उगता भारत राष्ट्र मंदिर : कुछ ऐतिहासिक स्थल दुर्ग 3

अन्य ऐतिहासिक दुर्ग

भारतवर्ष में अनेक स्थानों पर दुर्गों के माध्यम से इतिहास का गौरव बिखरा पड़ा है। इन दुर्गों में राजस्थान के जयपुर के पास आमेर का किला, इसे आम्बेर का किला भी कहा जाता है, तमिलनाडु के विल्लूपुरम स्थित जिन्जी किला , कर्नाटक के श्रीरंगपटना का किला, महाराष्ट्र का पन्हाला किला ,औरंगाबाद महाराष्ट्र का दौलताबाद किला, महाराष्ट्र का रायगढ़ किला राजस्थान के अलवर जिले का भानगढ़ किला , उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित प्रेम मंदिर वृंदावन , महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित प्रतापगढ़ किला, आंध्र प्रदेश का विजयनगरम किला, तमिलनाडु चेन्नई का सेंट जॉर्ज किला, जयपुर राजस्थान का नाहरगढ़ किला, पश्चिम बंगाल के कोलकाता का फोर्ट विलियम,
झांसी का किला कर्नाटक का बीदर किला।

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छत्रसाल की समाधि

छत्रसाल जिनका वास्तविक नाम शत्रुसाल था। हमारे इतिहास के एक वंदनीय महापुरुष हैं। जिन्होंने अपने जीवन काल में विदेशी शत्रुओं से लड़ने का पराक्रम दिखाया। उन्होंने समकालीन मुगल सत्ता को कड़ी चुनौती दी और भारतीय धर्म व संस्कृति की रक्षा करने का स्तवनीय कार्य किया। उनकी समाधि छतरपुर शहर में स्थित है। जो कि इस समय पूर्णतया उपेक्षित पड़ी है।

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जानिए लक्ष्मी बाई की समाधि के बारे में

1857 की क्रांति के समय एक महा नायिका के रूप में नारी की अस्मिता और देश की प्रतिष्ठा के लिए लड़ने वाली महारानी लक्ष्मी बाई की समाधि फूल बाग में बहुत ही भव्यता के साथ बनाई गई है। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक देश के सम्मान की लड़ाई लड़ी। समाधि स्थल पर रानी लक्ष्मी बाई की आठ मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। रानी की चिता के अवशेषों को यहीं पर लाकर के सुरक्षित रखा गया था। तब से ही यह जगह झांसी की रानी समाधि के नाम से लोकप्रिय है। रानी लक्ष्मी बाई ने 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

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बेरछा की रानी की समाधि

दतिया जिले के सेवढा के पास बेरछा रियासत की राजकुमारी ज्ञानकुंअरी थी, जिनका विवाह भारत के इतिहास के महानायक राजा छत्रसाल के साथ हुआ था। ग्राम महेवा में बछुआ तालाब के किनारे राजा छत्रसाल की द्वितीय रानी ज्ञानकुंअरी (बेरछा रानी) की समाधि बनाई गई है। यह समाधि स्थल पुरातत्व विभाग के अधीन है। रानी ने अपने पति के विभिन्न अभियानों में बढ़-चढ़कर सहयोग दिया था और उस समय नारी शक्ति के लिए महान कार्य किए थे। स्वाधीनता के पश्चात रानी की समाधि का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा गया है जिससे आजकल यह अपने अस्तित्व के लिए लाचार सा दिखाई देता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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