ऋषि की कमाई और आर्यसमाज भाग 1

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ऋषि दयानन्द संसार के इतिहास के एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं जिनके जाने के पश्चात उनके विरोधियों ने भी उनकी मृत्यु पर अफसोस व्यक्त किया था। उन्होंने अपनी दिव्य प्रतिभा से विरोधियों पर भी अपनी अद्भुत छाप छोड़ी। उन्होंने संसार के प्रत्येक वर्ग ,समुदाय या संप्रदाय के बुद्धिजीवियों को बौद्धिक रूप से झकझोर कर रख दिया था। यही कारण था कि चाहे कोई मुसलमान हो या फिर ईसाई हो या किसी अन्य मत का व्यक्ति हो, यदि उसके पास थोड़ी सी भी बुद्धि थी और वह दयानंद के बताए सत्य मार्ग को अपनाने की थोड़ी सी भी क्षमता रखता था तो वह इतना तो अवश्य ही अनुमान लगा लेता था कि उसके अपने मजहब या संप्रदाय की बात के सामने दयानंद की बात ही सच्ची थी। यह अलग बात है कि उसे अपने लोगों के साथ रहकर जिंदगी जीने के लिए वही मानना पड़ता था जो उसका मजहब उससे कहता था।

हमको दिखाया रास्ता, ऋषि देव दयानंद ने,
सर झुका अपना लिया, देश प्यारे हिंद ने।
सबको लगा वह ही उचित, जो किया संकेत था,
एक-एक विदेशी भगने लगा, मेरे प्यारे हिंद से।।

ऐसी परिस्थितियों में स्वामी दयानंद जी के व्यापक चिंतन के संदर्भ में हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन काल में अपने विचारों की ओजस्विता से ऐसे अनेक लोगों को प्रभावित किया जो विभिन्न संप्रदायों के कहलाते थे। कुल मिलाकर अपने जीवन काल में स्वामी दयानंद जी महाराज ने संसार के बुद्धिजीवियों का नेतृत्व किया। 

उन्होंने बौद्धिक क्षेत्र में पड़े अनेक तालों को खोलकर रख दिया। उन्होंने जड़ता को चुनौती दी। यदि ऐसे दयानंद की कल्पना करें तो वास्तविक रूप में खुलेपन और आधुनिकता की सोच का विचार देने वाले संसार के पहले व्यक्ति दयानंद जी थे। यद्यपि उन्होंने अपने खुले विचारों को जड़ता से मुक्त कर मर्यादा के बंधन में बांधने का प्रयास किया, जबकि जिन लोगों ने खुलेपन के विचार देने का आज ठेका सा ले लिया है, उन्होंने अपने खुले विचारों के खेल से लोगों को जड़ता में फंसा कर हमको अशुद्ध आचरण करने के लिए प्रेरित किया है। इस प्रकार स्वामी दयानंद जी की आधुनिकता और खुलापन जहां संसार के हित के अनुकूल था, वहीं आधुनिक खुलेपन के समर्थक लोगों का आधुनिकता और खुलेपन का मंत्र संसार के विरुद्ध पड़ रहा है।

आदर्श हमारे देवता और ऋषि दयानंद हैं,
झुकते जिनके सामने दुनिया के छल छंद है।
आ रही सब ओर से जयकार की आवाज है,
किसकी भला ? – जिसका नाम दयानंद है।।

ऐसे स्वामी दयानन्द जी महाराज जब संसार से गए तो प्रेरक ‘हिन्दी प्रदीप (प्रयाग) ने स्वामी दयानंद जी महाराज के देहांत पर अपने श्रद्घा सुमन निम्न प्रकार अर्पित किये थे-”हा! आज  भारतोन्नति कमलिनी का सूर्य अस्त हो गया। हा! वेद का खेद मिटाने वाला सद्घैद्य गुप्त हो गया। हा! दयानंद सरस्वती आर्यों की सरस्वती जहाज का पतवारी बिना दूसरों को सौंपे तुम क्यों अंतर्धान हो गये?  हा! सच्ची दया के समुद्र…..कहां चले गये?
इसी प्रकार उर्दू पत्र ‘देशोपकारक (लाहौर) ने अपनी भावांजलि को इस प्रकार शब्दों में पिरोया था-”दिवाली की रात गो मसनूई चिरागों से रोजे रौशन है, लेकिन हकीकी आफताब गरूब हुआ। हम बिल्कुल नादान थे। वह हमें हर एक चीजें शनाख्त कराता था। हम कमताकती से उठ नही सकते थे, वह हमें उठा सकता था। हमने अपना नंगों नामूस गंवा दिया था, वह हमें फिर दिलवाना चाहता था। ऐ खुदा ! हम तुझसे बहुत दूर हो गये थे वह हमको तुझसे मिलना चाहता था।’
हृदय से निकले इन शब्दों में सच्ची संवेदना है। सच्ची श्रद्धांजलि है। भावांजलि है । पुष्पांजलि है। विनम्रता और मानवतावाद का बोध कराने वाली इन पंक्तियों से पता चलता है कि ऋषि दयानंद जी महाराज का सम्मान करने में लोग किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ते थे। जिन बौद्धिक आतंकवादियों का उन्होंने सामना किया उनका चाहे जितना विरोध हो, पर मानवता में विश्वास रखने वाले लोगों ने उन्हें सम्मान देने में ही अपना सम्मान समझा।

विक्टोरिया पेपर की श्रद्धांजलि

‘विक्टोरिया पेपर (स्यालकोट) ने भी अपना दु:ख इस प्रकार प्रकट किया था-”एशिया कौचक हमें मुखतालिफ जलजलों के आने और जावा के आतिशाफिशां पहाड़ों के फट जाने से स्वामी दयानंद का इन्त काल कम अफसोस की जगह नही है, क्योंकि ऐसे लायक शख्स का जीना जिसका सानी इल्म संस्कृत में कोई न हो, लाखों आदमियों की जिंदगी पर तरजीह रखता है।…. स्वामी दयानंद नाम के संन्यासी नही थे।
दीपावली की अमावस्या की रात्रि में जब सारा संसार गहन निशा में निमग्न था, तब भारत अपने नाम के अनुरूप संसार से अज्ञानान्धार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए सर्वत्र दीप जला रहा था। तभी काल की क्रूर नियति ने व्याकरण का महान सूर्य और वेदों का प्रकाण्ड पंडित, देशोद्वारक, पतितोद्वारक, स्त्री जाति का सच्चा हितैषी, मानवता का अनुरागी, राष्ट्रचेता, राष्ट्रधर्म प्रणेता, आदि दिव्य गुणों से सुभूषित महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज को हमसे छीन लिया।
आज इस घटना को घटित हुए लगभग 135 वर्ष हो रहे हैं।  हम आज भी दीप जला रहे हैं, बिना इस बात का ध्यान किये कि हमारे अंत:करण में कितना अंधकार है?

अज्ञान की गहरी निशा छाई थी भारत देश में।
पाखंडियों का बज रहा था, डंका मेरे देश में।।

हमने बहुत कुछ सुना कि ऋषी ने भारत में आकर पाखंडियों का इस प्रकार सामना किया या उनके गढ़ों पर वैदिक ध्वजा इस प्रकार फहराने में सफलता प्राप्त की ? उन्होंने जो कुछ किया, वह उनके साथ चला गया। वह एक इतिहास बन गया और इस इतिहास की समाधि पर हम अनंत काल तक खड़े नहीं रह सकते । जो जातियां समाधियों पर फूल चढ़ाने में व्यस्त रह जाती हैं , समय उन्हें पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाता है। इसलिए जीवंत जातियां अपने महापुरुषों के जीवन को सनातन बनाकर अपने हृदय मंदिर में सजाकर आगे बढ़ने का संकल्प लेती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक की “एक क्रांतिकारी संगठन : आर्य समाज नामक पुस्तक से )

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