ओ३म् “वैदिक धर्म के कुछ मुख्य सिद्धान्त जिनका प्रचार आर्यसमाज करता है”

IMG-20231218-WA0008

==========
वैदिक धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म व मत है। वैदिक धर्म का प्रचलन वेदों से हुआ है। वेद सृष्टि के आरम्भ में अन्य सांसारिक पदार्थों की ही तरह ईश्वर से उत्पन्न हुए। परमात्मा सत्य, चित्त व आनन्द स्वरूप है। ईश्वर के इस स्वरूप को सच्चिदानन्दस्वरूप कहा जाता है। चेतन पदार्थ ज्ञान व क्रिया से युक्त होते हैं। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप सहित सर्वव्यापक, अनादि, नित्य, अमर तथा अविनाशी सत्ता है। ईश्वर सर्वज्ञ है जिसको सृष्टि बनाने व पालन करने का ज्ञान अनादि काल से है। यह ज्ञान न घटता है न बढ़ता है। पूर्ण ज्ञान में घटना व बढ़ना नहीं होता। मनुष्य एकदेशी, ससीम तथा जन्म व मरणधर्मा होने से अल्पज्ञ है। इसे ज्ञान प्राप्ति में ईश्वर सहित वेदज्ञान व माता, पिता एवं आचार्यों की आवश्यकता होती है। इनके बिना हम ज्ञानवान तथा सत्य व यथार्थ तथ्यों सहित प्रकृति के रहस्यों को जानने वाले नहीं होते। वेद ज्ञान की सहायता तथा ईश्वर की उपासना से मनुष्य ज्ञानवान होता है। मनुष्य को ज्ञानवान बनाने में माता, पिता, आचार्यों तथा ऋषियों के सत्य ज्ञान से युक्त ग्रन्थों का विशेष महत्व होता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य अपनी बुद्धि से सत्यासत्य का निर्णय कर सकता है। संसार में ईश्वर व ऋषियों के अतिरिक्त मनुष्यों द्वारा रचित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। मनुष्य के अल्पज्ञ होने से उसकी सभी रचनायें निर्दोष नहीं होती हैं। बड़े-बड़े महापुरुष भी अल्पज्ञ होते हैं। इस कारण उनके ग्रन्थों में विद्यमान कुछ मान्यतायें विद्या व ज्ञान की दृष्टि से वेदविरुद्ध होने के कारण सत्य न होकर असत्य वा विष मिश्रित अन्न के समान होती हैं। अतः ईश्वरीय ज्ञान वेदों को स्वतः प्रमाण मानकर हमें अपने जीवन में किसी भी ग्रन्थ की मान्यता की परीक्षा कर उसे स्वीकार व अस्वीकार करना चाहिये और सत्य को ही अपनाना चाहिये। वेद सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं। वेदानुकूल सिद्धान्त व मान्यतायें ही आचरण करने व मानने योग्य होती हैं। सभी प्रचलित मतों की मान्यतायें में एकता व समानता न होने का कारण उनकी मान्यताओं का अविद्यायुक्त होना होता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में वेदों की सत्य मान्यताओं का प्रकाश करने के साथ मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का दिग्दर्शन कराया है। इससे विदित होता है कि वेद ही स्वतः प्रमाण है जिसकी सभी मान्यतायें ईश्वरप्रदत्त होने से प्रमाण हैं तथा अन्य ग्रन्थों की वही मान्यतायें स्वीकार करने योग्य हैं जो पूर्णतः वेदानुकूल हों।

वैदिक धर्म के मुख्य सिद्धान्तों व मान्यताओं पर विचार करते हैं तो इसका प्रमुख सिद्धान्त त्रैतवाद का सिद्धान्त प्रतीत होता है। त्रैत से अभिप्राय ईश्वर, जीव तथा प्रकृति इन तीन सत्ताओं से है। हमारा यह संसार इन तीन पदार्थों का ही समन्वित रूप है। ईश्वर इन्द्रियों से अगोचर होने के कारण आंखों से दिखाई नहीं देता। उसमें गन्ध न होने से उसे सूंघ कर अनुभव नहीं किया जा सकता। वायु के समान न होने के कारण उसका स्पर्श भी नहीं होता। वह एक अनादि, नित्य, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, धार्मिक स्वभाव से युक्त, दयालु, कृपालु, जीवों के प्रति पितृ, मातृ, बन्धु, सखा आदि सम्बन्धों से युक्त सत्ता है। ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय तथा ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य का अध्ययन कर ईश्वर के सत्यस्वरूप को जाना जा सकता है। सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी होने से वह हमारे बाहर व भीतर विद्यमान है। वह हमें सत्प्रेरणायें करता रहता है। निर्दोष अन्तःकरण वाले मनुष्यों को उसकी प्रेरणाओं की अनुभूति आनन्द व उत्साह तथा बुरे काम करने पर भय, शंका व लज्जा के रूप में अनुभव होती है। हर निर्मित पदार्थ के निमित्त व उपादान दो प्रमुख कारण होते हैं। इस समस्त सृष्टि व इसके समस्त पदार्थों का एक ईश्वर ही निमित्त कारण है तथा अनादि व नित्य सूक्ष्म प्रकृति उपादान कारण है। ईश्वर व प्रकृति से इतर चेतन जीवों का भी संसार में अनादि काल से अस्तित्व है। यह सब नाशरहित अजर व अमर पदार्थ हैं। जीव अल्पज्ञ एवं जन्म व मरण धर्मा हैं। इन्हीं के लिये परमात्मा इस सृष्टि को बनाते व पालन करते हैं। जीव अल्पज्ञ चेतन सत्ता है। अतः यह मनुष्य आदि योनियों में जन्म प्राप्त कर कर्म करते हैं जिसका जन्म-जन्मान्तर में फल भोगने के लिये इनका नाना योनियों में जन्म होता है। इसी से पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी सिद्ध होता है। मनुष्य व अन्य सभी योनियों में जीवों की उत्पत्ति व जन्म का कारण उसके पूर्वजन्म के कर्म ही सिद्ध होते हैं। जीव अनादि व अनन्तकाल तक विद्यमान रहने से युक्त स्वरूप वाले हैं। इनके कर्मों व अस्तित्व का कभी अन्त नहीं होगा। अतः इनके जन्म अनन्त काल तक होते रहेंगे। संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति का अस्तित्व सत्य सिद्ध है। कोई मत व सम्प्रदाय इन वैदिक मान्यताओं को मानता है तो अच्छी बात है और यदि कोई अज्ञानतावश किसी सत्य वैदिक सिद्धान्त को नहीं मानता तो इसका कारण उनका अज्ञान वा अविद्या ही कही जा सकती है।

वेद जीवों के जन्म का कारण उसके कर्म-बन्धनों को बताते हैं। जब यह बन्धन क्षीण हो जाते हैं तो जीवात्मा का मोक्ष हो जाता है। मोक्ष आवागमन वा जन्म व मरण से दीर्घावधि के लिये मुक्ति को कहते हैं। मोक्ष में जीवन को पूर्ण सुख व आनन्द प्राप्त होता है। यह उसके शुभ कर्मों व साधना का पुरस्कार व प्रतिफल होता है। इसका विस्तार ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में देखा जाता है। मोक्ष एक सत्य सिद्धान्त है। इसकी पुष्टि सत्यार्थप्रकाश के नौवें समुल्लास में प्रस्तुत तथ्यों व तर्कों के आधार पर होती है। सत्य प्रेमी व जिज्ञासु बन्धुओं को सत्यार्थप्रकाश का मोक्ष विषयक प्रकरण अवश्य पढ़ना चाहिये।

वेदों का एक प्रमुख सिद्धान्त पुनर्जन्म की मान्यता है। आत्मा जन्म व मरण धर्मा है। इसका इसके कर्मों के अनुसार जन्म व शरीर के जर्जरित होने पर मरण होता रहता है। मृत्यु के बाद जन्म होना सुनिश्चित होता है। गीता नामक ग्रन्थ में कहा है कि जन्म लेने वाले प्राणी की मृत्यु निश्चित होती है। इसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त आत्मा का जन्म होना भी धु्रव अर्थात् निश्चित है। हम संसार में भिन्न-भिन्न गुण, कर्म व स्वभाव वाले शिशुओं के जन्म को देखकर व उनकी पृथक-पृथक भिन्न क्रियाओं को देखकर उनके पूर्वजन्म के संस्कारों का अनुभव करते हैं। शिशु माता का दुग्ध पीता है। इसका कारण भी उसका पूर्वजन्म का संस्कार होता है। इसी प्रकार से नवजात व अल्प आयु के शिशुओं का हंसना व रोना तथा एक ही परिवार में समान पोषण मिलने पर एक का बुद्धिमान तथा किसी का अल्प बुद्धि वाला होना, किसी का धार्मिक प्रकृति का तथा किसी का धर्म विपरीत आचरण की प्रकृति का होना मनुष्य के पुनर्जन्म को सिद्ध करते हैं। पुनर्जन्म पर ऋषि दयानन्द के अनेक तर्कपूर्ण वचन भी उपलब्ध हैं। अनेक विद्वानों ने भी पुनर्जन्म पर उत्तम ग्रन्थों की रचना की है। कुछ विद्वानों ने पुनर्जन्म पर शोध उपाधि पीएचडी आदि भी प्राप्त की हैं। इन सबसे पुनर्जन्म का सिद्धान्त सत्य सिद्धान्त सिद्ध होता है।

वेद व वैदिक साहित्य में हमें पंचमहायज्ञों को प्रतिदिन करने का एक तर्कसंगत एवं लाभकारी सिद्धान्त भी प्राप्त होता है। यह पांच कर्तव्य हैं 1- ईश्वरोपासना वा सन्ध्या, 2- देवयज्ञ अग्निहोत्र, 3- पितृयज्ञ, 4- अतिथियज्ञ एवं 5- बलिवैश्वदेव यज्ञ। सन्ध्या ईश्वर की प्रातः व सायं उपासना को कहते हैं। इस उपासना के समर्थन में भी ऋषि दयानन्द के अनेक तर्कपूर्ण एवं सारगर्भित कथन उपलब्ध हैं। उनके अनुसार ईश्वर के सभी जीवों पर अनादि काल से अनन्त उपकार हैं। ईश्वर ने हम जीवों के लिये ही इस सृष्टि का निर्माण किया तथा हमें मनुष्य का जन्म दिया है। अनादि काल से हम जन्म लेते आ रहे हैं। बार-बार हमारा पुनर्जन्म ईश्वर की कृपा से ही होता है। हमें जो सुख प्राप्त होते हैं उनका आधार व देने वाला भी परमेश्वर ही है। अतः हमें ईश्वर के उपकारों के लिए कृतज्ञता प्रकट करने के लिये उसकी उपासना अवश्य करनी चाहिये। उपासना से जीवात्मा की उन्नति होती है। मनुष्य को सुख प्राप्त होने सहित उसका परजन्म भी सुधरता है। ऐसे अनेक लाभ ईश्वर की उपासना से होते हैं। मनुष्य का दूसरा प्रमुख कर्तव्य देवयज्ञ अग्निहोत्र है। इससे वायु शुद्धि सहित रोग किटाणुओं का नाश होने से मनुष्य स्वस्थ रहते हैं। कुछ रोग दूर भी होते हैं। यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। इसको करने से मनुष्य को पुण्य का लाभ होता है जिससे हमें जन्म जन्मान्तर मे सुख मिलता है। मनुष्य को पितृयज्ञ के अन्र्तगत माता, पिता तथा वृद्धों की सेवा-सुश्रुषा करनी होती है। अतिथि यज्ञ में विद्वान निःस्वार्थ स्वभाव के अतिथियों का आदर-सत्कार व पोषण करना होता है। बलिवैश्वदेव यज्ञ में मनुष्येतर प्राणियों के प्रति प्रेम व सद्भाव रखते हुए उन्हें यथाशक्ति भोजन कराना होता है। पंच-महायज्ञों का विधान होने से भी वैदिकधर्म संसार का महानतम धर्म एवं संस्कृति है। इसके पालन से ही मनुष्य का वर्तमान, भविष्य तथा परजन्म सुधरता है। ईश्वर की कृपा व सहाय प्राप्त होता है। आत्मा की उन्नति सहित सुख व मोक्ष में भी यह पंचमहायज्ञ कारण व सहायक होते हैं।

वैदिक धर्म में गुण, कर्म व स्वभाव के आधार पर वर्णव्यवस्था का विधान है। वर्तमान में प्रचलित जन्मना जाति व्यवस्था का समर्थन वेद व ऋषियों के साहित्य से नहीं होता। यह व्यवस्था मध्यकाल में अज्ञानता तथा विदेशी राज्य की विवशताओं के कारण प्रचलित हुई थी। इसका कोई उचित कारण व महत्व नहीं है। इससे मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव व पक्षपात होता है। वेद मनुष्यों में पक्षपात के सर्वथा विरुद्ध हैं। वेद तो मनुष्य मात्र को वेदों का ज्ञानी, विद्वान व विदुषी बनने-बनाने की प्रेरणा करते हैं। वेदों का अध्ययन कर सभी स्त्रियां व पुरुष योग्यता को प्राप्त कर ऋषि, ऋषिकायें, यज्ञ के ब्रह्मा, पुरोहित, वेदों के प्रचारक तथा आत्म व ईश्वर साक्षात्कार करने वाले योगी बन सकते हैं। वेद अधिकाधिक विद्याओं को पढ़कर पूर्ण युवावस्था में युवक व युवती के विवाह के समर्थक हैं। वेदों से बाल-विवाह का समर्थन न होकर निषेध होता है। विधवाओें के प्रति भी वेदों व वैदिक साहित्य में कोई पक्षपात से युक्त वचन व मान्यता नहीं है। वेदों व वैदिक साहित्य में शूद्रों को भी द्विजों के साथ मिलकर उनके कार्यों में सहयोग करने के विचार प्राप्त होते हैं। वृद्ध शूद्र को भी सभी का पूज्य माना जाता है। शूद्रों की गणना भी वैदिक मान्यता के अनुसार आर्यों में होती है। आर्य श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव से युक्त मनुष्यों को कहा जाता है।

वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों में मनुष्य के सभी कर्तव्य व कर्मों का विधान किया गया है। वेद ईश्वर से उत्पन्न होने से एकमात्र सबके लिये मान्य धर्मग्रन्थ हैं। वेदों की आज्ञाओं का पालन करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य धर्म है। जो मनुष्य इसको मानेगा उसका जन्म-जन्मान्तर में परमात्मा कल्याण करेंगे। सभी मनुष्यों को वेदों का अध्ययन कर परम धर्म वेद का पालन करना चाहिये। वेदों से दूर होकर हम अज्ञानता व अन्धविश्वासों को प्राप्त होते हैं। वैदिक कर्तव्यों की पूर्ति से हमें जो सुख व परजन्म में उन्नति होती है, वेदों से दूर रहने पर हम उससे वंचित हो जाते हैं। हमने इस लेख में कुछ वैदिक मान्यताओं की संक्षेप में चर्चा की है। यदि यह लेख किसी को उपयोगी लगता है तो इसमें हमारे श्रम की सार्थकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
interbahis giriş
interbahis giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vipslot giriş
vipslot giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
aresbet giriş
aresbet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
Grandpashabet Giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
vipslot giriş
vipslot giriş
orisbet giriş
orisbet giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
perabet giriş
perabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş