ओ३म् -ऋषि दयानन्द बोधोत्सव (8-3-2024) पर- “शिवरात्रि पर ऋषि को हुए बोध ने वेदोद्धार कर अविद्या को दूर किया”

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ऋषि दयानन्द ने देश-विदेश को एक नियम दिया है ‘अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये’। इस नियम को संसार के सभी वैज्ञानिक एवं सभी विद्वान मानते हैं। आर्यसमाज में सभी विद्वान अनुभव करते हैं कि देश में प्रचलित सभी मत-मतान्तर इस नियम का पालन करते हुए दिखाई नहीं देते। इसी कारण से ऋषि दयानन्द को मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं, सिद्धान्तों व परम्पराओं सहित सभी अन्धविश्वासों, पाखण्डों एवं आडम्बरों की समीक्षा करने सहित उनका खण्डन करना पड़ा। ऋषि के इन कार्यों का उद्देश्य विश्व के सभी मनुष्यों व भावी सन्ततियों का कल्याण करना था। ऋषि दयानन्द जी को इस कार्य की प्रेरणा अपने विद्या गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती से सन् 1863 में गुरु-दक्षिणा के अवसर पर उनसे विदा लेते समय मिली थी। इस कार्य को उन्होंने वेद प्रचार का नाम दिया। वेद प्रचार का अर्थ सत्य, न्याय तथा विद्यायुक्त मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रचार करना है। ऋषि दयानन्द के समय में संसार के लोग वेद व उसके महत्व को भूल चुके थे। ऋषि ने अपने गुरु के सान्निध्य में वेदों का महत्व जाना था और वेदों को प्राप्त कर उनकी परीक्षा करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और इसकी सभी बातें सत्य व स्वतः प्रमाण कोटि की हैं। वेद ही मनुष्य जाति का सर्वविध व सर्वांगीण कल्याण करने वाला दिव्य व अलौकिक ज्ञान भी है। सूर्य के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, वह अपना प्रमाण स्वयं उदय होकर अपने प्रकाश व उष्णता से देता है। जिसको सूर्य का प्रमाण चाहिये उसकी आंख व त्वचा इन्द्रिय ठीक होनी चाहिये जिससे वह वस्तुओं को देख सकता व उनका अनुभव कर सकता हो। मनुष्य अपनी आंखों से सूर्य को देख कर उसका प्रत्यक्ष अनुभव व ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

इसी प्रकार वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान होने एवं संसार के नियम व व्यवस्थायें वेदों के अनुरुप होने से यह सत्य व यथार्थ ज्ञान सिद्ध होता है। वेदों में ईश्वर, जीव व प्रकृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। वेद अपनी इस महत्ता के कारण स्वतः प्रमाण है। वेदों से इतर अन्य ऋषियों, विद्वानों तथा आचार्यों द्वारा कही बातें वेद के अनुकूल होने पर ही प्रामाणित व स्वीकार करने योग्य होती हैं। ऋषि दयानन्द ने वेदज्ञान की परीक्षा कर ज्ञान के सत्यासत्य होने की कसौटी ‘वेद स्वतः प्रमाण एवं अन्य ग्रन्थ परतः प्रमाण’ को प्रस्तुत कर मनुष्य जाति पर महान उपकार किया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण देन है जिससे समस्त मनुष्य जाति सृष्टि के अन्तिम समय तक ईश्वर, जीवात्मा, सामाजिक परम्पराओं एवं सभी विषयों के ज्ञान सहित ईश्वर की उपासना आदि का सत्य ज्ञान प्राप्त कर लाभान्वित होती रहेंगी। आश्चर्य एवं दुःख की बात है कि अज्ञान व किन्हीं अन्य कारणों से विश्व ने वेदों के महत्व व इनकी उपादेयता को उनके यथार्थ स्वरूप में अब तक स्वीकार नहीं किया है। हम विचार करते हैं तो हमें ईश्वर व उसका ज्ञान वेद मनुष्य जाति का सर्वस्व एवं प्राणों के समान महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं जिससे मनुष्य जीवन सुगमता से व्यतीत करते हुए परजन्म में भी उन्नति को प्राप्त किया जा सकता है। सम्पूर्ण मनुष्य जाति का कर्तव्य है कि वह वेदों की रक्षा करे और वेदाध्ययन कर अपने जीवन को उसके अनुकूल बनाकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने में भी सफल होंवे।

ऋषि दयानन्द का जन्म गुजरात राज्य के मौरवी जिले के टंकारा नामी ग्राम में फाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी, वि. सम्वत् 1881 (12-2-1825) को एक औदीच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आयु के चौदहवें वर्ष में उन्होंने शिवरात्रि का व्रत किया था। पिता के साथ रात्रि जागरण करते हुए उन्होंने चूहों को शिवलिंग पर बिना किसी रोकटोक क्रीड़ा करते देखा था। इससे उन्हें बोध हुआ था कि वह मूर्ति सर्वशक्तिमान सच्चे शिव की मूर्ति नहीं है क्योंकि इसमें चूहों को अपने ऊपर से हटाने की शक्ति भी नहीं थी। बालक मूलशंकर (भावी ऋषि दयानन्द) के पिता व अन्य विद्वतजन भी उनकी शंका का समाधान नहीं कर सके थे। इस घटना के बाद से मूलशंकर ने मूर्तिपूजा करना छोड़ दिया था। कालान्तर में उनकी बहिन व चाचा की मृत्यु हुई। इस घटना ने उनके मन में मृत्यु का भय उत्पन्न किया। ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपनी मृत्यु का अनुमान कर डरे होंगे। मृत्यु की ओषधि है या नहीं, इसका समाधान उन्हें अपने परिवारजनों व आचार्यों से नहीं मिला। अतः सच्चे ईश्वर व उसकी प्राप्ति के उपायों सहित मृत्यु पर विजय प्राप्ति के साधनों की खोज में वह अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में घर छोड़कर चले गये। उन्होंने देश के प्रायः सभी प्रमुख तीर्थ स्थानों में जाकर वहां विद्वान संन्यासियों व महात्माओं का सान्निध्य प्राप्त किया और उनसे अपनी शंकाओं के समाधान जानने का प्रयत्न किया। उन्हें किसी से भी अपने प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। ऐसा करते हुए उन्होंने योग के आचार्यों से योग विद्या सीखी और उसमें निपुण हो गये। देश की दुर्दशा से वह चिन्तित रहते थे। उनकी यह पीड़ा उनके ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश व आर्याभिविनय आदि में भी प्रकट होती है।

योग में समाधि अवस्था को प्राप्त कर लेने पर भी ऋषि दयानन्द अपनी ज्ञान की पिपासा को सन्तुष्ट नहीं कर पाये। स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती जी की संगति से उन्हें उनके शिष्य मथुरा के प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती का परिचय मिला था जो वेद व आर्ष-ज्ञान के आचार्य थे। दण्डीजी मथुरा में अपनी पाठशाला में विद्यार्थियों को वेदों के एक अग ‘व्याकरण’ जिसे हम अष्टाध्यायी-महाभाष्य व्याकरण पद्धति के नाम से जानते हैं, पढ़ाते थे। स्वामी दयानन्द सन् 1860 में स्वामी विरजानन्द जी के पास पहुंचे और लगभग 3 वर्ष तक उनके सान्निध्य में रहकर वेद-वेदांगों का अध्ययन किया। तीन वर्षों में यह अध्ययन पूरा हुआ। सन् 1863 में गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द ने उनसे संसार से अविद्या वा अज्ञान दूर कर सत्य आर्ष ज्ञान को प्रचारित कर अनार्ष ज्ञान को हटाने की प्रेरणा की। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु की इस प्रेरणा को स्वीकार कर उसे शिरोधार्य किया था और आजीवन इसका पालन किया। इसके बाद से ही उन्होंने धर्म प्रचार का कार्य आरम्भ कर दिया था। उन्होंने अपने प्रयत्नों से वेदों की खोज कर उन्हें प्राप्त किया, उनका गहन अध्ययन एवं परीक्षा की और उसके बाद अपने वेद विषयक सिद्धान्तों का निश्चय कर वह देश भर में सत्य वेदज्ञान के प्रचार के कार्य में संलग्न हो गये। वेद प्रचार ही वह कार्य है जिससे देश देशान्तर में अविद्या को दूर किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द को वेद प्रचार का कार्य करते हुए सफलता मिलनी आरम्भ हो गई थी। इसका एक उदाहरण 16 नवम्बर, सन् 1869 को विद्या की नगरी काशी में उनका लगभग 30 सनातनी विद्वानों से मूर्तिपूजा की वेदमूलकता पर शास्त्रार्थ हुआ जिसमें उन्हें सफलता मिली। इससे उन्हें पूरे विश्व में यश प्राप्त हुआ था।

ऋषि दयानन्द का जन्म ऋषियों की भूमि भारत में हुआ था। उनका कर्तव्य था कि वह प्रथम भारत में विद्यमान अविद्या, अन्धविश्वास, पाखण्ड एवं सामाजिक विषमताओं को दूर करें। उन्होंने इस कार्य को अपनी पूरी योग्यता व क्षमता से किया। इसका अनुकूल प्रभाव हुआ जो आज भी दृष्टिगोचर हो रहा है। भारत की पराधीनता समाप्त हुई। ऋषि दयानन्द के अनुसार वेदों के सत्य-सिद्धान्तों, वैदिक धर्मप्रचार एवं शास्त्रार्थ आदि का जन-जन में व्यवहार न होने का परिणाम ही देश का विभाजन था। ईश्वर, जीवात्मा और संसार का सत्यस्वरूप आज हमारे सामने है। हम ईश्वर की उपासना विधि सहित वायु एवं जल आदि की शुद्धि सहित मनुष्य को रोगों से दूर रखने तथा रोगी को स्वस्थ करने का उपाय अग्निहोत्र यज्ञ को भी जानते व करते हैं। हम यह भी जान पाये हैं कि हमारे रोगों का कारण हमारी अनियमित दिनचर्या सहित अनयिमित भोजन एवं वायु, जल एवं पर्यावरण की अशुद्धि व प्रदुषण होता है। शिक्षा व विद्या का महत्व भी देशवासियों ने समझा और आज भारत विद्या के क्षेत्र में विश्व के अग्रणीय देशों में है। ऋषि दयानन्द ने शुद्ध भूमि में परम्परागत देशी खाद व उत्तम नस्ल के बीजों से उत्पन्न खाद्यान्न को मनुष्य के लिए हितकर व स्वास्थ्यवर्धक बताया था। वर्तमान में इस बात की भी पुष्टि हो रही है। ऋषि दयानन्द ने स्वास्थ्य का आधार ब्रह्मचर्य को बताया था, यह भी अब सभी स्वीकार करने लगे हैं। ब्रह्मचर्य का सेवन छूट जाने को ही उन्होंने देश व समाज के पतन का प्रमुख कारण भी बताया था। इसे भी विद्वानों ने ज्ञान के स्तर पर सत्य सिद्ध किया है। ऋषि दयानन्द ने मांसाहार, अण्डा, मछली, मदिरा को निषिद्ध बताया था। आज हमारे चिकित्सक हृदय व मधुमेह आदि अनेक रोगों में इन पदार्थों का सेवन न करने की सलाह देते हैं। धार्मिक दृष्टि से भी इन पदार्थों का सेवन अत्यन्त निन्दनीय होने सहित आयु ह्रास का कारण है। इससे परजन्म में भी अतीव हानि होती है।

ऋषि दयानन्द ने महाभारत युद्ध के बाद मध्यकाल में सनातन वैदिक धर्म में प्रविष्ट मूर्तिपूजा व जड़पूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, सामाजिक असमानता व भेदभाव आदि का भी खण्डन व विरोध किया था। उन्होंने अपने ग्रन्थों में इनके सम्बन्ध में विस्तार से प्रकाश डाला है। आज तक किसी मत-मतान्तर का विद्वान व आचार्य ऋषि दयानन्द द्वारा खण्डित इन मान्यताओं व विचारों को वेदानुकूल अथवा मनुष्य जाति के लिए हितकर व लाभप्रद सिद्ध नहीं कर सका। ऋषि दयानन्द ने सत्य के प्रचार के लिये सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। उन्होंने वेदों का अध्ययन करने के लिये संस्कृत के अनेक व्याकरण ग्रन्थों की रचना भी की। अपने समय में ऋषि दयानन्द ने अपनी मान्यताओं के समर्थन में विपक्षी विद्वानों से शास्त्रार्थ, वार्तालाप व शंका समाधान आदि भी किये। उनके अनुयायी विद्वानों ने उनके खोजपूर्ण अनेक विस्तृत जीवन चरित्र लिखे। यह सब ऋषि दयानन्द को संसार का महानतम पुरुष सिद्ध करते हैं जो दृण ईश्वर विश्वासी हैं, अद्भुद ज्ञानी हैं, तपस्वी व पुरुषार्थी हैं, तर्क शक्ति से सम्पन्न हैं, किसी भी विवादित विषय पर चर्चा करने पर अपराजेय हैं, एक साधारण नाई की सूखी रोटी स्वीकार कर उसे भी प्रेम से खाते हैं तथा विश्व बन्धुत्व का प्रचार करने सहित सभी मनुष्यों को परमात्मा की सन्तान बताते हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने उपदेशों व ग्रन्थों के द्वारा जिस सत्य सनातन तर्क-सिद्ध व सर्वहितकारी वैदिक धर्म का प्रचार किया वही धर्म एवं संस्कृति विश्व के प्रत्येक मनुष्य का वस्तुतः सत्य व यथार्थ धर्म व संस्कृति है। संसार को इसको अपनाना ही होगा। अन्य कोई सत्य धर्म व जीवन शैली वैदिक जीवन के समान हो ही नहीं सकती। ऋषि दयानन्द ने शुद्ध हृदय एवं भावनाओं से संसार से अविद्या दूर करने के लिये सत्य सनातन सिद्धान्तों पर आधारित जिस वैदिक मत का प्रचार किया उसमें वह सफल हुए हैं। वैचारिक धरातल पर ऋषि दयानन्द के अधिकांश विचारों को पूरे विश्व में स्वीकृति मिल चुकी है। कोई इनको चुनौती नहीं देता। शेष को भी कुछ समय बाद स्वीकृति अवश्यमेव मिलेगी। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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