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सनातन धर्म मानने वालों का प्राण प्रतिष्ठा विरोध समझ से परे ?

श्रीमती सोनिया गांधी , पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा राम प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराने की बात तो समझ में आती है, क्योंकि वे जन्मजात क्रिश्चियन है , मुस्लिम परिवार की बहू है और कथाकथित “निरपेक्षता” का परिपालन करती है। लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे ,वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष और श्री अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस के नेता , जयराम रमेश,ममता बनर्जी, दिग्विजय सिंह जैसे हिंदू धर्मावलंबी वामपंथी द्वारा भगवान श्री राम की प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराने का कारण आम जनता की समझ से परे है?
अधीर रंजन चौधरी और मल्लिकार्जुन खड़गे तथा अन्य नेता सनातन हिंदू है और भारत की संतान है। इन नेताओं की राजनीतिक क्षेत्र में पकड़ हैं और भारत की जनता के बीच जाते हैं। इन्हें भगवान राम के प्राण प्रतिष्ठा में आना चाहिए । क्योंकि गांधी परिवार तो चुनाव में 20 साल से जो भाषण देता आया है, वही पढ़ेगा ! लेकिन अन्य हिन्दू धर्मावलंबी नेताओं को भारत की जनता को बताना पड़ेगा की वह हिन्दू होते हुए भी भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा में सम्मिलित क्यों नहीं हुए?
गांधी परिवार इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यक्रम कहे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं! लेकिन प्रकाश कारंत , अधीर रंजन चौधरी और मल्लिकार्जुन खरगे, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत जैसे नेता पिछले पांच दशक से संघ के सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भावना कार्यक्रम से परिचित है । यदि ये गांधी परिवार की चाल चले तो आम जनता के गले नहीं उतरेगा? कहीं आने वाले लोकसभा चुनाव में जनता ने इसका उत्तर देने की ठान ली तो हिंदू होते हुए भगवान राम का विरोध करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों को लेना का देना पड़ जाएगा !!
कुछ साधु संतों ने भी इसका यह कहकर विरोध किया है कि रामनवमी का पर्व आ ही रहा है तो यह कार्यक्रम रामनवमी पर न करके जल्दी करने का मतलब है राजनीतिक लाभ !! नरेंद्र मोदी और भाजपा को राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को राजनीति से दूर रखना चाहिए ? यहां आम जनता के संज्ञान में लाया जाता है कि पिछले चार दशक से राम मंदिर निर्माण विषय भारतीय जनता पार्टी के चुनावी मेनिफेस्टो अंग रहा है तो फिर इसे राजनीति से दूर रखकर कैसे देखा जा सकता ? इस विषय पर जनता की मोहर लगी है। मोदी और योगी को राम मंदिर निर्माण का लाभ उठाने का भारत की जनता ने अधिकार दिया है।
एक सुप्रीम कोर्ट के वकील तथा कुछ कट्टर अम्बेडकरवादी लोगों ने धर्म परिवर्तन की बात कही है। यदि राम लला के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू को नहीं बुलाया गया तो हम धर्म परिवर्तन कर लेंगे !! राम लला प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू को न बुलाने को लेकर गलत अफवाह फैलाई जा रही है कि “वह आदिवासी है इसलिए नहीं बुलाया जा रहा है।” इस संदर्भ में सत्य का उद्घाटन यह है कि संविधानिक परिपाटी के अनुसार किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है वहां राष्ट्रपति का सामने बैठना वरिष्ठता के लिहाज से शोभा नहीं देता है। संविधान में राष्ट्रपति का पद प्रधानमंत्री से बड़ा है। क्योंकि राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता और शपथ दिलाता है। राष्ट्रपति राष्ट्र का अध्यक्ष हैं। जहां राष्ट्रपति अध्यक्षता करता है वहां प्रधानमंत्री जा सकता है। क्योंकि प्रधानमंत्री शासनाध्यक्ष है । राष्ट्र और शासन मैं राष्ट्र की अहमियत बड़ी होती है। ऐसा ही सेना में भी होता है। किसी लांसनायक जिसे परमवीर चक्र मिला हो उसके सामने सेना अध्यक्ष कुर्सी पर नहीं बैठता।
आदिवासी समाज और अनुसूचित जाति समाज सनातन हिन्दू है। क्योंकि वह आदि अनादि काल से प्रकृति का उपासक,पूजक और संरक्षक रहा है।
यदि मोदी अथवा वर्तमान भाजपा सरकार आदिवासी समाज के साथ भेदभाव करती अथवा आगे नहीं बढ़ती तो लगातार अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति के बाद अनुसूचित जनजाति का राष्ट्रपति ही नहीं बनाती।
जाति आधारित घृणा भाव फैला कर भारतीयों को आपस में बांटने का काम अंग्रेजों, वामपंथियों, मार्क्सिस्ट, और अलगाववादियों ने सदियों से किया और अब कट्टर अम्बेडकरवादी इसे एक मिशन के रूप में आगे बड़ा रहे हैं?
सभी आदिवासी एवं अनुसूचित जाति के पढ़े-लिखे लोगों को सजक रहने की आवश्यकता है और विघटनकारी ताकतों को उनके मंसूबों में कामयाब नहीं देना ही सच्चे और अच्छे भारतीय की पहचान है और युगों तक रहेगी।

 इस तरह की मानसिकता वाले साधु -संत, लेखक, चिंतक, पत्रकार, अधर्मी और जनसाधारण के संज्ञान में लाया जाता है कि भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान भगवान राम से है। जिन साधु संतों ने इसका विरोध किया उनकी पहचान भी सनातन और भगवान राम से ही है।
 प्रजातांत्रिक व्यवस्था में खामियां निकालना आवश्यक है, लेकिन भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा एक ऐसा एतिहासिक कार्यक्रम है जिस कार्यक्रम के लिए 535 वर्ष का सनातन धर्म के लोगों ने अथक संघर्ष और प्रयास किया है । अनगिनत सनातन धर्मावलंबियों की भावना साकार होने जा रही है।
   अल्प बुद्धि धारक लोगों का ऐसा मानना है कि मोदी और योगी अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। उन लोगों से विनम्र निवेदन है कि मोदी देश के दस साल से प्रधानमंत्री हैं और  सात साल से योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री । अब कौन सी राजनीति चमकाना बाकी  है ??
एक सर्वहारा भारतीय का मन कहता है कि कुछ अच्छे कामों के लिए हमें समावेशी समरसता भाव से एक जूट हो होना चाहिए। भारत,भारतीयता, सनातन  हिंदू, हिंदूस्थान,राष्ट्र और राष्ट्रीयता जैसे महान कार्य  में सहृदय से सम्मिलित होना चाहिए"।

भगवान श्री राम का मंदिर पूर्ण होना, रामल्ला का वहां विराजमान होना जैसे संयोग 10-20 हजार साल में एकाध बार ही मुहूर्त और अवसर आता है। हम भाग्यशाली है कि हमने इस मानव जिंदगी में ही ऐसी अभूतपूर्व अनहोनी को होनी होते हुए देखने का शौभाग्य मिला है।
इसे प्रारब्ध का प्रसाद मानते हुए सनातन हिंदू धर्म में जन्म लेने को सार्थक मानना चाहिए। आओ 22 जनवरी को स्वस्थ सुंदर मन में घर-घर दीप जलाएं।

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
लेखक सामाजिक समरसता व विद्वतजन परिषद से सरोकार रखते हैं

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