बुद्ध-पूर्णिमा और गौतम बुध 5

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डॉ डी के गर्ग

निवेदन: ये लेख 6 भागो में है ,पूरा पढ़े / इसमें विभिन्न विद्वानों के द्वारा समय समय पर लिखे गए लेखो की मदद ली गयी है । कृपया अपने विचार बताये।

भाग- 5 –बुद्ध से सम्बंधित कुछ प्रश्नोत्तरी : साभार- — पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय

महात्मा बुद्ध और सूअर का मांस

यह बात तो निर्विवाद है कि महात्मा बुद्ध अहिंसा के बड़े पोषक थे! उन्होंने यज्ञ में पशु हिंसा को रोकने के लिए बहुधा अपने प्राणों की रक्षा को भी आवश्यक नहीं समझा !उन्होंने जीव रक्षा को अपने उपदेशों में विशेष स्थान दिया! फिर समझ में नहीं आता कि उन्होंने मांस खाया हो!यह युक्ति तो अत्यंत निर्बल है कि साधु होने के कारण वह हर पदार्थ को बिना विचार किए खा लेते थे और इससे भी अधिक निर्बल यह युक्ति है कि पशुओं का मारना पाप है परंतु मरे हुए पशु को खा लेना पाप नहीं! मांडले के प्रसिद्ध विद्वान श्री खिन मांग ड्वे से मुझसे इस विषय में बहुत बार बातचीत हुई! ड्वे महोदय मांसाहारी नहीं हैं! मांडले, रंगून आदि देशों में निरामिष भोजियों की सभाएं वेजिटेरियन सोसाइटीज हैं ! मुझे रंगून में एक इटालियन बौद्ध साधु मिले जिनका नाम है- साधु लोकनाथन !यह निरामिष भोजन के बहुत बड़े प्रचारक हैं और लंका आदि देशों सभी देशों में मांसाहार के विरुद्ध प्रचार करते हैं! मांडले में बौद्ध धर्म प्रचारक संघ के पंजाबी अध्यक्ष श्री रूप लाल सोनी भी मांस भक्षण का निषेध करते हैं! रंगून में मेरी रेवत जी से भेंट हुई जो एक प्रसिद्ध मठ के अध्यक्ष हैं! इन्होंने रंगून में मेरे एक व्याख्यान में अध्यक्ष पद भी ग्रहण किया था ! ऊ रेवत महोदय ने मुझे पाली भाषा से पढ़कर सुनाया की मांस खाना पाप है! वह अपने मठ में किसी को मांस खाने नहीं देते !उन्होंने मुझे यह भी बताया कि गौ का मारना महापाप है ! उन्होंने अपनी पुस्तक से सुनाया की गौ हत्या के आरंभ होने से पूर्व संसार में केवल 3 व्याधियां थीं-एक भूख, दूसरी मृत्यु, तीसरी (मुझे याद नहीं रही )!परंतु जब से गौ हत्या होने लगी सैकड़ों व्याधियों आविर्भूत हो गईं! इससे सिद्ध होता है कि बौद्ध मत में भी मांस भक्षण पाप ही है ! मैंने साधु लोकनाथन से कहा कि जब मांस भक्षण पाप है तो समस्त बौद्ध देशों में इसका इतना प्रचार क्यों है? वह कहने लगे कि यह देश पहले बिल्कुल जंगली थे! बौद्ध मत ने इतना सुधार कर दिया यह क्या कम है ?यह बात किसी अंश में ठीक भी हो सकती है! वस्तुतः जब किसी धर्म का आत्मा नष्ट हो जाती है तो केवल ऊपरी ढोंग रह जाता है!बौद्ध मत ने भारत भूमि से चलकर बाहर अनेक आडंबर रच लिए होंगे ! वही आज बौद्ध धर्म का बाहरी स्वरूप है!
एक दिन मैंने दवे महोदय से कहा कि मुझे वह स्थल दिखाइए जहां बुद्ध भगवान का मांस खाना लिखा है !उन्होंने ब्राह्मी लिपि में छपे हुए दीघनिकाय,महावग्ग सुत्त, महा परिनिब्बान सुत्त से नीचे के चार श्लोक सुनाएं–
चउन्दस्य भत्तं भुंजित्वा कम्माररस्साति ये सुतं !
आबाधं सम्फुसो धीरो पबाब्ठे मारणन्तिकं !
भत्तस्स च सूकर मद्दवेन , व्याधि पबाह उदपापि सत्थुनो !
विरेचमानो मगवा आबोच गच्छामहं कुसिनारं नगरंति !(दीर्घनिकाय)
इसका भावार्थ यह है कि चुनासा भट्ट ने महात्मा बुद्ध को सूकर मद्दव खिला दिया! उससे उनके पेट में अति पीड़ा हुई और अतिसार हो गया! उन्होंने कहा- “मैं कुशीनर नगर को जाऊंगा!”
मुझे बताया गया है कि बौद्ध साहित्य में अन्य किसी स्थान पर ऐसा प्रकरण नहीं मिलता जिससे निस्संदेह रूप से ज्ञात हो सके कि सूकरमद्दव का यह अर्थ है !लंका के बौद्ध लेखकों ने इसका अर्थ सूअर का मीठा मांस किया है! और इसी बात को अन्य लोगों ने ले लिया है ! श्री आचार्य रामदेव जी ने अपने भारतीय इतिहास में इसका अर्थ एक प्रकार का कन्द किया है!
मैंने भारतवर्ष में लौटकर यह खोज करने की कोशिश की कि यह सुकर माद्दव क्या चीज है जिसने बुद्ध भगवान के पेट में पीड़ा उत्पन्न कर दी ! और बहुत से सज्जनों ने अपने विचार प्रकट किए ! जैसे–
१- श्री नेहपाल सिंह जी, डिप्टी डायरेक्टर शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश लिखते हैं- सूकर मद्दव साधारण कुकुरमुत्ता के अर्थ में समझना चाहिए……. इसका बड़ा सुंदर शाक बनता है पर यह “कुत्ते का मूत होता है”! वम्मीन्याय के अनुसार कोई कहने लगे तो कितनी बेढंगी बात होगी! कुकुरमुत्ता है भी बड़े डर की चीज! कोई कोई ही खाने में आता है! कुछ उग्र विष होते हैं !कभी-कभी परिवार के परिवार खाकर समाप्त हो जाते हैं…… जो अनजान हैं वह पहचान में भूल कर बैठते हैं ! चुन्न ने संभव है ऐसी ही भूल की हो!
२- बच्चीराम आर्य रामगढ़ नैनीताल :- सूकरर माद्दव शाक नहीं कंद ही हो सकता है !बाराही कंद को कुमाऊं में गेठी कहते हैं! यह दो प्रकार का होता है- एक घरेलू मीठा ,दूसरा जंगली कड़वा!बाराह या सूअर इसको प्रिय समझते हैं ! इस कंद पर छोटे शूकर के समान बाल होते हैं ! गेठी के अतिरिक्त एक और कंद होता है! यह चेपदार मधुर और गरिष्ठ होता है! यह अतिसार उत्पादक है! गोरखपुर देवरिया की तराई में ही महात्मा बुध का निर्वाण हुआ था ! तराई की इस उपज का तब भी प्रयोग होता ही होगा!
३– जगन्नारायण शर्मा वैद्य बतरौली देवरिया :– आयुर्वेद शास्त्र में एक कंद होता है जो बल्य, वृश्य एवं रसायन होता है जिसे लोक में बाराही कंद कहते हैं! आयुर्वेद में इसके बाराही कंद, शकरकंद , शूकरी आदि नाम हैं!
४– रॉकहिल ने बुद्ध की जीवनी लिखी है! तिब्बती ग्रंथों के आधार पर इसमें सूअर के मांस का उल्लेख नहीं है! स्वादु भोजन का ही वर्णन है! उन्होंने यह टिप्पणी दी है–
It is curious that the text contains no mention of the pork which is said to have called inflamation in the cause of Buddha’s death.
५– Pali English dictionary( pali text society London द्वारा प्रकाशित) soft tender boarsh flesh (सूअर का नर्म मांस)
६– Rhys Davis dialogues of Buddha—
Shukar maddva- see the note ine my translation of milinda 1890 volume first page 244 Dr Hoey informs me that the peasentary in these districts are Steel very fond of a bulbunous root, a sort of tuffle found in the jungle and called shakarkand. Mr k e Numan in his translation of the 1896 collected several similar influences of tuffle-like roots are edible plants having such names.
अर्थात रिज डेविस ने महात्मा बुद्ध के वार्तालाप पर जो पुस्तक छापी है उसमें शूकर मद्दव पर एक टिप्पणी दी है ! डॉक्टर ‘हो’ ने उनको लिखा है कि इन प्रांतों में एक कंद होता है जिन्हें समरकंद कहते हैं! डॉक्टर न्यूमन ने मझिझम के अनुवाद में ऐसे कई कंदों का उल्लेख किया है!
इन सब बातों से यह अनुमान निकालना कठिन नहीं है कि महात्मा बुद्ध के सूअर के मांस खाने की संभावना बहुत कम है! प्रथम तो विदेशी और विशेषकर यूरोप के विद्वान यह नहीं जानते कि भारतवर्ष में सूअर और सूअर के मांस को कैसा समझते हैं! अन्य देशों में मांस खाने या किसी पशु -पक्षी को मारने में किसी को संकोच नहीं होता !भारत में होता है! सिर्फ सूअर का मांस तो मेहतर और पासियों के अतिरिक्त कोई खाता ही नहीं! चुन्द ऐसी जाति का व्यक्ति न था! दूसरी बात यह है कि भारत वर्ष तथा अन्य देशों में भी कई वनस्पतियों के नाम पशुओं के अंगों पर हैं! इससे केवल धातुओं के अर्थों से कोरे व्याकरण जानने वाले को भ्रांति हो जाती है! यौगिक शब्दों की अपेक्षा योगरूढ़ि प्रबल होते हैं! यहां कुछ उदाहरण देते हैं–
१- अश्ववाल :- एता औषध: समभवन यदश्वाला:!
शतपथ ब्राह्मण कांड 3 अध्याय 4 ब्राह्मण 1,17
यहां अश्ववाल एक औषधि है! यद्यपि शब्दार्थ है घोड़े का बाल! मेरी अपनी धारणा तो है कि महोक्ष और महाज भी औषधियां ही होंगी!
२- अंग्रेजी में cows lips‌ एक फूल का नाम है !यद्यपि इसका शाब्दिक अर्थ है – गाय का होंठ !
३- अंग्रेजी में ladies finger भिंडी के लिए आता है! यद्यपि शब्दार्थ है- स्त्रियों की उंगलियां!
४- लखनऊ के लोग बहुत पतली ककड़ियों को मजनू की उंगलियां और लैला की पसलियां कहा करते हैं!
५- फारसी भाषा में गांवजुबां एक पत्ती है जो दवा में काम में आती है !शब्दार्थ हुआ- गाय की जीभ!
६- हिंदी में कुकुरमुत्ता एक शाक है! शब्दार्थ हुआ – कुत्ते का मूत्र
७- अश्वगंधा एक औषधि है! शब्दार्थ हुआ घोड़े की गंध
८- काकमाची मकोय को कहते हैं
९- कुमारिका मांस का शाब्दिक अर्थ है कुमारी लड़की का मांस परंतु वस्तुतः इसका अर्थ है घी ग्वार के पट्ठे का गूदा!
१०- हिरणखुरी एक सफेद फूल की घास होती है! शब्दार्थ हुआ हिरण का खुर !
इसी प्रकार सूकर मद्दव भी कोई कंद या शाक होगा जिसको लोग प्रायः खाते होंगे!
भारतवर्ष से जब बौद्ध मत अन्य देशों में गए तो इसमें बहुत से परिवर्तन और विकार आ गए !पुरानी परिपाटी के विस्मृत हो जाने पर लोगों ने अटकल से अर्थ लगाए होंगे और विशेषकर विदेशी भाष्यकारों ने ! ‘सूअर के मांस’ का विचार तो बुद्धघोष की कल्पना प्रतीत होती है जिन्होंने महापरिनिरब्बान सुत्त की सुमंगल विलासिनी टीका लिखी है ! यह बुद्ध जी के निर्माण के 935 वर्ष पीछे सिंहल देश में गए! उन्होंने वहां त्रिपिटक ग्रंथ के अत्तकथा समूह का पाली भाषा में अनुवाद किया ! यह अनुराध पुर के महाविहार में रहते थे! इनके समय सूकर् मद्दव के विषय में वहां के लोगों के कई मत थे !एकमत था “नाति तरुण नाति वृद्ध पवत्त मंस” दूसरा पंच गोरस से बना हुआ पायस विशेष ” तीसरा ‘एक प्रकार का रसायन! किसी किसी ने इसको एक प्रकार का पका चावल बताया है ! क्योंकि इसके लिए ‘भत्त’ (भात) शब्द का प्रयोग हुआ है!
भारतवर्ष में प्राचीन काल में ही मांस का प्रचार न था ! महात्मा बुद्ध के बहुत काल पूर्व अहिंसा के महत्व का उपदेश पाया जाता है ! महात्मा बुद्ध ने अहिंसा के भाव को पुनर्जीवित किया क्योंकि उनके समय में यज्ञ में पशु मारने की प्रथा भी बहुत बढ़ गई थी! भारत के लोग जब बौद्ध देशों में जाते हैं तो उनको आश्चर्य ही होता है कि महात्मा बुद्ध जैसे अहिंसा के प्रचारक के अनुयाई अपने खाने के लिए पशु वध कैसे करते हैं? यह बात उन देशों के लोगों की नहीं खकटती जिनको आरंभ से ही मांस- भक्षण की टेव पड़ी हुई है !
स्रोत- जीवन-चक्र (आत्मकथा)

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