सनातन धर्म में कर्म और कर्म के आधार पर जन्म के नियम

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आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी
सनातन धर्म के तीन मूल आधार स्तंभ –
सनातन धर्म के तीन मूल आधार स्तंभ हैं। कर्म नियम, पुनर्जन्‍म एवं मोक्ष। कर्म के तीन प्रकार होते हैं -आगामी, संचित और प्रारब्ध। ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् ज्ञानी के शरीर के द्वारा जो पाप-पुण्य रूप कर्म होते हैं, वे आगामी कर्म के नाम से जाने जाते हैं।इनमें सर्वप्रथम है कर्म नियम होता है। सनातन धर्म मानता है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। कर्म नियम सनातन धर्म में ऋग्वेद के समय से चला आ रहा सिद्धांत है। ऋग्वेद में मंत्र दृष्टा ऋषियों ने विचार करके पाया कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में अकृताभ्‍य उपगम और कृत हानि नहीं हो सकती।
अकृताभ्य उपगम का अर्थ है कि जो कर्म हमने नहीं किए हैं उसके परिणाम हमें मिलेंगे। कृत हानि का अर्थ है कि जो कर्म हमने किए हैं उसके परिणाम हमें न मिलें। ऐसा नहीं हो सकता। ऋग्वेद कहता है कि जो कर्म आपने किए हैं उसके परिणाम आपको मिलेंगे।
सनातन धर्म में कर्म और जन्म का विधान:-
हिंदू सनातन धर्म में पूर्व जन्म और कर्मों की बहुत ही अहमियत होती है। सनातन धर्म मानता है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। हम जीवन में तीन तरह के कर्म देखते हैं। तीसरे प्रकार का कर्म है अनासक्‍त भाव से किया गया कर्म होता है। इसके अलावा दो तरह के सर्वाधिक प्रचलित कर्म मुख्य रूप से होते हैं। प्रत्‍येक व्यक्ति मोटे तौर पर दो प्रकार के कर्म करता है जिन्‍हें हम अच्छे कर्म और बुरे कर्म में विभाजित कर सकते हैं।
अच्छा कर्म और बुरा कर्म किसे कहा जाए :-
जिस कर्म से भलाई हो , परोपकार हो ,सुख प्राप्ति हो और उद्देश्‍य की सिद्धि हो। वे अच्‍छे कर्म हैं और जिससे किसी की बुराई हो , दुख मिले, संताप मिले, काम रूकें तो ऐसे कर्म को हम बुरा कर्म कह सकते हैं। हम जिस विचार या भावना से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, वे विचार एवं भावनाएं ही अच्छा या बुरा कर्म बनाती हैं। जो अच्छा कर्म है वह हमें अच्छे परिणाम देता है। बुरा कर्म , बुरे एवं अशुभ परिणाम देता है।
विचित्रताओं से भरा हुआ है यह संसार:-
हम इस संसार में देखते हैं कि बहुत से लोग दुखी हैं, कई तरह के कष्ट पा रहे हैं। जीवन अभावों से ग्रस्त है। जबकि दूसरी ओर ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो सर्व सुविधा संपन्न हैं।
यहां पर दो बातें विचारणीय है। पहली बात कि धनी होने एवं सुखी होने में अंतर है। आवश्यक नहीं है कि जो धनी है वह सुखी ही है और जो निर्धन है वह दुखी ही हो। दूसरी बात यह कि हमारे जो कर्म हैं और जो परिणाम हमें मिल रहे हैं वे केवल इस जन्‍म के ही नहीं होते। हमारे पिछले जन्‍मों के कई कर्म होते हैं जिनका परिणाम हमें इस जन्म में मिल रहा होता है। किसी व्यक्ति को देख कर यह समझना कि वह अच्‍छे कर्म करके भी दुखी है या इसने कोई गलत कार्य नहीं किया है या यह दुष्‍कर्मी होकर भी धनवान दिख रहा है। इसने कोई श्रेष्‍ठ कर्म नहीं किया होगा। ऐसा विचार करना अनुचित है।
इच्छायें और कामनायें और संस्कार आत्मा का आवरण:-
सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार हम जो कोई कर्म करते हैं। हम किसी कामना की पूर्ति के लिए, किसी इच्छा से जो भी कार्य करते हैं। वे हमारे मन में एक संस्कार को उत्पन्‍न करते हैं वह संस्‍कार हमारी आत्‍मा से चिपक जाता है।
किसी व्यक्ति के मन में जब किसी दूसरे के प्रति हिंसा का विचार आता है तो वह संस्‍कार विचार के रूप में व्‍यक्ति के अंतर्मन में, अवचेतन में, आत्मा में चिपक गया और आगे चल कर वही संस्‍कार उसके दुख का कारण बनता है और उसको दुख देता है।
इसी तरह जो व्‍यक्ति करूणाभाव से प्रेरित होकर किसी व्‍यक्ति की भलाई करता है अच्‍छे कार्य करता है तो वे सदविचार के रूप में आत्मा की पवित्रता के रूप में अच्‍छे संस्‍कार के रूप में उसकी आत्मा में चिपक जाते हैं। वही आगे चल कर उसे सुख देता है।
अनासक्‍त भाव का निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम :-
तीसरे प्रकार का कर्म है अनासक्‍त भाव से किया गया कर्म। इसका उपदेश भगवान कृष्‍ण में गीता में दिया है। भगवान कहते हैं ऐसे कर्म जो अनासक्‍त भाव से किए गए हों, जो कर्म फल को ध्‍यान में रख कर नहीं किए गए हों। जिसके पीछे कोई कामना न हो जिसके पीछे कोई इच्‍छा न हो। जिसे हम उत्‍तरदायित्‍व समझ कर करते हों। उन्‍हें इस तीसरी श्रेणी में रखा जाता है। ये निष्‍काम कर्म हैं।अनासक्‍त भाव से किए कर्मों का कोई उद्देश्‍य नहीं होता। उनका कोई लक्ष्‍य नहीं होता। वह केवल कर्म होता है। ऐसा ही कर्म निष्काम कर्म है । यही कर्म वांछनीय है और यही कर्म इच्छित है।
सांसारिक रिश्ते नाते पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार :-
हिन्दू दर्शन के अनुसार मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। कर्म नियम ऋग्वेद के समय से चला आ रहा सिद्धांत है। एसा माना जाता है कि पूर्व जन्म के कर्मों से ही व्यक्ति को उसके दूसरे जन्‍म में माता-पिता, भाई बहन, पति पत्नी, दोस्त-दुश्मन , नौकर चाकर आदि रिश्ते नाते मिलते है। इन सबसे या तो कुछ लेना होता है या फिर कुछ देना होता है। इसी प्रकार इस जन्म के व्यक्ति के संतान के रूप में उसके पूर्व जन्म का कोई संबंध ही आता है। शास्त्रों के अनुसार हमारे जितने भी सगे-संबंधी हैं, वे सभी किसी न किसी कारण ही हमारे सगे-संबंधी बने हैं। कुछ भी अकारण या संयोग से नहीं होता है। संयोग भी किसी कारणवश ही होता है। पिछले जन्म का हमारा कुछ हिसाब-किताब अगर बाकी रह जाता है, तो वह उसे हमें इस जन्म में पूरा करना होता है। धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं मिलती है। हमारे द्वारा किया गया कर्म ही हमारे भविष्य को निर्धारित करता है।
संचित कर्म’:-
ये संस्कार मनुष्य के पूर्व जन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म ‘संस्कार’ ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे ‘संचित कर्म’ कहते हैं। शास्‍त्रों में इसे 4 प्रकार का बताया गया है।
1.ऋणानुबन्ध पुत्र : –
यदि आपने पिछले जन्म में किसी से कोई कर्ज लिया हो और उसे चुका नहीं पाएं तो आपके इस जन्म में वो व्यक्ति आपकी संतान बनकर आपके जीवन में आएगा और तब तक आपका धन व्यर्थ होगा, जब तक उसका पूरा हिसाब न हो जाएं।
2.शत्रु पुत्रः-
अगर आपके पिछले जन्म में कोई आपका दुश्मन था और वो आपसे अपना बदला नहीं ले पाया था तो आपके इस जन्म में वो आपकी संतान के रूप में आपका एक अहम हिस्सा बनता है। जिसके बाद उसके कारण आपको जिंदगी भर परेशान ही रहना पड़ता है।
3 .उदासीन पुत्र : –
इस प्रकार कि सन्तान माता पिता को न तो कष्ट देती है ओर ना ही सुख। विवाह होने पर यह माता- पिता से अलग हो जाते हैं ।
4.सेवक पुत्र: –
यदि पिछले जन्म में आपने बिना किसी स्वार्थ के किसी की बहुत सेवा की है, तो वह व्यक्ति आपका कर्ज उतारने आपके वर्तमान जन्म में पुत्र बनकर आता है।
हमें अपने प्रारब्ध के कर्मो को सकारात्मक रूप में अंगीकार करते हुए , काटते हुए और भोगते हुए आने वाले समय के लिए सात्विक कर्म को निष्पादित करना चाहिए। सांसारिक लोगों के सुख दुख की ना ही तुलना करना चाहिए और ना ही उस के बारे में किसी प्रकार का चिन्तन करना चाहिए। सदैव निष्काम कर्म में ही संयुक्त होना चाहिए।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

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