भक्तों की मनोकामनाओं का पूरक है चित्रकूट का कामद गिरि और कामतानाथ मन्दिर

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आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी

         यह वह भूमि है, जहां पर ब्रह्म, विष्णु और महेश तीनों देव का निवास स्थान रहा है। भगवान विष्णु ने भगवान राम रूप में यहां वनवास काटा था, तो ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए यहां यज्ञ किया था और उस यज्ञ से प्रगट हुआ शिवलिंग मतगज्येंद्र नाथ धर्मनगरी चित्रकूट के क्षेत्रपाल के रूप में आज भी विराजमान है। वायु पुराण में चित्रकूट गिरि की महिमा का उल्लेख है। सुमेरू पर्वत के बढ़ते अहंकार को नष्ट करने के लिए वायु देवता उसके मस्तक को उडा कर चल दिये थे। किंतु उस शिखर पर चित्रकेतु ऋषि तप कर रहे थे। शाप के डर से वायु देवता पुनः उस शिखर को सुमेरू पर्वत में स्थापित करने के लिए चलने लगे। तभी ऋषिराज ने कहा कि मुझे इससे उपयुक्त स्थल पर ले चलो नहीं तो शाप दे दूंगा। संपूर्ण भूमंडल में वायु देवता उस शिखर हो लेकर घूमते रहे, जब वे चित्रकूट के इस भूखंड पर आये तो ऋषि ने कहा कि इस शिखर को यहीं स्थापित करों। चित्रकेतु ऋषि के नाम से ही इस शिखर का नाम चित्रकूट गिरि पडा था।

       चित्रकूट धाम उत्तर विंध्य रेंज में एक छोटा सा पर्यटन शहर स्थित है। यह उत्तर प्रदेश राज्य के प्राचीन बांदा आधुनिक चित्रकूट और मध्य प्रदेश राज्य के सतना जिले  में स्थित है। भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान  11 वर्ष 11 माह 11 दिन मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित चित्रकूट में गुजारे थे । इस दौरान उनके साथ अनेकों साधु-संतों ने चित्रकूट को ही अपनी साधना स्थली बना लिया।  इसलिए चित्रकूट को एक प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है ।

कामदगिरि पर्वत :–

कामदगिरि चित्रकूट धाम का मुख्य पवित्र स्थान है। संस्कृत शब्द ‘कामदगिरि’ का अर्थ ऐसा पर्वत है, जो सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है। इस गिरि को रामगिरि और चित्रकूट पर्वत भी कहा जाता है । कहा जाता है कि पर्वतराज सुमेरू के शिखर कहे जाने वाले चित्रकूट गिरि को कामदगिरि होने का वरदान भगवान राम ने दिया था। तभी से विश्व के इस अलौकिक पर्वत के दर्शन मात्र से आस्था वानों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह स्थान अपने वनवास काल के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी का निवास स्थल रहा है। उनके नामों में से एक भगवान कामतानाथ, न केवल कामदगिरि पर्वत के बल्कि पूरे चित्रकूट के प्रमुख देवता हैं। धार्मिक मान्यता है कि सभी पवित्र स्थान (अर्थात् तीर्थ) इस परिक्रमा स्थल में स्थित हैं। इस पहाड़ी के चारों ओर का परिक्रमा पथ लगभग 5 किमी लंबा है जिसमें बड़ी संख्या में मंदिर हैं। ग्रीष्म ऋतु के अलावा, पूरे वर्ष इस पहाड़ी का रंग हरा रहता है और चित्रकूट में किसी भी स्थान से देखे जाने पर धनुषाकार दिखाई देता है। जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं।  प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार इस खूबसूरत सृष्टि की रचना समय परम पिता ब्रह्मा जी ने की थी, इस पवित्र स्थान पर 108 अग्नि कुंडों की स्थापना की गई थी। अपने निर्वासन काल के दौरान भगवान राम भी इसी स्थान पर कुछ समय के लिए अवतरित हुए थे। धनुसाकार पर्वत पर स्थित एक विशाल झील सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। तुलसी दास ने लिखा है – ” कामद भे गिरि रामप्रसादा।

   अवलोकत अप हरत विषादा’।।

राम का ही स्वरूप कामतानाथ मन्दिर :-

चित्रकूट में ही भरत जी सभी नगरवासियों को साथ लेकर श्रीराम से मिलने गये थे। आस पास के लोगों को पता चल गया कि राम जी चित्रकूट में विराजमान हैं तब सभी लोग उनसे मिलने पहुंचने लगे, वहाँ भारी भीड़ रोजाना आने लगी इसलिए वे तीनों चित्रकूट छोड़ कर आगे चले गये।

           कहा जाता है कि जब भगवान राम चित्रकूट को छोड़कर जाने लगे तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से याचना कि, हे प्रभु आपने इतने वर्षों तक यहां वास किया, जिससे ये जगह पावन हो गई। लेकिन आपके जाने के बाद मुझे कौन पूछेगा। तब प्रभु राम ने चित्रकूट गिरि को वरदान दिया कि अब आप कामद हो जाएंगे। यानि ईच्छाओं (मनो कामनाओं) की पूर्ति करने वाले हो जाएंगे। जो भी आपकी शरण में आयेगा उसके सारे विषाद नष्ट होने के साथ-साथ सारी मनोकामना पूर्ण हो जाएंगी, और उस पर सदैव राम की कृपा बनी रहेगी। जैसे प्रभु राम ने चित्रकूट गिरि को अपनी कृपा का पात्र बनाया कामदगिरि पर्वत कामतानाथ बन गये। जहाँ भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं। यह मंदिर कामदगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित है।

कामदगिरि की परिक्रमा:-

कामदगिरि का परिक्रमा मार्ग उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है या यूँ कहें कि परिक्रमा का आधा हिस्सा यूपी में आता है और आधा एमपी में स्थित है।कामदगिरि की परिक्रमा करने के लिए देश के कोने-कोने से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं का आना-जाना होता रहता है। इसकी परिक्रमा की शुरुआत चित्रकूट के प्रसिद्ध रामघाट में स्नान के साथ होती है,। रामघाट, मंदाकिनी और पयस्वनी नदी के संगम पर स्थित है। यह वही घाट है, जहाँ भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। श्रद्धालु इसी घाट पर स्नान करके कामतानाथ मंदिर में भगवान के दर्शन करते हैं और कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा प्रारंभ करते हैं। यह परिक्रमा 5 किलोमीटर की है, जिसे पूरा करने में लगभग डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है।

भगवान राम से आशीर्वाद इस पर्वत को मिला था :-
त्रेतायुग में जब भगवान राम, माता सीता और अनुज लक्ष्मण सहित वनवास के लिए गए तो उन्होंने अपने 14 वर्षों के वनवास में लगभग साढ़े 12 वर्ष चित्रकूट में व्यतीत किए। इस दौरान चित्रकूट साधु-संतों और ऋषि-मुनियों की पसंदीदा जगह बन गया। जब यहां भीड़ बढ़ने लगी और बनवासी जीवन को सादगी से बिताने में असुबिधा होने लगी तो भगवान राम ने चित्रकूट छोड़ने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय से चित्रकूट पर्वत दुःखी हो गया और भगवान राम से कहा कि जब तक वो वनवास के दौरान यहाँ रहे, तब तक यह भूमि अत्यंत पवित्र मानी जाती रही लेकिन उनके जाने के बाद इस भूमि को कौन पूछेगा? इस पर भगवान राम ने पर्वत को वरदान दिया और कहा, “अब आप कामद हो जाएँगे और जो भी आपकी परिक्रमा करेगा उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँगी और हमारी कृपा भी उस पर बनी रहेगी।“ इसी कारण इसे पर्वत कामदगिरि कहा जाने लगा और वहाँ विराजमान हुए कामतानाथ भगवान राम के ही स्वरूप हैं। कामदगिरि की एक विशेषता है कि इसे कहीं से भी देखने पर इसका आकार धनुष की भाँति ही दिखाई देता है।

परिक्रमा मार्ग पर हैं अनेक प्राचीन मंदिर :-
कामदगिरि पर्वत के परिक्रमा मार्ग में कई प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित हैं। उनमें से एक है चरण-पादुका मंदिर या भरत मिलाप मंदिर। यह वही स्थान है, जहाँ भगवान राम के छोटे भाई भरत उन्हें अयोध्या वापस ले जाने के लिए आए थे लेकिन भगवान राम ने वनवास पूरा करना ही स्वीकार किया। इस पर भरत ने भगवान राम की चरण पादुकाएँ माँग ली थी और यह घोषणा की थी भगवान राम की अनुपस्थिति में राजसिंहासन पर ये चरण पादुकाएँ ही सुशोभित होंगी।
इसके अलावा परिक्रमा मार्ग में राम-मुहल्ला, साक्षी गोपाल मंदिर, पीली कोठी और मुखारबिंदु भी स्थित हैं। परिक्रमा मार्ग में कई प्रकार की वस्तुओं और खाने-पीने की दुकानें भी स्थित हैं। कामदगिरि पर्वत की प्रमुख विशेषता है कि यहाँ चार दिशाओं में कामदगिरि के घने जंगल से बाहर निकालने के लिए चार अलग-अलग द्वार बनाए गए हैं। इन चार मुख्य द्वारों में हर द्वार में हर भगवान का अलग अलग वास रहता है. जिसमे उत्तरद्वार पर कुबेर, दक्षिणीद्वार पर धर्मराज, पूर्वी द्वार पर इंद्र और पश्चिमी द्वार पर वरूण देव द्वारपाल हैं। इसके अलावा कामदगिरि पर्वत के नीचे क्षीरसागर है। जिसके अंदर उठने वाले ज्वार-भाटा से कभी-कभार कामतानाथ भगवान के मुखार बिंद से दूध की धारा प्रवाहित होती है. इसीलिए चित्रकूट के कामदगिरि पर्वत के द्वारों का महत्व काफी बढ़ जाता है। विविध विशेषताओं के कारण ही कामदगिरि पर्वत के दर्शन और परिक्रमा के लिए प्रत्येक माह अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का जमावडा लगता है।
आस्था का सबसे बड़ा केन्द्र कामदगिरि पर्वत:-
यह आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। अमावस्या, पूर्णिमा, मकर संक्रांति, दीपावली, जैसे बड़े पर्वों में लोग यहां पर भगवान कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा लगाते हैं. लोग अपनी मन्नतें भी मांगते हैं । उत्तर प्रदेश प्रशासन और मध्यप्रदेश प्रशासन दोनों सरकारें मिलकर कामदगिरि पर्वत के विकास को लेकर लगातार लगी रहती हैं। भगवान राम ने इसी पर्वत में अपना वनवास काल का समय बिताया था, जिसके लिए इस पर्वत का महत्व और भी बढ़ जाता है।
परिक्रमा पथ को सरकार ने टीन शेड से सुरक्षित कर रखा है।इस क्षेत्र में अनेक जलाशय सूखे हुए मिल जायेंगे।
पूरे क्षेत्र में वैध अवैध झोपड़ पट्टी से आवागमन प्रभावित होता है।इन्हें पुनर्वासित कर पथ को सुन्दर स्वरूप दिया जा सकता है।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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