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मोदी को लेकर देसी और विदेशी मीडिया के दृष्टिकोण का अंतर

लिमटी खरे

गुजरात की दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं विधान सभा में 07 अक्टूबर 2001 से 22 मई 2014 तक 12 साल 227 दिनों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र भाई मोदी ने 26 मई 2014 को भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री के बतौर पद संभाला था, उसके बाद से आज तक वे लगातार ही प्रधानमंत्री पद पर काबिज हैं। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस रसातल की ओर अग्रसर ही दिखाई दे रही है। एक समय था कि जब देश में कांग्रेस की तूती बोला करती थी, देश के कमोबेश हर राज्य में कांग्रेस का इकबाल बुलंद हुआ करता था, पर अब कांग्रेस महज तीन प्रदेशों हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में ही सत्ता में है।

इस बात में संदेह नहीं है कि देश के मीडिया के द्वारा नरेंद्र मोदी का सकारात्मक पक्ष उकेरा जाता रहा है, जिसके चलते विपक्ष के द्वारा मीडिया को ‘गोदी मीडिया‘ की उपाधि से भी अलंकृत किया जाता रहा है। वहीं दूसरी ओर विदेश में मीडिया के द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार को जमकर घेरा जा रहा है। सरकार का यह कहना रहा है कि विदेशी मीडिया के द्वारा जो भी दिखाया या लिखा जा रहा है वह तोड़ मरोड़कर पेश किया जा रहा है अर्थात तथ्यों पर आधारित तो कतई नहीं है।

नरेंद्र मोदी पर यह ताना भी विपक्ष लगातार ही लगाता आया है कि नरेंद्र मोदी के द्वारा जमकर विदेश दौरे किए हैं। इस लिहाज नरेंद्र मोदी के अब तक के कार्यकाल में उनके विदेशी नेताओं से संबंध तो बहुत ही अच्छे माने जा सकते हैं, पर पता नहीं क्यों पश्चिमी देशों के मीडिया का नजला नरेंद्र मोदी पर क्यों टूटता आया है। नरेंद्र मोदी के लिए पश्चिमी मीडिया के द्वारा तानाशाह, दबंग शासक जैसी उपमाओं संज्ञाओं का प्रयोग किया जाता रहा है। भले ही पश्चिमी मीडिया में जो प्रकाशित या प्रसारित किया जा रहा है उसका बहुत बड़ा पाठक या दर्शक वर्ग भारत में नहीं है पर फिर भी वैश्विक स्तर पर उनकी छवि को यह प्रभावित किए बिना नहीं है।

अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सलाहकार रहे 04 मई 1942 को जन्मे सत्यनारायण गंगाराम पित्रौद्रा उर्फ सैम पित्रोद्रा जो वर्तमान में राहुल गांधी के सलाहकार भी माने जा रहे हैं के द्वारा नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए पश्चिमी देशों के मीडिया के द्वारा प्रकाशित और प्रसारित की गई खबरों की सुर्खियों को जिस तरह से मीडिया में रखा है उससे अब देश में नई बहस का आगाज होना स्वाभाविक ही है। चुनाव के दो चरणों के बाद सैम पित्रोद्रा की खबरों की सुर्खियां अब बहस का मुद्दा बन चुकी हैं।

सैम पित्रोद्रा के द्वारा न्यूयार्क टाईम्स, रॉयटर, टाईम, गार्जियन, इकोनामिस्ट, ला मोंद, ब्लूमबर्ग, फायनेंशियल टाईम्स एलए टाईम्स आदि की खबरों को पेश किया है। इसमें सभी का अगर आप अध्ययन करें तो सभी में कमोबेश एक ही तरह की बातों के जरिए नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने का प्रयास किया गया है। यक्ष प्रश्न यही खड़ा हुआ है कि आखिर विदेशी मीडिया के द्वारा नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस तरह का जहर वह भी कमोबेश एक ही तरह के संदेशों के जरिए क्यों उगला जा रह है! कहीं न कहीं यह चुगली करता प्रतीत हो रहा है कि यह सब कुछ किसी एक सोच वाले व्यक्तित्व के द्वारा निर्देशित किया जा रहा है। पर आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि आखिर विश्व के सर्वोच्च, नामी गिरामी, पारदर्शिता वाले मीडिया संस्थान इस तरह की कवायद कैसे और किसका अस्त्र बनकर कर रहे हैं! आखिर इसके पीछे कौन है!

सैम पित्रौद्रा के द्वारा पोस्ट की गई सुर्खियों में टाईम की ‘भारत का मोदीकरण लगभग पूरा‘, न्यूयार्क टाईम्स की ‘मोदी के झूठों का मंदिर’, गार्जियन की ‘असंतोष को अवैध बनाने से लोकतंत्र को नुकसान’, एलए टाईम्स की ‘मोदी और भारत के तानाशाही की ओर अग्रसर होने पर बाइडेन चुप क्यों हैं’, ब्लूमबर्ग की ‘प्रगतिशील दक्षिण द्वारा मोदी का अस्वीकार’ फायनेंशियल टाईम्स की ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी की हालत ठीक नहीं’, ला मोंद की ‘भारतीय लोकतंत्र नाममात्र का’, इकोनामिस्ट की ‘मोदी का अनुदारवाद भारत की आर्थिक प्रगति को कर सकता है बाधित’ आदि शामिल है।

वास्तव में आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि देश का मीडिया मोदी के जयकारे लगाता दिख रहा है पर दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग साख रखने वाले मीडिया संस्थानों के प्रकाशन इससे ठीक उलट ही बात को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं। विदेशी मीडिया से सरकार के संबंध क्यों बिगड़े इस बात पर भी विचार करना चाहिए। एक संस्था ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के दक्षिण एशिया ब्यूरो की प्रमुख अवनी डियास ने यह दावा करते हुए भारत छोड़ दिया कि उन्हें वीजा नहीं दिया गया, जिससे उन्हें चुनाव कवर करने का मौका नहीं मिला। इसमें कितनी सच्चाई है यह कहना थोड़ा सा मुश्किल ही है।

सरकारों के खिलाफ जाना विदेश के मीडिया का यह कदम पहली बार नहीं है। दरअसल, यह माना जाता है कि भारत गणराज्य के चुनावों में विदेशों के राजनयिकों की नजरें रहा करती हैं। इसके अलावा विदेश का मीडिया भी गिद्ध दृष्टि लगाकर भारत के चुनावों को न केवल देखता है, वरन दबाव बनाने का प्रयास भी करता है, पर इसे घरेलू मामलों में दखल ही माना जाता है। इंदिरा गांधी से लेकर न जाने कितने नेताओं पर विदेशी मीडिया ने दबाव बनाने का प्रयास किया पर विदेशी मीडिया के ये प्रयास परवान नहीं चढ़ सके।

याद पड़ता है कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया था उस वक्त इसी पश्चिमी मीडिया ने भारत को शांति के लिए खतरा और खलनायक तक करार दे दिया था। कुल मिलाकर विदेशी मीडिया के द्वारा जिस तरह का दबाव अब तक बनाया जाता रहा है और उस दबाव के आगे देश के नेताओं ने घुटने नहीं टेके, उसी जोश और रणनीति को अभी भी कायम रखने की महती जरूरत महसूस हो रही है।

बहरहाल, चुनाव के दौरान सभी प्रचार में चटखारेदार, लच्छेदार उन बातों को जनता के समक्ष परोसना चाहते हैं जिसे जनता के द्वारा ध्यान से सुना जाए। सैम पित्रोद्रा के द्वारा पेश की गई सुर्खियां अब सोशल मीडिया के अथाह समुद्र में डूबती उतराती तैरती हुई ही दिख रही हैं। इस पर मीम भी बनते दिख रहे हैं। सैम पित्रोद्रा के द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई इन इबारतों और खबरों को मानो पंख लग गए हैं, ये बहुत ही तेजी से वायरल होती दिख रही हैं। लाखों लोग इसे देख चुके हैं। चुनाव में हार और जीत अपनी जगह है पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अगर कोई षणयंत्र चल रहा है तो पक्ष और विपक्ष को कंधे से कंधा मिलाकर उस षणयंत्र का पर्दाफाश जरूर करना चाहिए।

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