…..तो क्या इतिहास मिट जाने दें ? अध्याय 1 ख अतीत के उजालों को प्रस्तुत करना होगा

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   पंथनिरपेक्षता की अवधारणा में किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का तब उल्लंघन नहीं होता जब देश अपने गौरवपूर्ण अतीत को उद्घाटित और प्रस्तुत करने के लिए इतिहास को दोबारा लिखने का परिश्रम करना चाहता हो या उन ऐतिहासिक स्थलों के नामों को फिर से बदलने की कवायद करने की इच्छा रखता हो, जिनके नाम परिवर्तन से हम अपने इतिहास की गौरवपूर्ण धारा से जुड़ने में सफल हो सकते हैं। हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि संसार में जितने भर भी सिद्धांत प्रचलित हैं उन सबके अपने-अपने अपवाद भी होते हैं। यदि वर्तमान संसार में यह सिद्धांत प्रचलित है कि हम अतीत की ओर लौट नहीं सकते तो इस सिद्धांत का भी अपवाद है। हम जानते हैं कि इतिहास बनाया ही इसलिए जाता है कि हम समय आने पर उससे शिक्षा लें और अपना आत्म निरीक्षण करते समय पीछे लौटकर इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं की ओर अवश्य देखते रहें। यदि भारत के इतिहास को वर्तमान समय में निराशाजनक ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है तो निराशा की घोर निशा हमें इस बात के लिए प्रेरित करती है कि हम अतीत के उजालों की ओर देखें और उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें। यह बात तभी संभव है जब हम अपनी गुलामी के प्रतीक सभी चिह्नों अर्थात बलात ढंग से ऐतिहासिक स्थलों के रखे गए नामों के कलंक को साफ करें और उनके वास्तविक इतिहास को जानें - समझें।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  इस संदर्भ में हम यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि जिस याचिका पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपना यह आदेश दिया है उसमें याचिकाकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से कहा गया था कि क्रूर विदेशी आक्रांताओं ने कई जगहों के नाम बदल दिए। उन्हें अपना नाम दे दिया। आज़ादी के इतने वर्ष पश्चात भी सरकार उन जगहों के प्राचीन नाम फिर से रखने को लेकर गंभीर नहीं है। उपाध्याय ने यह भी कहा था कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व की हज़ारों जगहों के नाम मिटा दिए गए याचिकाकर्ता ने शक्ति पीठ के लिए प्रसिद्ध किरिटेश्वरी का नाम बदल कर हमलावर मुर्शिद खान के नाम पर मुर्शिदाबाद रखने, प्राचीन कर्णावती का नाम अहमदाबाद करने, हरिपुर को हाजीपुर, रामगढ़ को अलीगढ़ किए जाने जैसे कई उदाहरण याचिका में दिए थे।

याचिकाकर्ता ने शहरों के अलावा कस्बों के नामों को बदले जाने के भी कई उदाहरण दिए थे. उन्होंने इन सभी जगहों के प्राचीन नाम की बहाली को हिंदुओं के धार्मिक, सांस्कृतिक अधिकारों के अलावा सम्मान से जीने के मौलिक अधिकार के तहत भी ज़रूरी बताया था। याचिका में अकबर रोड, लोदी रोड, हुमायूं रोड, चेम्सफोर्ड रोड, हेली रोड जैसे नामों को भी बदलने की ज़रूरत बताई गई थी।
जस्टिस के एम जोसेफ और बी वी नागरत्ना की बेंच ने याचिका में लिखी गई बातों को काफी देर तक पढ़ा। इसके बाद जस्टिस जोसेफ ने कहा, “आप सड़कों का नाम बदलने को अपना मौलिक अधिकार बता रहे हैं? आप चाहते हैं कि हम गृह मंत्रालय को निर्देश दें कि वह इस विषय के लिए आयोग का गठन करे?” अपने मामले की स्वयं पैरवी कर रहे उपाध्याय ने कहा, “सिर्फ सड़कों का नाम बदलने की बात नहीं है। इससे अधिक आवश्यक है इस बात पर ध्यान देना कि हज़ारों जगहों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का काम विदेशी हमलावरों ने किया। प्राचीन ग्रन्थों में लिखे उनके नाम छीन लिए। अब वही नाम दोबारा बहाल होने चाहिए।”
जस्टिस जोसेफ ने कहा, “आपने अकबर रोड का नाम बदलने की भी मांग की है। इतिहास कहता है कि अकबर ने सबको साथ लाने की कोशिश की । इसके लिए दीन – ए- इलाही जैसा अलग धर्म लाया।” माननीय न्यायालय की इस कथन पर श्री उपाध्याय ने जवाब दिया कि इसे किसी सड़क के नाम तक सीमित न किया जाए, जिन लोगों ने हमारे पूर्वजों को अकल्पनीय तकलीफें दीं। जिनके चलते हमारी माताओं को जौहर (जीते जी आग में कूद कर जान देना) जैसे कदम उठाने पड़े, उन क्रूर यादों को खत्म करने की ज़रूरत है।’
बेंच की सदस्य जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हम पर हमले हुए, यह सच है, क्या आप समय को पीछे ले जाना चाहते हैं? इससे आप क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या देश में समस्याओं की कमी है? उन्हें छोड़ कर गृह मंत्रालय अब नाम ढूंढना आरंभ करे?” जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, ‘हिंदुत्व एक धर्म नहीं, जीवन शैली है। इसमें कट्टरता की जगह नहीं है। हिंदुत्व ने मेहमानों और हमलावरों सब को स्वीकार कर लिया। वह इस देश का हिस्सा बनते चले गए। बांटो और राज करो की नीति अंग्रेजों की थी। अब समाज को बांटने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।’

हिंदुत्व में कट्टरता नहीं है तो,…..

 माना कि हिन्दुत्व में कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं है। परंतु अपने सांस्कृतिक मूल्यों और ऐतिहासिक विरासत की रक्षा करना तो प्रत्येक जाति और प्रत्येक देश का अपना विशेष मौलिक अधिकार है। उस विशेष मौलिक अधिकार पर यदि आज भी हिंदुत्व की कट्टरता की छवि ना होने के कारण हमला हो रहा है या अतीत में हुए हमलों के कारण उसे धूमिल करने का आज भी प्रयास किया जा रहा है तो हिंदुत्व की कट्टरवादी छवि न होने की प्रशंसा करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए था कि वह देश और देश के बहुसंख्यक समाज को अपने इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर पर काम करने की छूट देने का समर्थन करता। देश के जिन वर्गों, समुदायों या मजहबों की कट्टरवादी छवि है या जो मीठी छुरी के साथ देश के बहुसंख्यक समाज को मिटाने के कामों में लगे हुए हैं, क्या माननीय सर्वोच्च न्यायालय उनके इरादों के प्रति भी गंभीर है ? या धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की रक्षा का समर्थन करते हुए उन्हें अपरिमित और असीमित अधिकार देने की सोच का समर्थन करता है ? माननीय सर्वोच्च न्यायालय से हमारा विनम्र अनुरोध रहेगा कि उनके इरादों पर भी धर्मनिरपेक्ष भारत में प्रतिबंध लगाने का काम होना चाहिए। इसकी पहल यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय करता है तो यह निश्चय ही भारत के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण निर्णय होगा।
     यहां पर यह प्रश्न भी बहुत आवश्यक हो गया है कि यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस बात से सहमत हैं कि अतीत में विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमणों के कारण और उनकी क्रूरता व अत्याचारपूर्ण नीति के चलते भारत के गौरवपूर्ण इतिहास को मिटाया गया और अनेक ऐतिहासिक स्थलों के नाम परिवर्तित किए गए तो क्या मिटाए जा रहे इतिहास को मिट जाने दें और उस पर कोई भी ऐसा कार्य न किया जाए जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवपूर्ण अतीत पर उत्सव मना सकें?

हम इस सिद्धांत की उपेक्षा नहीं कर सकते कि कोई भी देश और उस देश के निवासी अपने आपको दूसरे देश के अधीन तब तक नहीं कर सकते जब तक वे अपने आपको उस आक्रमणकारी से श्रेष्ठ मानते रहते हैं। भारत ने विदेशी आक्रमणकारियों से सदियों तक संघर्ष किया और केवल इसलिए किया कि वह अपने आपको प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी जाति से श्रेष्ठ मानता था। क्या श्रेष्ठता के उस भाव को आज हम धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ा कर अपने पूर्वजों के पुरुषार्थ और पराक्रम को भुला दें ?

डॉ राकेश कुमार आर्य

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