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अदानी हिंडनबर्ग केस में कांग्रेस की हुई करारी हार

ललित गर्ग –

अदाणी-हिंडनबर्ग प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस और साथ ही उन तत्वों को बड़ा झटका एवं सबक है जो झूठ, स्वार्थ एवं अप्रामाणिकता की राजनीति करते हैं। इस मामले को लेकर अदाणी समूह के साथ केंद्र सरकार को भी घेरने में लगे कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों की पौल खुल गयी कि वे अपने राजनीतिक हितों के लिये देश का भी अहित कर सकते हैं। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने अडानी-हिंडनबर्ग मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि सेबी की जांच में किसी तरह अनियमितता सामने नहीं आई और विशेष जांच दल गठित करने की कोई आवश्यकता नहीं। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी जनहित याचिकाएं स्वीकार नहीं की जा सकतीं, जिनमें पर्याप्त शोध की कमी हो और जो अप्रमाणित रिपोर्टों एवं तथ्यों को सच मानती हों। सेबी को 24 मामलों पर जांच को कहा गया था, जिनमें से 2 पर जांच बाकी है जिसे तीन माह में पूरी करने का सेबी को निर्देश दिया गया है। 22 मामलों में अडाणी पर किसी तरह का आरोप निश्चित नहीं हो पाया। निश्चित ही यह सत्य की जीत हुई है। झूठ के सहारे सच को ढकने की एक और कोशिश नाकाम हुई है। वैसे भी इस तरह झूठ जब जीवन का आवश्यक अंग बन जाता है तब पूरी पीढ़ी शाप को झेलती, सहती और शर्मसार होकर लम्बे समय तक बर्दाश्त करती है। यह विडम्बना है कि सत्य जब तक जूतियां पहनता है झूठ नगर का चक्कर लगा आता है। झूठ के सांड को सींग से नहीं पकड़ा जाता, उसकी नाक में नकेल डालनी होती है। जीवन के प्रत्येक क्षण में इससे लड़ना होता है। जीवन में झूठ का उन्मूलन ही सत्य का बद्धमूलन है।
सत्यमेव जयते- सत्य को सर्वोपरि मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपना कार्य किया है। लेकिन तथाकथित राष्ट्र-विरोधी राजनैतिक दल जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करते हुए स्वयं को कानून से ऊपर मानते हैं एवं भाग्य विधाता समझते हैं। भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान के इन तथाकथित राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, ईमानदारी से हटता एव ंसच को ढंकता है। अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है। विदेशी एजेंसी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को आधार बनाकर देश के विकास में अनूठी भूमिका निभाने वाली शक्तियों को कमजोर करने की यह एक साजिश है, जो जनमत एवं जन-विश्वास के साथ धोखा है। अदाणी-हिंडनबर्ग प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का नजरिया न केवल आर्थिक-व्यापारिक शक्तियों के विश्वास को बल देता है बल्कि सत्य को भी मजबूती देता है। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी उन तत्वों को भी आईना दिखाती है, जो जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल अपने निहित स्वार्थों, राजनीतिक संकीर्णता एवं राष्ट्र-विरोध को साधने के लिए करते हैं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कुछ तत्व ऐसे हैं, जिन्होंने जनहित याचिकाओं को एक उद्योग में तब्दील कर दिया है।
एक वर्ष पहले जब अमेरिकी शार्ट सेलर फर्म हिंडनबर्ग ने यह आरोप लगाया था कि अदाणी समूह अपने शेयरों में हेराफेरी कर रहा है तो उससे केवल इस समूह को ही नुकसान नहीं पहुंचा था, बल्कि भारत के असंख्य अमीर-मध्यवर्ग के निवेशकों के अच्छे-खासे पैसे भी डूब गए थे। यह भी ध्यान रहे कि हिंडनबर्ग ने अदाणी समूह की साख पर आघात कर अच्छी-खासी कमाई भी कर ली थी। एक तथ्य यह भी है कि अदाणी समूह के खिलाफ हिंडबनर्ग की रिपोर्ट मोदी सरकार को घेरने का जरिया भी बन गई थी। संसद के भीतर और बाहर इसे लेकर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी ने इस मामले को खूब तूल दिया था। लेकिन अब राहुल हारे है और सत्य जीता है। यह कांग्रेस की हताशा एवं स्वार्थी राजनीति का घिनौना पक्ष है। मोदी विरोध एवं सत्ता की लालसा में उसने झूठे आश्वासन, झूठी योजना, झूठे आदर्श, झूठी परिभाषा, झूठा हिसाब, झूठे रिश्ते स्थापित किये हैं। चिन्तन में भी झूठ, अभिव्यक्ति में भी झूठ। यहां तक कि झूठ ने पूर्वाग्रह का रूप भी ले लिया है। एक झूठ के लिए सौ झूठ और उसे सही ठहराने के लिए अनेक तर्क। लगता है कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दल झूठ बोलते ही नहीं, झूठ को ओढ़ भी लेते हैं।
आज का राजनीतिक जीवन माल गोदाम में लटकती उन बाल्टियों की तरह है जिन पर लिखा हुआ तो ”आग“ है पर उनमें भरा हुआ है पानी और मिट्टी। आर्थिक झूठ को सहन किया जा सकता है लेकिन नीतिगत झूठ का धक्का कोई समाज या राष्ट्र सहन नहीं कर सकता। कांग्रेस लगातार नीतिगत झूठ के सहारे ऐसी राजनीति कर रही है जो राष्ट्र-विकास का एक बड़ा संकट है। झूठ कभी भी सत्य का स्थान नहीं ले सकता, वह सदैव निस्तेज रहता है। झूठ के पंख होते हैं, पांव नहीं। झूठ के इतिहास को गर्व से नहीं शर्म से पढ़ा जाता है। हर लड़ाई झूठ से प्रारम्भ होती है पर उसमें जीत सत्य से ही होती है। निश्चित तौर पर अडानी-हिंडनबर्ग रिसर्च विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम तो है ही, यह कई नाजुक एवं संवेदनशील पहलुओं को बेहद संजीदगी से स्पर्श करता है। राजनीतिक विवाद एवं महत्वाकांक्षा का हिस्सा होने की वजह से इस मसले से जुड़े कई पहलू आपस में उलझे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने जब यह मामला आया तो उसने अपना ध्यान इसके बुनियादी सवालों पर केंद्रित रखा। यही नजरिया फैसले में भी स्पष्ट झलकता है। यह फैसला मुख्यतः हिंडनबग रिपोर्ट की प्रामाणिकता, सेबी की स्वायतत्ता एवं अडाणी ग्रूप की विश्वनीयता से जुड़ा है, इसमें फैसला करते हुए दूध का दूध एवं पानी का पानी किया गया है। जहां तक सेबी के अधिकार क्षेत्र का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण संवेदनशीलता का परिचय देते हुए न सिर्फ अपनी सीमाओं का खयाल रखा बल्कि संस्थानों की स्वायत्तता के सिद्धांत को नए सिरे से रेखांकित किया। यह इस बात का संकेत है कि जब तक नियमों, कानूनों के उल्लंघन के स्पष्ट सबूत न हों तब तक इन नियामक निकायों के कामकाज में दखल देने से बचने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अदाणी समूह के चेयरमपर्सन गौतम अदाणी ने ट्वीट किया, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला दिखाता है कि सच्चाई की जीत हुई है। मैं उन लोगों का आभारी हूं जो हमारे साथ खड़े रहे। भारत की विकास गाथा में हमारा विनम्र योगदान जारी रहेगा।’ अनेक संकटों एवं आरोपों को झेल कर अडाणी तो और तेजी से विकास का नया इतिहास लिखने को दौडेगा, लेकिन प्रश्न है कि राहुल गांधी अपनी कीचड़ उछालने की राजनीति का परित्याग कब करेंगे? कांग्रेस की यह स्थिति केवल इसलिए उत्पन्न हुई कि कांग्रेस वोट की राजनीति के लिए जैसी अनुकूलता चाहती हैं, वैसी सच्ची बात कहकर पैदा नहीं कर पा रही है। इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अपना फैसला सुना रहा था, तब लगभग उसी समय तेलंगाना के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अदाणी समूह के प्रबंध निदेशक से मुलाकात कर रहे थे। महत्वपूर्ण केवल यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने सेबी की अब तक की जांच को सही पाया, बल्कि यह भी है कि उसने विदेशी संस्थाओं की रपट पर आंख मूंदकर भरोसा करने से इन्कार किया। यह ध्यान रहे कि कुछ समय पहले उसने यह कहा था कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में जो कुछ कहा गया है, उसे पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। वैसे भी भारत के अन्दरूनी मामलों में किसी विदेशी एजेंसी की रिपोर्ट को वे ही लोग प्रमुखता दे सकते है, जिनके कोई-न-कोई आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुुराग्रह होते हैं। मोदी सरकार से खुन्नस खाने वाले अरबपति निवेशक जार्ज सोरोस से जुड़ी संस्था ओसीसीआरपी के आरोपों को महत्व देने से इन्कार कर सुप्रीम कोर्ट ने दुराग्रही राजनैतिक पार्टियों एवं उनके नेताओं को सबक दिया है। आर्थिक एवं व्यापारिक शक्तियों सहित शासन-व्यवस्था को परेशान करने वाली संदिग्ध इरादों वाली हिंडनबर्ग और ओसीसीआरपी जैसी संस्थाएं भविष्य में अपनी साजिशों में सफल न हो, इसके लिये सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिए।

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