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आज का चिंतन

*रुद्राभिषेक रहस्य*

Dr DK Garg

भाग 2 ,

रुद्राक्ष एक फल है –अंत में रुद्राक्ष के विषय में भी समझ ले : रुद्राक्ष अपनी दिव्यता के साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। आयुर्वेद में रुद्राक्ष को महाऔषधि की संज्ञा दी गई है। इसके विभिन्न औषधीय गुणों के कारण रोगोपचार हेतु इसका उपयोग आदिकाल से ही होता आया है। रुद्राक्ष एक ऐसा फल है जिसके सेवन के अतिरिक्त इसको पहनकर भी चिकित्सा लाभ लिए जा सकते है , इसको बांह, कलाई या शरीर के अन्य हिस्सों पर पहना जा सकता है।इसकी माला गले में धारण करने से रक्त का दबाव अर्थात उच्च रक्तचाप नियंत्रित होता है। रुद्राक्ष से निकलने वाले तेल से दाद, एक्जिमा और मुंहासों से राहत मिलती है, ब्रोंकियल अस्थमा में भी आराम मिलता है।
शरीर के गठन को बढ़ाने के लिए रुद्राक्ष का विवरण देते हैं। रुद्राक्ष की माला, छाल और पत्तियां सभी का उपयोग विभिन्न बीमारियों जैसे मानसिक विकार, सिरदर्द, बुखार, त्वचा रोग आदि को ठीक करने के लिए किया जाता है।
अन्य लाभ –स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए : रुद्राक्ष को दूध के साथ लेने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।
मस्तिष्क के सभी रोगों के लिए : रुद्राक्ष का उपयोग मस्तिष्क के सभी रोगों जैसे मस्तिष्क ज्वर आदि के इलाज के लिए किया जा सकता है।
रक्त शोधक के रूप में: रुद्राक्ष का उपयोग रक्त की अशुद्धियों के इलाज के लिए किया जाएगा और शरीर के पदार्थ को मजबूत करेगा।
जीवाणुरोधी के रूप में: रुद्राक्ष का उपयोग जलने और निशान के इलाज के लिए किया जा सकता है।
मिर्गी को नियंत्रित करने के लिए: रुद्राक्ष के फल या छाल के गूदे का उपयोग करके मिर्गी को नियंत्रित किया जा सकता है।
रुद्राक्ष का उपयोग पेट दर्द और लीवर की समस्याओं के इलाज के लिए किया जा सकता है।

पूजा क्या है और कैसे की जाती है ?

देवता दो प्रकार के होते है जिनकी पूजा को देव पूजा कहते है। ये है –१ चेतन देवता और २ जड़ देवता
चेतन देवता के अंतर्गत माता ,पिता और आचार्य ,संत ,अतिथि आदि आते है। इनकी पूजा कैसे करें ? मतलब इनको सम्मान देना ,भोजन ,जल आदि प्रदान करना चेतन देवता की पूजा है। भोजन ,जल आदि मुख द्वारा ग्रहण किया जाता है।
जड़ देवता कौन है ? ये देव वह हैं जो देता है, बदले में कुछ चाहता नहीं हैं। सूर्य देवता, वायु देवता, वृक्ष देवता, पृथिवी देवता आदि जड़ देव जीवन देते हैं, बदले में कुछ नहीं चाहते हैं। ऐसी आधार पर प्रश्न है की जड़देवों की पूजा के लिए, उन्हें तृप्त करने के लिए उनका मुख क्या है, क्या हो सकता है जो इन्हें सूक्ष्म करकर ऊर्जा प्रदान करें, इन्हें जीवनी शक्ति से युक्त रख सके? शतपथ ब्राह्मण में लिखा है-‘अग्निर्वै मुखं देवानाम्’
इन जड़ देवों का मुख अग्नि है, क्योंकि अग्नि में डाले हुए पदार्थ, पदार्थ विज्ञान के अनुसार नष्ट नहीं होते हैं अपितु रूपान्तरित होकर, सूक्ष्म होकर शक्तिशाली बनते हैं। सूक्ष्म होकर अन्तरिक्ष में वायु के माध्यम से फैलते हैं, व्यापक हो जाते हैं। सभी को जीवन-शक्ति से संयुक्त कर देते हैं। अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, व्याप्त पर्यावरण को शुद्ध करने में सक्षम हो जाते हैं।
तभी-‘अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः’(यजु 23/62) इस यज्ञ को भुवन की नाभि कहा है, जो पदार्थ अग्नि में डालते हैं, वे सूक्ष्म होकर वायु के माध्यम से ऊर्जस्वित होकर, शक्ति सम्पन्न होकर द्युलोक तक पहुँचते हैं। मनु महाराज ने स्पष्ट लिखा है-
अग्नौ प्रास्ताहुतिः… प्रजाः।-मनु. ३/ ७६
अर्थात् अग्नि में अच्छी प्रकार डाली गयी पदार्थों (घृत आदि) की आहुति सूर्य को प्राप्त होती है-सूर्य की किरणों से वातावरण में मिलकर अपना प्रभाव डालती है, फिर सूर्य से वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न पैदा होता है, उससे प्रजाओं का पालन-पोषण होता है। गीता में वर्णित है-
अन्नाद् भवन्ति…कर्मसमुद्भवः।-गीता ३/१४
अर्थात् अन्न से प्राणी, वर्षा से अन्न, देवयज्ञ से वर्षा तथा देवयज्ञ तो हमारे कर्मों के करने से ही सम्पन्न होगा। निश्चय से देवयज्ञ ही वह साधन है जिस के द्वारा हम यथोचित रुप में चेतन देवों का सम्मान करते हैं तथा जड़ देवों की भी पूजा अर्थात् यथोचित व्यवहार द्वारा इन्हें दूषित नहीं होने देते हैं। अग्नि में डाले गये पदार्थ सूक्ष्म होकर वृक्ष देवता, वायु देवता, पृथिवी देवता, सूर्य देवता, चन्द्र देवता आदि सभी लाभकारी देवों को शुद्ध, स्वस्थ, पवित्र रखते हैं, और ये देव हमें स्वस्थ एवं सुखी बनाते हैं। गीता में इस तथ्य को कितने स्पष्ट शब्दों में वर्णित किया है-
आईये निराकार शिव की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करे। आवश्यकता होने पर रुद्राक्ष का प्रयोग करे। यही सच्चे अर्थो में रुद्राभिषेक है। ईश्वर के अनगिनत गुण होने के कारण अनगिनत नाम है। शिव भी इसी प्रकार से ईश्वर का एक नाम ,रूद्र भी है।अंधविस्वास से दूर रहना भी सच्ची ईश्वर पूजा का एक भाग है।

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