धृति – वृति ठीक रख, नीलकण्ठ बन जाय ।

बिखरे मोती

परमपिता परमात्मा की भक्ति में अपार शक्ति है:-

ओ३म् में शक्ति अपार हैं,
कोई होके देखो लीन ।
भव तरै मुक्ति मिले,
ताप रहे ना तीन॥2517॥

आकर्षण का केन्द्र माया नहीं अपितु मायाधीश है:-

प्रेम- पाश संसार का,
एक दिन तुझे रुलाय।
प्रेमाकर्षण ओ३म् का ,
भव मुत्ति दिलवाय॥2518॥

समाज के भूषण कौन है:-

सज्जन भूषण लोक के,
दुर्जन होय कलंक ।
धर्म से भगवत्ता बढ़ें,
राजा हो या रंक॥2519॥

                   विशेष शेर

परमपिता परमात्माप की असीम कृपा के संदर्भ में :-

रुहानी रहमत बरसी है,
दिन कितना खुशनसीब।
अर्ज़ी मंजूर हो गई,
ख़ुदा मेरा हबीब हैं॥2520॥

अखिल ब्रहमाण्ड़ का नियामक कौन है ? –

अखिल ब्रह्माण्ड़ सृजन किया,
नियम में हुआ तू लोप ।
फूलों की मुस्कान तू,
दामिनी में है कोप॥2521॥

धन कैसा हो ? :-

धन कमाओ धर्म से,
धर्म में करो निवेश।
धर्म से भगवत्ता बढ़े,
पाप से बढ़े कलेश॥2522॥

हमेशा अपने कुल की प्रतिष्ठा और मर्यादा का ध्यान रखिए :-

नीवं का पत्थर ना दिखै,
दिखै, मुंडेरे की ईट।
चादर निर्मल राखिये,
ढूँढ़े मिले ना छींट॥2523॥

कितनी कठिन है अध्यात्म की राह ?

ब्रहमनिष्ठ होना कठिन,
कोटिक में कोई एक।
काम – क्रोध निर्लिप्त हो,
चिन्तन में हो शिवेक॥2524॥

बुढ़ापा कैसे सरल बने ? :-

धृति – वृति ठीक रख,
नीलकण्ठ बन जाय ।
हनी-मनी की पूर्णता,
बुढ़ापा सरल बनाय॥2525॥

हनी अर्थात् वाणी में शहद जैसी मधुवरता मनी से अभिप्राय है बुढ़ापे में इतना धन होना चाहिए कि किसी के सामने हाथ फैलाना ना पड़े, कोई तुम्हें भार ना समझे अपितु आप ही दूसरों की मदद करने में सक्षम हो तभी बुढ़ापा आसानी से कट जाता है।

क्रमशः

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