध्यक्ष के रूप में श्री पी0एम0 सईद को दिनांक 17 दिसंबर 1998 को चुना गया। जिन्होंने 26 अप्रैल 1999 तक अपने पदीय दायित्वों का निर्वाह किया। श्री एस0 गोपालन मुख्य सचिव के रूप में 10 मार्च 1998 को नियुक्त हुए और उन्होंने 26 अप्रैल 1999 तक इस पद पर कार्य किया। उस समय देश के राष्ट्रपति के0आर0 नारायणन थे। जिन्होंने 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 तक देश के राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया। डॉ. एम.एस. गिल
(12 दिसंबर 1996 से 13 जून 2001) उस समय देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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