Categories
विविधा

रीति रिवाजों के नाम पर लैंगिक भेदभाव से मुक्त नहीं हुआ समाज

उत्तराखंड

हमारे समाज में अक्सर ऐसे कई रीति रिवाज देखने को मिलते हैं जिससे लैंगिक भेदभाव स्पष्ट रूप से नज़र आता है. लड़का और लड़की के जन्म से लेकर उसके शादी-ब्याह, दहेज और संपत्ति के अधिकार तक के मामले में यह भेदभाव नज़र आता है. लड़का के जन्म पर जहां जश्न मनाया जाता है, तो वहीं लड़की के पैदा होते ही घर में मातम छा जाता है. गर्भवती महिलाओं से उसके ससुराल वाले यह आशा करते हैं कि वह लड़के को जन्म देगी. जिस महिला के जितने अधिक लड़के होते हैं समाज में उसका उतना ही अधिक सम्मान होता है. इसके विपरीत लड़की को जन्म देनी वाली महिला को अपमानित किया जाता है. शहरी क्षेत्रों की तुलना में यह भेदभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक नज़र आता है. कई बार महिलाएं इस प्रकार की हिंसा से इतनी प्रभावित हो जाती हैं कि उनका व्यवहार भी ऐसे मामलों में भेदभावपूर्ण नज़र आने लगता है. ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार गैर क़ानूनी तरीके से गर्भावस्था में ही लिंग जांच कर कर भ्रूण हत्या तक कर दी जाती है. अपनी किस्मत से यदि कोई लड़की बच गई तो उसे दहेज और अन्य रीति रिवाजों के माध्यम से प्रताड़ित किया जाता है.

शिक्षा और जागरूकता के कारण शहरी क्षेत्रों में जहां कई ऐसे रीति रिवाज लगभग समाप्त हो गए हैं जिससे महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है, वहीं देश के दूर दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में इसके अभाव के कारण यह आज भी समाज के लिए एक कलंक बना हुआ है. पहाड़ी राज्य उत्तराखंड का लामाबगड़ गांव इसका एक उदाहरण है. जिला बागेश्वर स्थित कपकोट ब्लॉक से करीब 21 किमी दूर इस गांव में कई ऐसी सामाजिक बुराईयां देखने को मिल जाती हैं जिससे लैंगिक भेदभाव स्पष्ट रूप से नज़र आता है. चिंता की बात यह है कि इसे समाप्त करने की जगह बढ़ावा दिया जाता है. पंचायत से मिले आंकड़ों के अनुसार इस गांव की आबादी लगभग 1500 के करीब है. अनुसूचित जनजाति बहुल इस गांव में उच्च जातियों की संख्या मात्र दस प्रतिशत है. साक्षरता के मामले में भी महिला और पुरुष में काफी बड़ा अंतर नज़र आता है. पुरुषों के 40 प्रतिशत की तुलना में महिला साक्षरता की दर मात्र 22.2 प्रतिशत है. यह अंतर जहां जागरूकता की कमी को दर्शाता है वहीं समाज में दहेज जैसी बुराई को भी अपनी जड़ें मज़बूत करने में सहायता प्रदान करता है.

गांव की एक 20 वर्षीय नवविवाहित कमला (बदला हुआ नाम) कहती है कि ‘हाल ही में मेरी शादी हुई है. मेरे पति सरकारी नौकरी करते हैं. शादी के समय मेरे ससुराल वालो की मांग बहुत ज्यादा थी. मेरे घर वालों ने अच्छा रिश्ता देखकर उनकी हर मांग को स्वीकार कर लिया और बहुत सारा दहेज दिया है. इसकी वजह से वह कर्ज में डूबे हुए हैं. मुझे उनका ये दुख देखा नहीं जाता है. इसके कारण मैं कई बार मानसिक तनाव में रहती हूं. न जाने कब तक वो ये कर्ज चुकाते रहेंगे?’ 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली गांव की एक किशोरी कमला कहती है कि “मैं सरकारी स्कूल में पढ़ती हूं जबकि मेरा भाई बाहर शहर में पढ़ने गया है. 12वीं के के बाद घर वाले मुझे आगे नहीं पढ़ाएंगे. जब भी मैं आगे पढ़ने की बात करती हूं हो तो घर वाले बोलते हैं कि जितनी तेरी पढ़ाई में खर्च करेंगे उतने में तेरी शादी के लिए दहेज की व्यवस्था हो जायेगी. इसलिए 12वीं के बाद मुझे घर का काम करने को कहा गया है. जबकि मैं भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ. लेकिन दहेज के नाम पर मुझे शिक्षा से वंचित किया जा रहा है.’

हालांकि लामाबगड़ गांव के कुछ परिवार ऐसे भी हैं जहां जागरूकता के कारण बालिकाओं को शिक्षा के भरपूर अवसर मिल रहे हैं. गांव की 19 वर्षीय हेमा गढ़िया का कहना है कि ‘मेरे साथ परिवार में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है. मैं 12वीं के बाद अब कॉलेज भी कर रही हूं. मुझे आगे भी पढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के अवसर मिल रहे हैं. मेरे माता पिता मुझ पर कोई पाबंदी नहीं लगाते हैं. मुझसे यह कभी नहीं कहा जाता है कि दहेज का सामान जुटाने की वजह से तेरी पढ़ाई रुकवा दी जाएगी.’ हेमा कहती है कि जिस घर में जागरूकता होगी वहां लड़कियों को पढ़ने और आगे बढ़ने से नहीं रोका जायेगा. कई बार आर्थिक समस्या के कारण लड़कियों को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है, लेकिन उन्हें दहेज़ के नाम पर शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.’

वहीं गांव की एक 43 वर्षीय महिला माना देवी कहती हैं कि ‘दहेज जैसी बुराई सदियों से चली आ रही है, जिसे समय समय पर अलग अलग नाम दे दिए गए हैं. पहले लड़की पक्ष भेट स्वरुप इस बुराई को निभाता था, आज यह खुल्लम खुल्ला होने लगा है. आज लड़का पक्ष इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने लगा है. जबकि यह प्रतिष्ठा नहीं बल्कि अनैतिक कृत्य है, जिसमें पूरा समाज साथ देता है. वहीं यदि कोई लड़की मांग से कम दहेज लाती है तो ससुराल में उसे मानसिक यातनाओं से गुज़रना पड़ता है. सामाजिक स्तर पर अब इस बुराई को समाप्त करने की आवश्यकता है. इसके लिए स्वयं समाज को जागरूक होना होगा. इसके विरुद्ध अभियान चलाने की ज़रूरत है.’

एक अभिभावक 50 वर्षीय विष्णु दत्त का कहना है कि ‘दहेज एक ऐसी बुराई है जिसे रीति रिवाज का नाम दे दिया गया है. इसके कारण न केवल लड़कियों की शिक्षा प्रभावित हो रही है बल्कि कई बार वह मानसिक अत्याचार का भी शिकार होकर तनाव में रहती हैं. दहेज़ जैसी बुराई के कारण ही आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार की लड़कियों की शादी रुक जाती है. वहीं 73 वर्षीय कलावती देवी कहती हैं कि ‘हमारे जमाने में भी दहेज जैसी बुराई थी. परंतु इसके लिए लड़की पक्ष पर किसी प्रकार का दबाब नहीं डाला जाता था. आज दहेज नहीं, इंसानो का लालच बोल रहा है क्योंकि अब रोजगार के अवसर कम और बेरोजगारी अधिक बढ़ गई है, जिस कारण लोगों को लगता है कि पैसा जितना मिल जाए और जैसा मिल जाए वही ठीक है. इसके लिए लड़की पक्ष पर अधिक दहेज देने के लिए दबाब भी डाला जाता है और कम दहेज़ लाने वाली लड़कियों के साथ शोषण और अत्याचार किया जाता है. इसलिए ये सामाजिक बुराई अब पूर्ण रूप से गैर क़ानूनी अपराध में बदल गया है.’

देश में दहेज के खिलाफ सबसे पहले 1961 में दहेज निरोधक क़ानून बना, इसके बाद समय समय पर इसमें संशोधन कर इसे और अधिक सख्त बनाया गया ताकि दहेज के नाम पर महिलाओं को किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक अत्याचार से बचाया जा सके. इसका प्रभाव भी देखने को मिला है. लेकिन जिस प्रकार से इसके परिणाम की आशा की जानी चाहिए थी वह आज भी नज़र नहीं आता है. भले ही शहरी क्षेत्रों में जागरूकता के कारण महिलाएं जेल भेज कर दहेज़ लोभियों को सबक सिखा देती हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रतिशत अभी भी काफी कम है. दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में इस बुराई को रीति रिवाजों का नाम दे दिया जाता है. लेकिन बेहतर यह होगा कि जो रिवाज लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता हों, उसके विरुद्ध समाज को जागरूक किया जाए. यह आलेख संजॉय घोष मीडिया अवार्ड 2023 के तहत लिखा गया है. (चरखा फीचर)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
kolaybet
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş