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मुसलमानों के हितों पर कुठाराघात नहीं करता सीएए कानून

             प्रभुनाथ शुक्ल

नागरिकता संशोधन कानून यानी सिविल एबेडमेंड एक्ट (सीएए) आखिरकार देश में लागू हो गया है। इस कानून को लागू करना क्या मोदी सरकार की मजबूरी थी। यह कानून क्या इतना आवश्यक था कि लोकसभा चुनाव के ठीक पहले लागू किया जाता। क्या यह कानून पूरी तरह से पारदर्शी और देश के हित में है। क्या भारीतय मुसलमानों की नागरिकता पर इस कानून का कोई असर पड़नेवाला है। अगर ऐसा नहीं है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध क्यों किया जा रहा है। विपक्ष सरकार पर सवाल खड़े क्यों कर रहा है। देश के मुसलमानों को डराया क्यों जा रहा है। हिंदुत्व और संघ का एजेंडा इसे क्यों बताया जा रहा।

विपक्ष इस कानून पर भ्रम क्यों फैला रहा है। क्या चुनावी लाभ के लिए विपक्ष मुसलमानों में असुरक्षा की भावना पैदा करना चाहता है। क्या मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस कानून के संबंध में भ्रामक प्रचार किया जा रहा है ?

सवाल उठता है की क्या मोदी सरकार वास्तव में पारदर्शी रूप से इस कानून को लागू किया है। क्या सरकार कानून के जरिए हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और इसाई समुदाय का ध्रुवीकरण करना चाहती है। लोकसभा चुनाव के एन वक्त पर ऐसे कानून लाकर क्या भाजपा सीधा लाभ नहीं लेना चाहती। विपक्ष आखिर ऐसे कानून का विरोध क्यों कर रहा है। वह डर क्यों रहा है। सच तो यह है इस कानून के जरिए जहां सरकार गैर मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करना चाहती है वहीं विपक्ष मुसलमानों को सीएए का भय दिखा कर मुस्लिम वोटो का ध्रुवीकरण करना चाहता है। हालांकि यह कानून लोकसभा चुनाव के बाद भी लागू किया जा सकता था। लेकिन गृहमंत्री अमित शाह बार-बार यह कह रहे थे कि नागरिकता संशोधन कानून चुनाव के पहले लागू किया जाएगा और लागू भी कर दिया गया।

विचारणीय बिंदु यह है कि विपक्ष इस कानून को लेकर लोगों को भ्रमित क्यों कर रहा है। कानून को हिंदुत्व का एजेंडा क्यों बताया जा रहा है। क्या यह कानून एंटी मुस्लिम है। क्या इस कानून के लागू होने के बाद भारत में रहने वाले मुसलमानों की नागरिकता खत्म जाएगी। क्या देश के किसी भी नागरिक की नागरिकता समाप्त करने के लिए यह कानून लाया गया है। यह सब भ्रामक प्रचार है। इस कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। भारत में रहने वाले गैर हिंदू यानी मुसलमानों की नागरिकता पर कोई सवाल नहीं उठाता है।

यह कानून सिर्फ उन्हीं गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों नागरिकता प्रदान करेगा जो पाकिस्तान, बग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक रूप से प्रताड़ित हैं और 31 दिसम्बर 2014 से पूर्व भारत में शरणार्थी जीवन यापन कर रहे हैं। इसमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई अल्पसंख्यक शामिल हैं। कानून के लागू होने के बाद ऐसा भी नहीं होगा कि संबंधित अल्पसंख्यक भारत में आते रहेंगे और सरकार उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान करती रहेगी। वैसे यह साबित करना भी एक मुश्किल काम होगा की सम्बंधित देशों से भारत आए लोगों में कौन अल्पसंख्यक है और कौन बहु संख्यक। क्या इस कानून के लागू होने के बाद पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से अवैध रूप से आए मुस्लिम भारत में निवास कर सकते हैं जिन्हें भारतीय नागरिकता नहीं हासिल है।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर इसके पूर्व में भारी विरोध-प्रदर्शन भी हो चुका है। देश को दंगे की आग में भी झुलसना पड़ा है। लोगों को अपनी जान भी गवानी पड़ी है। दिल्ली के शाहीनबाग में लंबे समय तक धरना प्रदर्शन भी चला। इस कानून को लेकर तकरीबन 6 बार संशोधन किए जा चुके हैं। साल 2019 के पहले भारतीय नागरिकता लेने के लिए 11 साल भारत में रहना अनिवार्य था लेकिन बाद में इसे घटाकर 6 साल कर दिया गया। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तीनों मुस्लिम बहुल देश है। वहां मुस्लिम नहीं अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

धार्मिक आधार पर ऐसे देश में हिंदुओं और अन्य गैर मुस्लिम जातियों के साथ भेदभाव किया जाता है। संबंधित मुल्कों में लगातार हिंदुओं की आबादी कम हो रही है। पाकिस्तान में सिर्फ दो फिसदी बचे हैं। जबकि भारत में ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। भारत में रहने वाला मुसलमान भारत का है और वह कभी असुरक्षित महसूस नहीं करता है। सर्फ़ अंतराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों को लेकर भारत को बदनाम किया जाता है। क्या जिस तरह पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति है वैसे हालत में भारत में क्या मुसलमान हैं। देश में लगातार उसकी आबादी बढ़ रही है। ऐसी हालत में पाकिस्तान और बांग्लादेश में गैर मुस्लिम यानी हिंदुओं की आबादी क्यों कम हुई। इन देशों में रहने वाले अल्पसंख्यक पलायन को मजबूर क्यों है। धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव क्यों किया जाता है जैसे सवाल का जबाब क्या विपक्ष के पास है।

एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अब तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से तकरीबन 18 लाख से अधिक लोग भारत में शरणार्थी का जीवन यापन कर रहे हैं। इनमें सबसे अधिक 16 लाख लोग पाकिस्तान से आए हैं जबकि दो लाख लोग बांग्लादेश से और 14 हजार अफगानिस्तान से आए हैं। लेकिन इससे कहीं अधिक लोग भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। फिलहाल यह पता लगाना मुश्किल है कि इसमें कितने शरणार्थी अल्पसंख्यक और मुस्लिम है। पूर्वी भारत में सबसे अधिक मुस्लिम शरणार्थी भारी संख्या में भारत में आकर अवैध तरीके से यहां निवास कर रहे हैं। असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड में इसका भारी विरोध भी हो रहा है। क्योंकि बांग्लादेश से अत्यधिक घुसपैठ से पूर्वी राज्यों के स्थानीय निवासियों को दिक्क़त उठानी पड़ रहीं है। क्योंकि जमीन और दूसरे संसाधन पर इनका कब्जा हो रहा है। बांग्लादेश से आए लोग अवैध रूप से रह रहे हैं।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि मुसलमानों को भारतीय नागरिकता क्यों नहीं दी जाएगी। मुसलमानों को भारतीय नागरिकता क्यों दी जाए ? पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मुस्लिम देश है। जबकि गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ धार्मिक आधार पर यहाँ भेदभाव किया जाता है जिसकी वजह से वह पलायन को बाध्य होते हैं। क्या भारतीय हिंदुओं, मुसलमानों और गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए पाकिस्तान अपने देश की नागरिकता प्रदान करेगा। वहां हिंदू और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी कम क्यों हो रही है। देश में सीएए लागू होने से विपक्ष को यह लगता है कि मोदी सरकार इस कानून के जरिए सामुदायिक विभाजन कर अपना वोट बैंक बना रही है। जबकि विपक्ष मुस्लिम शरणार्थियों को खुश करने में लगा हुआ है। पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे अधिक बांग्लादेश से आए मुस्लिम शरणार्थी शामिल है।

फिलहाल लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस कानून पर सियासत शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केरल के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में सीएए कानून लागू न करने की बात कह दिया। जबकि इस कानून में ऐसी कोई बात नहीं है। भारत में रहने वाले जो भारतीय हैं उनकी नागरिकता पूरी से सुरक्षित है वह चाहे हिंदू हों या मुस्लिम। विपक्ष अनावश्यक रूप से इस मसले पर को तूल दे रहा है। हालांकि इस कानून के लागू होने से आबादी का दबाब और बढ़ेगा। क्योंकि देश पहले से आबादी की समस्या झेल रहा है। फिलहाल मोदी सरकार का यह फैसला पूरी तरह से उचित है और दूरदर्शी है। विपक्ष चुनावी मौसम में सिर्फ ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहा है।

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