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स्वास्थ्य

*आम नहीं है, आमाशय भाग २*


लेखक आर्य सागर खारी 🖋️

आमाशय के सम्बन्ध में पिछले लेख में बताया गया था 1822 तक समूचे अमेरिका यूरोप कनाडा के चिकित्सा जगत में पाचन के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं था … उन्हें नहीं मालूम था भोजन मुख में डालने के बाद प्रथम कहां जाता है?

6 जून 1822 को अमेरिका के मिशिगन प्रांत के मैकेना आइलैंड में एक दुर्घटना घटती है जो पश्चिम के चिकित्सा जगत के लिए और आज के आधुनिक मेडिकल साइंस के लिए सर्वाधिक सुखदायक घटना मानी जाती है ,अपेक्षा से।

होता यह है कि फ्रांसीसी मूल का कनाडाई एलेक्सिस सेंट मार्टिन नाम का शिकारी जो पक्षियों के फरों का व्यापार करता था , एक सुबह एक दुकान पर खड़ा हुआ था। दुकान का मालिक अपनी बंदूक की जांच कर रहा था …. अचानक बंदूक से गोली चल जाती है पास ही में 3 फुट दूर खड़े सेंट मार्टिन की पसली फेफड़ों को चीरते हुए गली पेट में घुस जाती है।

सैंट मार्टिन बेहोश होकर गिर जाता है। लोग उसे मरा हुआ मान लेते हैं लेकिन टापू पर ही बने हुए किले के एक के डॉक्टर को उसे दिखाया जाता है,जिसका नाम विलियम ब्यूमोट था। ब्यूमोट भी उसे मरा हुआ मान लेता है 36 घंटे तक ही उसके जीवित रहने की घोषणा कर देता है लेकिन चमत्कारिक ढंग से सेंट मार्टिन की जान बच जाती है। उसके डायफ्रॉम फेफड़े का घाव तो भर जाता है लेकिन पेट में 1 इंच चौड़ा छेद हो जाता है जो आजीवन नहीं भर पाता वह जो भी कुछ खाता वही भोजन रिसता था उस छेद के माध्यम से। ऐसा कह सकते हैं इस दुर्घटना के कारण उसके पेट में एक ऐसी खिड़की बन गई जिसके सहारे कोई भी उसके पेट में झांक सकता था।

धीरे-धीरे जब सेंट मार्टिन पूरी तरह ठीक हो जाता है तो डॉक्टर ब्यूमोट उसके साथ एक समझौता करता है कि वह उसकी देख रेख खाने पीने सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखेगा लेकिन वह उस पर अपने प्रयोग करेगा।

पाचन के बारे में जानने को उत्सुक डॉ विलियम सुबह होते ही रेशमी डोरी से विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री कच्ची सब्जी, मांस ,ब्रेड,फल आदि बांध कर उसके पेट में डाल देता फिर कुछ घंटे बाद निकाल कर उस भोजन पर हुई प्रतिक्रिया को देखता था.. 10 वर्षों में उसने 200 से अधिक प्रयोग सेंट मार्टिन के आमाशय पर किये 51 निष्कर्ष निकाले जिन्होंने पूरी एक सदी तक मेडिकल साइंस की गैस्ट्रोएंटरोलॉजी शाखा को स्थापित करने में पाचन क्रिया को समझने में मदद दी। कभी-कभी तो वह सेंट मार्टिन के पेट में बनने वाले पाचक रस आदि को चख भी लेता था उसने निष्कर्ष निकाला हाइड्रोक्लोरिक एसिड आमाशय में ही बनता है… उसने देखा आमाशय की सतह कफ से आच्छादित रहती है।

अपने प्रयोगों के आधार पर उसने ‘एक्सपेरिमेंटस एंड ऑब्जर्वेशंसन आन दा गैस्ट्रिक जूस एंड द फिजियोलॉजी आफ डाइजेशन’ नामक पुस्तक लिखी।

सेंट मार्टिन में अपने ऊपर प्रयोग से अधिक खुश नहीं रहता था वह कभी-कभी गायब हो जाता था एक बार तो डॉक्टर ब्यूमोट को उसे खोजने में 4 साल से अधिक का समय लग गया।

लेकिन सबसे दिलचस्प तथ्य यह है उम्र के मामले में सेंट मार्टिन ने अपने ऊपर प्रयोग करने वाले डॉक्टर को भी पीछे छोड़ दिया वह डॉक्टर से 27 साल अधिक जिया 1880 में 86 वर्ष की आयु में सेंट मार्टिन की मृत्यु हुई मरने से पूर्व वह अपने पीछे छह बच्चों नाती पोतों का भरा पूरा परिवार छोड़ कर गया।

आधुनिक मेडिकल साइंस की अनेकों शाखाएं ऐसी ही अजीबोगरीब घटनाओं से विकसित हुई है, कुछ साहसी लोगों ने जोखिम लिया।

अब आचार्य भूमि भारत पर लौट कर आते हैं क्या भारत भी आमाशय की क्रिया प्रणाली से अनभिज्ञ था? तो इसका जवाब है, जी नहीं।

हजारों वर्ष प्राचीन चरक व सुश्रुत संहिता की तो बात ही छोड़िए 16वीं 17वीं शताब्दी तक जब अंग्रेज फ्रांसीसी डच लोग भारत के ज्ञान विज्ञान धन दौलत से आकर्षित होकर यहां अपनी बस्तियां बसा रहे थे पड़ाव डाल रहे थे उसे काल में भी यहां शारंगधर संहिता ,माधव निदान, भोजन कौतुहलम जैसे ग्रंथ रचे जा रहे थे।

भारत के पीयूष पाणि गांव गली बाजार के वैद्य व्यक्ति की नाडी देखकर यह बता देते थे कि अमुक व्यक्ति ने किस प्रकार का भोजन खाया है ,भोजन विशेष से कौन सा दोष प्रकोपित हुआ है आमदोष ने किस धातु को दूषित किया है आमाशय में भोजन की अब क्या अवस्था है और रसवह श्रोत कैसे कार्य कर रहे हैं भोजन के अवस्थापाक ,निष्ठापाक में आमाशय की भूमिका आदि आदि पर विचारशील थे। सुश्रुत संहिता में तो आमाशय की शरीर में स्थिति , आमाशय की क्रिया प्रणाली आमाशय से शरीर में जाने वाली सूक्ष्म नस नाड़ियों शेष शरीर से आमाशय आने वाली नस नाड़ियों,विभिन्न जड़ी बूटियां औषधीय के द्रव्यों गुण विपाक कर्म आदि के आमाशय की क्रिया प्रणाली पर प्रभाव को लेकर बेहद व्यापक वर्णन मिलता है

वहीं पश्चिम 19वीं शताब्दी की शुरुआती दशको तक आमाशय से अपरिचित था।

लेखक आर्य सागर खारी।

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