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भारतीय संस्कृति

भगवान श्री राम का पावन चरित्र

आज देश में चारों ओर एक ही नाम की प्रसिद्धि छाई हुई है और वो नाम है श्री राम का । कारण कि लगभग 500 वर्षों से देश जिस संघर्ष से जूझ रहा था उसका अंततः समापन हुआ और 5 अगस्त 2020 को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी के करकमलों से राम मंदिर अयोध्या का शिलान्यास का निर्णय लिया गया जो सभी सनातन धर्मियों के लिए गौरव की बात है।

आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने श्री राम को आप्त पुरुष, ज्येष्ठ श्रेष्ठ आत्मा, परमात्मा के भक्त, धीर वीर पुरूष, विजय के पश्चात् भी विनम्रता आदि गुणों से विभूषित महामानव माना है। आर्य समाज के परिदृश्य में श्री राम के जीवन के प्रसंगों के अनुसार चरित्र चित्रण निम्न रूप से किया जा सकता है।

समानता के परिचायक श्री राम ने अपने आस पास के सभी व्यक्तियों को समान भाव से देखा और उनके साथ समानता का व्यवहार किया। उदाहराणर्थ हम भीलराज निषाद, किष्किन्धा नरेश महाराज सुग्रीव, राक्षसराज विभीषण, केवट सभी के साथ समानता का परिचायक बन कर कार्य का प्रमाण दिया था।

महानायक – श्री राम महानायक थे। उनमें महानायकों के सभी गुण सन्निहित थे। एक सच्चे नेतृत्व क्षमता के परिचायक थे। जिन्होने अपने अपने साथ रहने वाले सभी के सामर्थ को ध्यान में रखते हुए सभी को उनके अनुसार कार्य भार दिया। प्रजा के हित में प्रत्येक कार्य किया।

सद्गृहस्थ – श्री राम सच्चे पत्नीव्रता सद्गृहस्थ थे। पत्नी के साथ कभी भी अपमान जनक कर्तव्य का प्रदर्शन नहीं किया। 14 वर्ष के वनवास के समय कभी भी पत्नी के साथ सहवास नहीं किया कि पत्नी को कष्ट का अनुभव न करना पडे।

वचन पालक- वचन पालन का गुण तो उनको अपने कुल से ही प्राप्त था। रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाय पर वचन न जाई। यह चौपाई तो जगत् प्रसिद्ध है। पिता को वचन दिया कि राज्य का त्याग करूंगा तो किया। सुग्रीव का राज तिलक हो या विभीषण का राजतिलक नगर में गये नहीं। माता सीता को लेने के लिए भी नगर में नहीं गए। जब तक चौदह वर्ष का वनवास का काल पूर्ण नहीं हुआ तब तक वन में ही रहते हुए वनवासी बने रहे।

ईश्वर भक्त- जब भी मौका मिला अपने ईश्वर भक्त होने का परिचय दिया । आज जिसे रामेश्वरम् के नाम से जानते है वह स्थान इस बात का प्रमाण देता है। चित्रकुट की एक एक स्थली प्रमाण स्वरूप है।
अहंकार शून्य- सभी भाईयों में ज्येष्ठ होते हुए भी उनमें अहंकार न था। बल सामर्थ सब होते हुए भी अपने आप में गंभीर थे। महानायक थे फिर भी एक सामान्य जीवन यापन करते थे।

आर्य समाज की मान्यता है कि घर घर में महापुरुषों के चरित्र की पूजा होनी चाहिए। पूजा के अभिप्राय श्री राम के चरित्र को अपनाना है। आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श मित्र, आदर्श सलाहकार, आदर्श नायक और आदर्श राजा के रूप में श्री राम चरित्र हम सभी को आने जीवन में अंगीकार करना चाहिए।

आर्य समाज प्रारम्भ से यही बताने का प्रयास करता रहा है जैसे श्री राम जी ने अपने प्रत्येक कार्य में मर्यादा का पालन किया और कभी भी अपनी मर्यादा से हटकर कार्य नहीं किया । वैसा ही आचरण हमें करना चाहिए। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रन्थों में श्री राम जी के बारे में कहा है कि “श्री राम एक महानायक होते हुए भी सद्गृहस्थी थे जो तपस्या करते हुए मोक्ष तक जाने का कार्य करते रहे।”

महर्षि वाल्मीकि जी ने अपने आदि ग्रन्थ में श्री राम जी के स्वरूप को दर्शाया जिसे प्रमाणिक माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि ने लंका गमन से पूर्व ईश्वर आराधना का वर्णन, समुद्र सेतु बनाने का वर्णन सब कुछ श्री राम ने सीता जी को समझाया है जिसका महर्षि दयानन्द जी ने अपने सत्यार्थ प्रकाश में भी उल्लेख किया है। तुलसी दास जी ने श्री राम जी के जीवन का वर्णन करते हुए बताया है कि “प्रात उठे रधुनाथा मात पिता गुरू नवावहु माथा” । श्री राम एक आदर्श पुरूष थे जो राजा होते हुए भी एक सामान्य जन के जीवन को प्रेरणा प्रदान करने का कार्य कर गए। जिनसे सारा संसार प्रेरित होता रहा है। आगे भी होता रहेगा। यदि हम आज अपने भाई से, पत्नी से, परिवार के सदस्यों से कलह करते रहे और श्री राम के मंदिर जाकर प्रति दिन पूजा करते रहे। तो यह दिखावा आडम्बर और अंधश्रद्धा के अलावा कुछ और नहीं है।

आज आवश्यकता है कि श्री राम की जन्म भूमि के लिए सैकडों वर्षों के संघर्षों के पश्चात् प्राप्त विजय को व्यर्थ न गवाएँ। श्री राम के जीवन से सभी प्रेरणा प्राप्त करें और अपने जीवन को साकार बनाए। आज विश्व के सभी सनातन धर्मावलम्बियों को अत्यन्त हर्ष का अनुभव करना चाहिए कि 500 से अधिक वर्षों के संघर्षों के पश्चात् श्री राम जन्म भूमि अयोध्या को हमने न्यायालयों में अनेकों साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध कर के प्राप्त किया है। वैदिक संस्कृति के अनुसार मर्यादापुरूषोत्तम श्री राम के जीवन से जन जन प्रेरणा प्राप्त करे तभी श्री राम जन्म भूमि का स्मारक पूर्ण हो सकेगा ।

  • डॉ दयानिधि सेवार्थी

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