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आज का चिंतन

मानव शरीर में ही आध्यात्मिक उन्नति संभव है

आत्‍माराम यादव पीव

         महाकवि कालिदासकृत के द्वारा रचित ’’कुमारसंभव’’ के पॉचवे सर्ग में भगवान शंकर की प्राप्ति के लिये पार्वती जी हिमालय पर तप कर रही है, तब शंकर जी उनके निश्चय की परीक्षा करने के लिये एक ब्रम्हचारी के वेश में आकर कुशल क्षेम पूछने के बाद कहते है-’’अपि क्रियार्थ सुलभं समित्कुशं जलान्यपि स्नानविधिक्षमाणि ते। अपि स्वशक्तया तपसिप्रवर्तसे शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम।। 33।। अर्थात तुम्हारे नित्यकर्म के यज्ञ-क्रियाओं के लिये समिधाएॅ और कुशाएं तो सरलता से प्राप्त हो जाती है? यहॉ का जल स्नान आदि कार्यो के लिये उपयुक्त तो है न ? तुम अपनी शक्ति के अनुसार ही तप करती हो, कहीं उससे  अधिक तो नहीं करती हो ? क्योकि ध्यान रखिये शरीर ही धर्मसंग्रह का सबसे बड़ा साधन है। यदि शरीर न हो या शरीर कार्य करने में सक्षम न हो तो धर्म साधन नहीं बन सकता है, इसलियेअपनी शक्ति  विचार करना आवश्यक है। यहॉ शंकर जी शरीर को धर्मसंग्रह का मुख्य साधन बतलाया है, अतः धर्म का स्वरूप समझना चाहिये और फिर शरीर किस प्रकार साधनरूप है, यह देखना चाहिये।

           शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् -अर्थात स्वस्थ्य शरीर ही धर्मानुष्ठान का प्रमुख साधन है। स्वस्थ्य शरीर के लिये व्यक्ति में अच्छी आदतों और अनुशासन का होना आवश्यक है। शारीरिक व आत्मिक स्वच्छता और स्वास्थ्य के लिये ऋषियों मुनियों ने वैदिक काल सू स्वच्छजल की महत्वा को स्वीकारा है। आपो हिष्ठा मयोभुवः कहकर वेद ने जल को कल्याण की उत्पत्ति स्थाना माना है। सलिलं जीवनं कहकर जल को जीवन कहा है। दैनिक स्नान को शरीर मन तथा स्नायुओं का स्फूर्तिवर्धक बताया है। स्नान के समय ईश्वर का नामस्मरण करने से ब्राह और आन्तरिक पवित्रीकरण होकर आत्मशुद्धि होती है इस सत्य को बार-बार दोहराया गया है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर स्नान-विधि और सन्ध्योपासनाविधि का विधान प्राचीनकाल से प्रवर्तन में आया है और यह विधान शास्त्रोक्त परम्परा का अंगभूत होने के साथ साथ अतिवैज्ञानिक बन पड़ा है। हमारे सदगुरू महाराज ने अपने शिष्यों भक्तों व साधकों की आत्मिक उन्नति के लिये स्नान और सन्ध्योपासना विधि का महत्व उन्हें अच्छी तरह से समझाया और इसे दैनिक साधना का प्रधान अंग बताया है। सन्ध्योपसना से ही न्तिय कर्म का श्रीगणेश साधक के लिये आवश्यक कहा गया है। क्योंकि सन्ध्योपसना में बताये गये अघमर्षण मंत्रों से ही प्रातः दिन और सॉय को अज्ञान से, विस्मृति से और भ्रान्ति से किये गये पापों की निवृत्ति होती है और खाने के अयोग्य या अशुद्ध पदार्थो के सेवन से लगे हुये पापों से छुटकारा मिलता है। स्वस्थ्य जीवन के लिये इन अघमर्षण मंत्रों की महत्ता अब आप स्वयं आंक सकते है। इसके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग को मन्त्राभिषिक्त जल से पवित्र करके दैनिक अभ्यास व साधना के लिये उपयुक्त बनाना और महागायत्री मंत्र के यथासंभवन जाप से परमपद की  ओर आगे बढ़ना सन्ध्योपासना का प्रमुख उददेश्य है।

यहॉ शरीर को धर्मसंग्रह का मुख्य साधन बतलाया है, अतएव धर्म के स्वरूप को समझना होगा ताकि धर्म किस प्रकार साधनरूप बन सके, यह समझना होगा। धर्म का स्वरूप इतना विस्तृत है जो अनिवर्चनीय है, जिसकी व्याख्या करना संभव नहीं है। धर्म ने अनन्त ब्रम्हाण्डों को धारण कर रखा है और प्रत्येक ब्रम्हाण्ड तथा उनके भीतर के ग्राही पदार्थ भी अपने-अपने धर्म के नियंत्रण में है। धर्म की व्युत्पत्ति और लक्षणों में विभिन्नतायें दिखाई देती है पर सभी का अर्थ एक ही होता है देखिये कुछ दृष्टकोण-धिन्वनात् धर्म-धिन्वन् अर्थात धारणा या आश्वासन देना। दुख से पीड़ित समाज को धीरज देकर जो सुख का मार्ग दिखाता है, उसका नाम धर्म है। दूसरा- धारणात् धर्म-धारण करना, दुख से बचाना।जैसे श्रीकृष्ण ने गोर्वधन धारण कर ब्रज को बचाया था, उसी प्रकार जिस आचरण से समाज को अधोगति से बचाकर उच्च आसन पर स्थिर कर सके उसका नाम धर्म हैं।

धर्मकी सर्वदेशीय और सर्वमान्य व्याख्या -’’यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’’, जिसके आचरण से अभ्युदय तथा निःश्रेयस की प्राप्ति हो उसी का नाम धर्म है। यहॉ हमें अभ्युदय और निःश्रेय का अर्थ समझना होगा। श्रेयस् यानी कल्याण, जिस कल्याण से बढ़कर दूसरा कोई बड़ा या अधिक महत्व का कल्याण न हो, उस सर्वश्रेष्ठ या सर्वोपति कल्याण को निःश्रेयस कहा गया हैं सर्वश्रेष्ठ कल्याण मोक्ष को कहते है, क्योकि उसको प्राप्त कर लेने पर फिर कछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता है। अतः निःशेयस् का अर्थ है मुक्ति या भगवत्प्राप्ति अथवा जन्ममरण के बंधन से निवृत्ति, अतः धर्म का यह लक्षण है जिसके आचरण से मोक्ष प्राप्त हो। अब अभयुदय का विचारण् करते है। इस शब्द के विषय में विचार करने से पूर्व मनुष्य के स्वभाव, संस्थार तथा संस्कृति, के विषय मे समझना होगा।

मानव संस्कृति दो भागों में विभक्त है पहली-आध्यात्मिक संस्कृति और दूसरी देहात्मभाव वाली संस्कृति। भारत की संस्कृति आध्यात्मक पर आधारित है जबकि अन्य देशों की संस्कृति देहात्मवादी है। आध्यात्मिक संस्कृति में आत्मा की अमरता, नित्यता, अविनाशित्व तथा आत्मा के सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में दर्शन गीता सहित हमारे वेद-पुराणशास्त्रों में मिलतेहै। शरीर के नष्ट होने के साथ आत्मा का विनाश नहीं होता हैं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमदभागवत गीता में आत्मा को अजन्मा और अविनाशी कहा है। कर्मफल भोगे बिना जीव का छुटकारा नहीं है इस जन्म में कर्मफल भोगने के बाद शेष बचे कर्मफल अगले जन्म में भोगने पड़ते है, इस प्रकार पुर्नःजन्म पर विश्वास पैदा होता है और मनुष्य पाप करने से भयभीत होता है। ईश्वर को सृष्टि की उत्पत्ति , स्थिति और लय करने वाला मानकर शुभाशुभ फल को भुगताने वाला एवं प्रत्येक देह में अर्न्तयामी रूप में सर्वव्यापक मनकर विश्व का नियमन करता हैं, इसलिये आध्यात्मवाद में जीवन का ध्येय ईश्वर की प्राप्ति यानि मोक्ष की प्राप्ति कहा गया है और इसके लिये शरीर को साधनमात्र माना गया है।

देहात्मवादी आत्मा और ईश्वर को नहीं मानते है। वे जो ऑखें से देखते है, कानों से सुनते है, नाक से सूंघते है, यानि शरीर की इन्द्रियों से जो आभासित करते है, जो ज्ञान प्राप्त करते है वही उनका देहात्म के प्रति विश्वास होता हैं तभी वे पापकर्मा से मुॅह नहीं मोड़ते है। अपनी देह को सुख पहुॅचाना तथा उसके लिये अधिक से अधिक भोग की सामग्री एकत्र करना उनके जीवन का लक्ष्य होता हैं,उनके विषय में यह कहा जा सकता है कि- खादते मोदते नित्यं शुनकः शूकरः खरः। तेषामेपां को विशेपो वृत्तिर्योंपां नु तापसी।। अर्थात जिस प्राकर श्वान, शूकर और गधे नित्य खाते पीते है, शरीर का निर्वाह करते है, कुछ मनुष्य इन्हीं पशुओं की तरह अपना जीवन देह पोषण करने, खाने पीने एवं लाड़-प्यार करने में बिताता है और दोनों में अन्तर ही नहीं रह जाता है- देहदशां दुःख भोगवे, करें सुखना उपाय जी। आत्मदशी आनन्दमॉ ,रहे सुखमॉ सदाय जी।। अर्थात जो देहदर्शी है, उनके लिये उनका देह ही सब कुछ है इसलिये वे देह को सुख पहुॅचाने में ही जीवन की सम्पूर्णता समझ कर्तव्य मान लेते है। यह अलग बात है कि उन्हें जीवन में तृप्ति का बोध नहीं होता सारा जीवन अतृप्ति एवं दुख में बीतता है जब वह आत्मा के आनन्दस्वरूप में विश्वास करता है तभी वह अतृप्ति से मुक्त हो सिद्धता पा सकता है।

लिखिता चित्रगुप्तेन ललाटेक्षरमालिका। तां देवोपि न शंक्रोति उल्लिख्य लिखितुं पुनः।। शास्त्रों मे उल्लेख मिलता हैकि ब्रम्हा ने प्रारब्ध में जिस भोग का निर्माण किया है उसमें कोई भी शक्ति बदलाव नहीं कर सकती है यहॅा तक कि ब्रम्हा स्वयं अपने लिखे को नहीं बदल सकते है। इससे सिद्ध है कि जो मनुष्य के प्रारब्ध में है वह उसे मिलेगा, प्रत्येक को मनोवान्छित वस्तु या भो नहीं मिल सकता है। इससे यह बात भी सामने प्रगट हो गयी कि मनुष्य के शरीर की शक्ति भी सीमित होने के कारण वह भोगपदार्थ भी एक निश्चित मात्रा में भोगेगा और अधिक की लालसा में वह अतृप्त रहकर वासनाओं में भटकेगा। यहॉ देखने को मिलता है कि भोगप्रदान जीवन सुख का साधन नहीं बल्कि दुख का अनुभव करने वाला होता है।

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः। नित्यं संनिहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः।। अर्थात यह शरीर आज है कल नही होगा, इस तरह यह क्षणभंगुर है। धन दौलत, वैभव, ऐश्वर्य आदि भी कपूर के समान उड जाने वाले है और मृत्यु मुॅह बाये खडी है, कब उठा लेगी, इसका पताभी नही लग सकताहै। वस्तुस्थिति ऐसी है अतएव मनुष्य को यह सारे झंझट छोड़कर धर्म का पालन करना चाहिये जिससे मनुष्य के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हो सके। यहा प्रश्न यथावत है कि शरीर किस प्रकार साधनरूप है ? भगवान की सृष्टि में देखें तो 84 लाख योनि के जीव होते है जिसमें मनुष्य भी एक योनि है, चॅूकि सभी योनियों में मानव शरीर श्रेष्ठ है। यहॉ आत्मपुराण का एक श्लोक से बात समझना होगी- जातो बालो युवा वृद्धो मृतो जातःपुनस्था। भ्रमतीत्येव संसारे घटीयन्त्रसमोवशः।। अर्थात प्राणी जन्म लेता है, बाल्यावस्था को पार करके युवा होता है और फिर वृद्ध होकर मर जाता है। इस प्रकार प्राणी चक्र के समान है जो पराधीन अवस्था में संसार में भ्रमण किया करता है। मनुष्य भी जो अपना हित नहीं समझता है वह भी इसी प्रकार भ्रमण करता है, जैसे चक्र करता है।

प्रत्येक मनुष्य को परमात्मा ने देव-दुर्लभ शरीर एवं पूर्ण विकसित अन्तःकरण प्रदान किया है ताकि वह अहंकारवृत्ति त्यागकर अपने मन, बुद्धि; चित्त के द्वारा मैं कौन हॅू , मुझको पता लगाना है, यह कर्म-साधना करते हुये सदगुरू के मार्गदर्शन में आत्मबोध को उपलब्ध हो सकता है, तप करके ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। श्रीमद भागवत गीता में श्रीकृष्ण समझाते है कि- तानहं द्विषतः क्रूरान संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्त्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। आसुरीं योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि। माप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम््।। अध्याय-16 का 19-20 वा श्लोक अर्थात- मुझसे तथा मेरी सृष्टि से द्रोह करने वाले क्रूर तथा पापी नराधमों को मैं संसार में बारम्बार आसुरी योनियों में डाला करता हॅूॅ। इस प्रकार जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनियों में भटकते हुये वे मूढ़ मुझको नहीं पा सकते है, बल्कि उत्तरोत्तर अधम गति को ही प्राप्त होते है। इससे स्पष्ट है कि किसी जीव को किसी विशेष शरीर में रखने का परमेश्वर को विशेष अधिकार प्राप्त है। आसुरी लोग भले ही ईश्वर की श्रेष्ठता को न स्वीकार करें परन्तु उनका अगला जन्म भगवान के निर्णय पर निर्भर करेगा।।

ईश्वर की कृपा प्राप्त न होने पर जीव का अधःपतन होता है और वह कुतें-बिल्लियों तथा शूकर जैसा शरीर एवं असुर का जीवन प्राप्त करता है। इस प्रसंग से तर्क दिया जा सकता है यदि ईश्वर इन जीवों-असुरों पर कृपालु नही है तो उन्हें सर्वकृपालु क्यों कहा जाताहै। वेदान्त से पता चलता है कि परमेश्वर किसी से घृणा नहीं करता है तथा निम्नतम अधम योनि में रखने वालों पर उनकी कृपा की विशेषता है। यहॉ भगवती श्रति में एक चेतावनी देखने को मिलती है- लब्ध्वा कथंचिन्नरजन्मदुर्लभं तन्नापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्। यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेतूढ़धीः स यात्महा स्वयं विनिहन्त्यसद्दहस्त।। जब महापुण्य के प्रताप से देवदुर्लभ मानवशरीर प्राप्त हुआ है और उसमें भी श्रुतियों का तात्पर्य समझने का अधिकारवाला पुरूषत्व प्राप्त हुआ है, इतने पर भी जो मूर्ख अपनी मुक्ति के लिये यत्न न करके विषयभोगों में लगे रहे, वे आत्महंता ही होंगे, क्योंकि यह शरीर परमपद की प्राप्ति के लिये है, न कि विषयभोग के लिये।

मनुष्य चाहता है कि उसके हृदय में किसी प्रकार की कोई कमी न रहे, उसके जीवन की सारी आवश्यकतायेंं चाहे वह इस जगत से हो या परा जगत से सहजता से पूर्ण हो जाये। योगी को यर्थाथ कर्मपथ ज्ञानचक्षु के खुलने के बाद ही प्राप्त होता है, इसके पहले नहीं। इस विराट जगत में मार्ग में चलने के लिये देह को सुरक्षित रूप मेंं अपने अधीन रखना आवश्यक है, क्योंकि यही आद्य धर्मसाधन है अर्थात रोग, जरा, अकालमृत्यु आदि समस्त विग्नों से देह को मुक्त करके पूर्णत्व के मार्ग में चलना होगा। असली आत्मा को पहचानिये और यह शरीर धर्मसंग्रह का प्रधान साधन बनकर संकीर्ण विचार, वैयक्तिक आत्मा से उठकर सर्वव्यापक, नित्य, सर्वाधार और उच्चतर परम आत्मा का अनुभव करना ही मनुष्य का चरम ध्येय होना चाहिये। इस एक अद्वितीय अजर अमर स्वयंभू आत्मा के साथ अपना तादात्म्य अनुभव करना ही परम कल्याण एवं मोक्षसम्पद है।

                                                                                                                   आत्‍माराम यादव पीव

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