भारत में ऐसे गढा जा रहा है झूठा विमर्श

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भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विकास से सम्बंधित हाल ही में जारी किया गए आंकड़ों को देखने के पश्चात ध्यान में आता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब पटरी पर तेजी से दौड़ने लगी है। परंतु, देश के मीडिया में भारत के आर्थिक क्षेत्र में लगातार बन रहे नित नए रिकार्ड का जिक्र कहीं भी नहीं है। इसके ठीक विपरीत देश में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ रहे हैं, गरीब अति गरीब की श्रेणी में जा रहा है, मुद्रा स्फीति की दर अधिक हो रही है, भुखमरी बढ़ रही है, हिंसा बढ़ रही है, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं, आदि विषयों पर विमर्श गढ़ने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है।

भारत में झूठे विमर्श गढ़ने का इतिहास रहा है। अंग्रेजों के शासन काल में भी कई प्रकार के झूठे विमर्श गढ़ने के भरपूर प्रयास हुए थे जैसे पश्चिम से आया कोई भी विचार वैज्ञानिक एवं आधुनिक है, भारत सपेरों का देश है एवं इसमें अपढ़ गरीब वर्ग ही निवास करता है, सनातन भारतीय संस्कृति रूढ़िवादी एवं अवैज्ञानिक है, शहरीकरण विकास का बड़ा माध्यम है अतः ग्रामीण विकास को दरकिनार करते हुए केवल शहरीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, शहरी, ग्रामीण एवं जनजातीय के बीच में आर्थिक विकास की दृष्टि से शहरी अधिक महत्व के क्षेत्र हैं, विदेशी भाषा को जानने के चलते नागरिकों में आत्मविश्वास बढ़ता है, संस्कृति से अधिक तर्क को महत्व दिया जाना चाहिए, व्यक्ति एवं समश्टि में व्यक्ति को अधिक महत्व देना अर्थात व्यक्तिवाद को बढ़ावा देना चाहिए (पूंजीवाद की अवधारणा), कम श्रम करने वाला व्यक्ति अधिक होशियार माना गया, सनातन हिन्दू संस्कृति पर आधारित प्रत्येक चीज को हेय दृष्टि से देखना, जैसे दिवाली के फटाके पर्यावरण का नुक्सान करते हैं, होली पर्व पर पानी की बर्बादी होती है। कुल मिलाकर पश्चिमी देशों द्वारा आज सनातन भारतीय संस्कृति पर आधारित हिन्दू परम्पराओं पर लगातार प्रहार किए जा रहे हैं।

पश्चिमी देशों एवं कई विदेशी संस्थानों द्वारा भारत के विरुद्ध गढ़े जा रहे विमर्श के विपरीत भारत लगातार आर्थिक क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत के विकास में सेवा क्षेत्र का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि देश के सकल घरेलू उत्पाद में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सेवा क्षेत्र का ही रहता है एवं रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने में भी सेवा क्षेत्र का अहम स्थान है और इससे जुड़ी सर्विस पीएमआई के माह जुलाई 2023 के आंकड़े आ गए हैं। एसएंडपी ग्लोबल का इंडिया सर्विसेज पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई का स्तर जुलाई में 62.3 पर रहा है जो कि पिछले 13 वर्षों का उच्च स्तर है और इसके जरिए भारत के सेवा क्षेत्र में हो रहे शानदार विकास का पता चलता है। सेवा क्षेत्र से निर्यात भी बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। सेवा निर्यात संवर्द्धन परिषद (एसईपीसी) ने यह उम्मीद जताई है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत से सेवाओं का निर्यात 400 अरब डॉलर पर पहुंच सकता है। वाणिज्य मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत से सेवा क्षेत्र में निर्यात वित्तीय वर्ष 2021-22 के 254 अरब डॉलर से 42 प्रतिशत अधिक अर्थात 323 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। परिषद के चेयरमैन ने कहा है कि वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए सेवा क्षेत्र से 300 अरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा गया था जबकि वास्तव में यह 323 अरब डॉलर का रहा है।

कर संग्रहण के क्षेत्र में भी भारत में नित नए रिकार्ड बनाए जा रहे हैं। जुलाई 2023 माह में वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण 11 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित करते हुए 1.65 लाख करोड़ रुपए का रहा है, जो जुलाई 2022 माह में 1.49 लाख करोड़ रुपए का एवं जून 2023 माह में 1.61 लाख करोड़ रुपए का रहा था। वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए केंद्र सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण के लिए 9.56 लाख करोड़ रुपए का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसी प्रकार, वित्तीय वर्ष 2022-23 से सम्बंधित आय कर रिटर्न दाखिल करने वाले नागरिकों की संख्या 31 जुलाई 2023 तक 6.77 करोड़ हो गई है, जो वित्तीय वर्ष 2021-22 से सम्बंधित फाइल किए गए 5.83 करोड़ रिटर्न की तुलना में 16.1 प्रतिशत अधिक है। हर्ष का विषय यह है कि इस वर्ष 53.67 लाख नागरिकों ने पहली बार आय कर रिटर्न दाखिल किया है, अर्थात भारत में अब कर जमा करने के सम्बंध में जागरूकता बढ़ रही है एवं गरीब वर्ग अब मध्यम वर्ग की श्रेणी में आ रहा है। भारत में माह जुलाई 2023 में ऊर्जा का उपभोग 8.4 प्रतिशत बढ़कर 13,900 करोड़ यूनिट्स के स्तर को पार कर गया है, जो अपने आप में एक रिकार्ड है।

भारत में आर्थिक गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ रही है यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि भारत में बैंकों द्वारा प्रदत्त किए जा रहे ऋणों में जबरदस्त उछाल दृष्टिगोचर है। जून 2023 माह में बैकों के गैर खाद्यान ऋणों में 16.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि मई 2023 माह में 15.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। कृषि क्षेत्र में 20 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र में 27 प्रतिशत एवं उद्योग क्षेत्र में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। साथ ही, जून 2023 माह में भारत के 8 मूलभूत क्षेत्रों द्वारा 8.2 प्रतिशत की वृद्धि अर्जित की गई है। स्टील उद्योग ने तो 21.9 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की है, वहीं कोयला एवं सिमेंट क्षेत्र में भी वृद्धि दर का आंकड़ा दहाई से भी अधिक का रहा है। 8 में से 7 क्षेत्रों में वृद्धि दर अच्छी रही है।

भारत इस्पात उत्पादन के क्षेत्र में जापान को पीछे छोड़ते हुए आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश बन गया है। भारत द्वारा इस्पात के क्षेत्र में आयात को कम करके 34,800 करोड़ रुपये बचाए गए हैं क्योंकि भारत में लगभग 6 करोड़ टन कच्चे इस्पात की क्षमता को जोड़ा गया है। भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता वर्ष 2014-15 में 109.85 मीट्रिक टन थी जो वर्ष 2022-23 में बढ़कर 160.30 मीट्रिक टन हो गई है। इस प्रकार, अब इस्पात का कुल उत्पादन 88.98 मीट्रिक टन से बढ़कर 126.66 मीट्रिक टन हो गया है।

भारत द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में लगातार प्राप्त की जा रही विभिन्न उपलब्धियों को दरकिनार करते हुए, भारत के बारे में भ्रांतियां फैलाई जाती रही हैं। जैसे, भारतीय कुछ नया करे तो उसे ‘जुगाड़’ कहा जाता है और चीन यदि कुछ नया करे तो ‘रिवर्स इंजिनीयरिंग। पश्चिम का प्रत्येक कदम वैज्ञानिक है, परंतु भारतीय आयुर्वेद को हर बात सिद्ध करने की आवश्यकता होती है। पश्चिम का अधूरा अध्ययन भी साइन्स की श्रेणी में है, परंतु भारत के कई प्राचीन वैज्ञानिक तथ्य भी रूढ़िवादी माने जाते हैं। पश्चिमी विचारधारा में व्यक्ति की भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं है, केवल तकनीकी के बारे में ही विचार किया जाता है। इसी प्रकार से भारत में बाल श्रम को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा हो हल्ला मचाया जाता है किंतु उनके अपने देशों में कई प्रतियोगिताओं में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी भाग लेते हैं, परंतु उनकी दृष्टि में यह बाल श्रम की श्रेणी में नहीं आता है। भारत में यदि 16 वर्ष की कम उम्र के बच्चे अपने पारम्परिक व्यवसाय की कला में पारंगत होना प्रारम्भ करें तो यह बाल श्रम की श्रेणी में माना जाता है। भारत के संदर्भ में यह दोहरी नीति का विमर्श क्यों खड़ा किया जाता है।

पश्चिमी देशों द्वारा भारत के विरुद्ध चलाए जा रहे इस अभियान (झूठे विमर्श) को आज तोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए उनके प्रत्येक विमर्श को अलग अलग रखकर भिन्न भिन्न तरीकों से तोड़ना होगा। जैसे किसी विज्ञापन में भारतीय परम्पराओं का निर्वहन करने वाली महिला यदि बिंदी नहीं लगाएगी तो उस उत्पाद को नहीं खरीदेंगे, यदि किसी फिल्म में भारतीय संस्कृति एवं आध्यातम का मजाक उड़ाया जाता है तो उस फिल्म का भारतीय समाज बहिष्कार करेगा। भारतीय त्यौहारों के विरुद्ध किये जा रहे प्रचार, जैसे दिवाली पर फटाके जलाने से पर्यावरण को नुक्सान होता है, होली पर पानी की बर्बादी होती है, शिवरात्रि पर दूध बहाया जाता है, आदि के विरुद्ध भी उचित प्रतिकार किया जाना चाहिए। यह हमें समझना होगा कि भारतीय परम्पराएं आदि-अनादि काल से चली आ रही हैं और यह संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत पर विश्वास करती है। अतः पूरे विश्व में यदि शांति स्थापित करना है तो भारतीय संस्कृति पर आधारित दर्शन ही इसमें मददगार हो सकता है, इससे पूरे विश्व की भलाई होगी।

प्रहलाद सबनानी
सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – psabnani@rediffmail.com

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