ओ३म् -वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में सामवेद पारायण यज्ञ सम्पन्न- “हमारा यह ब्रह्माण्ड परमात्मा द्वारा बहुत व्यवस्थित बनाया गया हैः डा. वेदपाल”

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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
वैदिक साधन आश्रम, तपोवन, देहरादून में दिनांक 11 मार्च, 2024 से आरम्भ 7 दिवसीय सामवेद पारायण एवं गायत्री महायज्ञ आज रविवार दिनांक 17-3-2024 को सोल्लस सम्पन्न हुआ। यज्ञ के ब्रह्मा प्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य डा. वेदपाल जी थे। यज्ञ में स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, स्वामी योगेश्वरानन्द सरस्वती, पं. सूरतराम जी का सान्निध्य भी याज्ञिक ऋषिभक्तों को प्राप्त रहा। यज्ञ में मंत्रोच्चार प्रसिद्ध वैदिक आर्ष गुरुकुल, पौंधा-देहरादून के ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञ चार यज्ञ कुण्डों में सम्पन्न किया गया। यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य डा. वेदपाल जी ने सृष्टि रचना की चर्चा करते हुए इसके कई सरल उदाहरण यज्ञ में उपस्थित छात्र-छात्रओं को दिए। उन्होंने पहले पौरुषेय रचनाओं पर प्रकाश डाला। आचार्य जी ने बताया किसी वस्तु के निर्माण के लिए कर्ता, कार्य व कार्य को बनाने वाली सामग्री की आवश्यकता होती है। पृथिवी चल रही है परन्तु हमें पता नहीं चलता। कार से कहीं जाते हैं तो हमें पता चलता है कि हमारी गाड़ी जिसमें हम बैठे हैं वह चल रही है व हिल-डुल भी रही है। सृष्टि वा पृथिवी के चलने का पता न चलना कर्ता परमेश्वर की विशेषता है। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा दिखाई नहीं देता। हम केवल अपनी आंखों से रूप को देखते हैं। अन्य गुणों को हम अपनी इतर ज्ञानेन्द्रियों से देखते व अनुभव करते हैं। रसना से हम सब स्वाद को देखते हैं। गन्ध को नासिका से देखते हैं। शीतलता व उष्णता का ज्ञान हमें अपनी त्वचा वा स्पर्शेन्द्रिय से होता है। इन्द्रियों से होने वाले इस ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहा जाता है। आचार्य डा. वेदपाल जी ने बताया कि ईश्वर का भी प्रत्यक्ष होता है। उन्होंने कहा कि आंखों से ईश्वर का प्रत्यक्ष नहीं होता क्योंकि परमात्मा में रूप नहीं है। ईश्वर में घटने वाली इस प्रकार की अनेक बातों का उल्लेख आचार्य जी ने सरल उदाहरण देकर श्रोताओं को समझाया।

डा. वेदपाल जी ने कहा कि यदि हमारा अन्तःकरण मैला है तो हम परमात्मा को नहीं देख सकते जैसे कि दर्पण पर आवरण वा मल होने पर हम स्वयं का चित्र दर्पण नहीं देख पाते। वि़द्वान आचार्य ने कहा कि यह ब्रह्माण्ड बहुत व्यवस्थित बना हुआ है। परमात्मा ने यह सृष्टि हमारे व अन्य प्राणियों के सुख के लिए बनाई है। हमें सन्ध्योपासना आदि के द्वारा प्रतिदिन प्रातः व सायं उसका धन्यवाद करना चाहिये। हमारा शरीर हमें परमात्मा से ही मिला है इस कारण भी हमें परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिये। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम कृतघ्न होते हैं। आचार्य वेदपाल जी ने श्रोताओं को वैदिक साधन आश्रम तपोवन का धन आदि साधन देकर सहयोग करने की अपील की। उन्होंने कहा कि आप अपने परिवार के सदस्यों के जन्म दिवसों के अवसर पर आश्रम को प्रभूत धन दान दिया कीजिये। ऐसा करने से आपका धन कम न होकर वृद्धि को प्राप्त होगा। 
स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि प्रभु ने बहुत बड़ी सृष्टि का निर्माण हमारे लिये किया है। परमात्मा ने सबसे महत्वपूर्ण वस्तु हमें बुद्धि दी है। परमात्मा ही है जो हमारी माता के गर्भ में हमारे शरीर को बनाता तथा उसमें हमारी आत्मा को बैठाता है। परमात्मा को नेत्र आदि इन्द्रियां से नहीं अपितु अपनी आत्मा से जाना जाता है। आत्मा और शरीर के संयोग को जीवन और वियोग को मृत्यु कहते हैं। आत्मा सदा से है और सदा रहने वाला है। कोई कार्य जो किया जाता है या वस्तु बनाई जाती है वह सदा रहने वाली नहीं होती। हमारा शरीर पंचतत्वों से बना हुआ कार्य है। यह हमेशा नहीं रहेगा। 

ईश्वर हमें हमेशा प्राप्त है। वह हर पल व हर काल में हमें प्राप्त है। ईश्वर सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी है। दूध में मक्खन की तरह ईश्वर संसार में व्यापक है। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने बताया कि ईश्वर न्यायकारी है। हमें ईश्वर के न्याय से डरना चाहिये और कोई भी बुरा या अवैदिक कार्य नहीं करना चाहिये। हमें वेद में बताये गये अपने सभी कर्तव्यों वा पंचमहायज्ञों का विधिवत पालन करना चाहिये। परमात्मा हमारा मित्र एवं सखा भी है। वह हमेशा हमारे साथ रहता है और हमारी रक्षा करता है। स्वामी जी ने कहा कि हमें मन, वचन व कर्म से किसी मनुष्य वा प्राणी को दुःख नहीं देना चाहिये। सबके प्रति हमें अच्छा, दया व करूणा का व्यवहार करना चाहिये। विद्वान संन्यासी चित्तेश्वरानन्दजी ने कहा कि हम जैसी संगति करेंगे वैसे ही हम बनेंगे। हम जो सम्पत्ति वा धन अर्जित कर रहे हैं वह हमारे साथ नहीं जायेगी। हमें अपनी सम्पत्ति का सदुपयोग करना चाहिये और नियमित रूप से दान आदि के द्वारा सुपात्रों को इसका वितरण करना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि हम धर्म का पालन करते हुए जो धन व संस्कार आदि अर्जित करते हैं वह संस्कारों के रूप में हमारे साथ जाते हैं और इसी के आधार पर हमें भविष्य में जन्म व साधन प्राप्त होते हैं। हमें कभी कोई गलत काम नहीं करना चाहिये। इससे हमारा परजन्म सुधरेगा, बिगड़ेगा नहीं। हमें अपने किए प्रत्येक कर्म का फल कालान्तर में भोगना पड़ेगा। 

आश्रम के प्रधान श्री विजय आर्य जी ने सभी विद्वानों एवं श्रोताओं का धन्यवाद किया। उन्होंने डा. वेदपाल जी, स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, स्वामी योगेश्वरानन्द सरस्वती, पं. सूरत राम जी तथा मंत्रपाठी ब्रह्मचारियों को वस्त्र एवं दक्षिणा देकर सम्मानित किया। आज अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला जी का 62वां जन्म दिवस था। इसे भी मनाया गया। वैदिक साधन आश्रम तपोवन, इसके यशस्वी प्रधान श्री विजय आर्य जी, मंत्री इंजीनियर श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी तथा इसके सदस्यों के सात्विक तप से उन्नति कर रहा है। आश्रम के सभी अधिकारी, सदस्य एवं कर्मचारी पूरी निष्ठा से अपने दायित्वों का सम्पादन करते हैं। आश्रम के प्रबन्धक श्री विजेश गर्ग एवं एक पुराने कर्मचारी श्री राममूर्ति जी का योगदान सराहनीय है। यह भी बता दें कि आश्रम का आगामी ग्रीष्मोत्सव 15 मई से 19 मई 2024 तक मनाया जायेगा। इस वर्ष आश्रम का 75 वां स्थापना दिवस है। इस अवसर पर इस आश्रम के संस्थापक बाबा गुरुमुख सिंह जी का स्मृति दिवस भी समारोहपूर्वक मनाया जा रहा है। ओ३म् शम्। 

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला

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