मालवा अंचल का शिक्षा और कला का ऐतिहासिक गौरव : सरस्वती प्रकट स्थल “भोजशाला”

मालव अर्थात लक्ष्मी का निवास ‘मालवा’ अपनी अनेकानेक भौगोलिक , सांस्कृतिक और ऐतिहासिक खूबियों के कारण विश्व प्रसिद्ध है। इन प्रसिद्धियों में चार चांद लगाती है धार स्थित राजपूत शैली की परमार कालीन भूमज शैली में निर्मित भोजशाला। जिसका गौरवशाली विशेषता यह है कि इसका आकार “स्वस्तिकाकार ताराकृत है।जिसे सरस्वती मंदिर, भोज का कमरा, मध्य प्रदेश की अयोध्या और ज्ञान की देवी सरस्वती का प्रकट स्थल आदि नामों से भी पुकारा जाता है। भोज मंदिर अर्थात भोजशाला का निर्माण काल 11 वीं सदी माना जाता है । जिसकी स्थायी शुकनासा,धण्टाकृति की छत तथा चौकोर स्तंभ शोभायमान है। तक्षशिला और नालंदा के बाद भारत में तीसरे स्थान पर विराजमान होने का कोई हकदार है, तो वह है धार की भोजशाला। प्राचीन ज्ञान- विज्ञान का विधिवत पठन-पाठन, शोध एवं विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था के संदर्भ में यह स्थान विश्वविद्यालय की श्रेणी में आता है।
शिलालेख एवं इतिहास में दर्ज तथ्य एवं साक्ष्य दर्शाते हैं कि यह स्थान मां सरस्वती का प्रकट स्थल है तथा विश्व का प्रथम संस्कृत अध्ययन- अध्यापन का केंद्र रहा है। ज्ञात तथ्यों के अनुसार भोजशाला स्थली पर लगभग 500 से अधिक विद्यार्थी एवं शोधकर्ता अध्यात्म, राजनीति, आयुर्वेद, व्याकरण, ज्योतिषी, कला, संगीत, योग, दर्शन, आदि तत्कालीन प्रचलित विषयों के अध्ययन अध्यापन के साथ ही साथ वायुयान, जलयान तथा स्वचलित यंत्र जैसे विषय का भी अध्ययन करते थे तथा राजा भोज जो कि स्वयं जलयान निर्माण, बांध निर्माण, भूमिगत जल स्तर तथा कालगणना में पारंगत थे, शिक्षण कार्य में भाग लिया करते थे।
धार की भोजशाला के बारे में अनेक विद्वानों का मत है कि ज्ञान की देवी ‘वाग्मिता’ इसी स्थल पर फागुन मास की वसंत पंचमी को प्रकट हुई थी। यही कारण है कि विश्व भर के तत्कालीन राजाओं में “राजा भोज” मां सरस्वती के वरदहस्त के कारण 72 कलाओं और 36 तरह के आयुध निर्माण में पारंगत थे।
वास्तुकला के साक्ष्यों के आधार पर मान्यता है कि भोजशाला का निर्माण राजपूत शैली में हुआ है । 84 स्तंभों के सहारे बनी यह भोजशाला जिसके प्रत्येक स्तंभ पर सुंदर नक्काशी की गई है। किसी समय स्तंभ,छत और प्रांगण रमणीय बेल बूटे, दीवार पर बने छोटे-छोटे बुर्ज, धनुषाकार मेहराब जहां एक आले के भीतर दूसरा आला बना हुआ होता है, राजशाही ठाठ से सुशोभित हुआ करते थे । मुख्य द्वार विशाल गुंबद कमानीदार 10 पूर्ण एवं दो अर्थ स्तंभों पर आधारित है ।
वाग्देवी को समर्पित यह मंदिर पूर्वी, दक्षिणी तथा उत्तरी बरामदे में 16 – 16 कलापूर्ण स्तंभ समूह पर खड़ा है। दक्षिण व उत्तर छोर पर आकर्षक मंचिकाएं बनी हुई है। भोजशाला का मुख्य द्वार पूर्ववर्ती है। उत्तर की ओर दो द्वार हैं। एक द्वार जिसे बड़ा द्वार कहा जाता है, 12 चौकोर स्तंभों के सहारे बना हुआ है। जिसके ऊपर एक विशाल नक्काशीदार धनुषाकार गुंबद बना हुआ है। दूसरा छोटा द्वार चार स्तंभों के सहारे बना हुआ है तथा इसके ऊपर का गुंबद बहुत ही आकर्षक है। दरवाजों के आगे भित्ति शीर्ष पर काले पत्थर लगाकर अंकुरे तथा लाल बलुआ पत्थर को जोड कर कपोत अर्थात कबूतर आकार की तालीकाएं बनी हुई हैं। पश्चिमी भाग में स्तंभों की पांच पंक्तियां हैं। प्रायः एक स्तंभ से दूसरे स्थान की दूरी 6 फीट 4 इंच है। भोजशाला का किवला अर्थात धनुषाकार मेहराब अत्यधिक कला पुर्ण है। इसे रथ पर सवार देवी देवताओं की प्रतिमा और स्तंभों पर सूक्ष्म बेल बूटे से सुसज्जित किया गया है।
मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर भोजशाला का विस्तार होता है। द्वार के ठीक सामने दूसरी छोर पर मां सरस्वती का प्रकट स्थान है। भोजशाला के बीचों बीच हवन कुंड बना हुआ है। छोटे द्वार और बड़े द्वार के बीच की दिवार पर आस पास के क्षेत्र से प्राप्त संस्कृत में लिखी गई पट्टीकाएं सुशोभित की गई है।
मालवा की अयोध्या कही जाने वाली भोजशाला दिल्ली से 860, भोपाल से 263, महेश्वर से 102, खरगोन से 121, झाबुआ से 86, इंदौर से 64 और मांडव गढ़ से 35 किलोमीटर की दूरी पर 22 डिग्री 1 इंच उत्तरी अक्षांश तथा 75 डिग्री 3 इंच दक्षिणी देशांतर पर स्थित है।
🚩व्यर्थ नहीं जाएगा 1514 ईस्वी का 1400 हिन्दूओं का बलिदान🚩
मालवा की धरती पर 13 वीं एवं 14 वीं सदी में मुगलों का आक्रमण शुरू हुआ और 1456 में महमूद खिलजी ने धार भोजशाला को तोड़कर मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण कराया था। तब 1400 विद्वानों और हिंदुओं ने मिलकर इस नाजायज निर्माण का पूरजोर विरोध किया था। विरोध का प्रमुख कारण यह था कि मौलाना कमालुद्दीन की मौत अहमदाबाद में हुई थी। लेकिन खिलजी ने उसके मकबरे का स्थान धार की भोजशाला चुना था। इस क्रूर आक्रांता ने निहत्थे विरोध करने वाले 1400 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था। और तभी से मां सरस्वती की जन्मस्थली भोजशाला को मुक्त कराने की हिंदुओं ने कसम खाई थी और तभी से ही समय-समय पर आंदोलन होते रहे।

स्वतंत्रता के बाद भोजशाला मुक्ति को लेकर पहला संगठित आंदोलन 1995 में हुआ था । जिसके परिणाम स्वरुप प्रशासन ने प्रत्येक मंगलवार को हिंदुओं को पूजा अर्चना करने और शुक्रवार को मुसलमान को नमाज पढ़ने की अनुमति दी थी। 1997 में अचानक दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार की चालबाजी के कारण प्रशासन ने भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी और हिंदुओं को वर्ष में केवल एक बार वसंत पंचमी पर पूजा अर्चना की अनुमति दी तथा इसके विपरीत मुसलमानों पर मेहरबान कांग्रेस सरकार ने प्रति शुक्रवार एक से तीन बजे तक नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। इस दोहरे चरित्र वाले निर्णय से हिंदू समाज दुःखी और आहत हुआ और फिर न्यायालय की लड़ाई शुरू हुई। 12 में 1997 को दिग्विजय सिंह सरकार का मुंह काला हुआ और माननीय न्यायालय ने 18 फरवरी को हिंदुओं को फिर से पूजा अर्चना करने की अनुमति दी। 2003 में जब सुश्री उमा भारती की सरकार थी तब हिंदुओं की मांग पर उमा भारती सरकार ने लंदन में के म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को लाने की पुरजोर मांग की और एकत्रित हिंदू समुदाय ने संकल्प लिया : भोजशाला पूर्ण मुक्ति तक आंदोलन जारी रखने का !! जिसका ही परिणाम है माननीय उच्च न्यायालय इंदौर खंडपीठ आदेश :धार स्थित भोजशाला का सर्वेक्षण और वस्तुस्थिति को न्यायालय के सामने रखना !!

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

लेखक सम्राट विक्रमादित्य विद्वज्जन परिषद विक्रम विश्वविद्यालय के सदस्य तथा समरसता एवं लेखन आयाम से संबंधित है।

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